राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत 17-19 फरवरी तक लखनऊ में रहे। इस दौरान उन्होंने अनेक कार्यक्रमों में भाग लिया और कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन किया। लखनऊ विश्वविद्यालय के मालवीय सभागार में आयोजित ‘शोधार्थी संवाद’ में उन्होंने कहा कि शिक्षा और स्वास्थ्य मूलभूत आवश्यकता है। ये सबके लिए सुलभ होने चाहिए। उन्होंने कहा कि पश्चिम के लोगों ने हमारी शिक्षा के साथ खिलवाड़ किया। उन्होंने हमारी शिक्षा व्यवस्था हटाकर अपनी थोपी। जिससे उन्हें काम करने के लिए काले अंग्रेज मिल जाएं। उन्होंने कहा कि संघ का लक्ष्य देश को परम वैभव संपन्न बनाना है।
‘मैं और मेरा परिवार ही सब कुछ है’, यह न सोच कर पूरे देश के लिए सोचना होगा। संघ समाज की एकता और गुणवत्ता की चिंता करता है। सरसंघचालक ने कहा कि भारत की दिशा और दशा बदलने में शोध की बड़ी भूमिका है। उन्होंने शोधार्थियों से कहा कि जो भी शोध करें उसे उत्कृष्ट रूप से, प्रामाणिकता पूर्वक, तन-मन-धन से, निःस्वार्थ भाव से देश के लिए करें। उन्होंने कहा कि संघ को लेकर बहुत दुष्प्रचार होता है। शोधार्थियों को सत्य सामने लाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि धर्म का शाश्वत स्वरूप सदैव प्रासंगिक है। सृष्टि जिन नियमों से चलती है, वह धर्म है। धूल का एक भी कण धर्मनिरपेक्ष नहीं हो सकता। धर्म सबको सुख पहुंचाता है। हमारी सभी बातों में धर्म लागू है। धर्म बताता है कि हमें अकेले नहीं सबके साथ जीना है।
- धर्म बताता है कि हमें अकेले नहीं सबके साथ जीना है।
- दुनिया में पंथनिरपेक्षता वाला कोई समाज है तो वह हिंदू समाज है।
- अनेक जाति, पंथ, संप्रदाय बताने से अच्छा है कि हम सब अपनी पहचान हिंदू मानें।
- सामाजिक समरसता समाज में एकता का आधार है।
- आधुनिकता हमारी रगों में है, लेकिन हम पश्चिमीकरण के विरोधी हैं ।
- हम अपने बच्चों को पहले घर में ही धर्म की शिक्षा दें।
संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त आयोजित ‘प्रमुख जन गोष्ठी’ में श्री भागवत ने कहा कि हिंदू धर्म ही सच्चा मानव धर्म है। दुनिया में पंथनिरपेक्षता वाला कोई समाज है तो वह हिंदू समाज है। उन्होंने कहा कि अनेक जाति, पंथ संप्रदाय बताने से अच्छा है कि हम सब अपनी पहचान हिंदू मानें। सामाजिक समरसता समाज में एकता का आधार है। उन्होंने कहा कि जाति, भाषा की पहचान महत्वपूर्ण नहीं है। हम सब हिंदू हैं, यह भाव रखना होगा। जाति नाम की व्यवस्था धीरे-धीरे जा रही है। तरुण पीढ़ी के आचरण में यह दिख रहा है। संघ में किसी की जाति नहीं पूछी जाती। सब हिंदू सहोदर हैं, इस भाव से काम करते हैं।
उन्होंने कहा कि दूर-दूर रहने वाले परिवार भावनात्मक रूप से जुड़े रह सकते हैं। हमें अपने बच्चों को नाते-रिश्तेदारों, संबंधियों से मिलाते रहना चाहिए। परिवारों को वर्ष में एक बार कुल परंपरा परिवार के संस्कार के निर्वहन के लिए एकत्रित होना चाहिए। इससे परिवारों में पीढ़ियों का जुड़ाव बना रहता है। एक अच्छे परिवार से अच्छे समाज का निर्माण होता है। उन्होंने संयुक्त परिवारों में हो रहे विघटन के संदर्भ में कहा कि आधुनिकता हमारी रगों में है, लेकिन हम पश्चिमीकरण के विरोधी हैं। हम अपने बच्चों को पहले घर में ही धर्म की शिक्षा दें। धन का प्रदर्शन करने की परंपरा हमारी नहीं रही है। संयुक्त परिवार में संस्कारों का वास होता है।
मंदिरों के सरकारी नियंत्रण से मुक्ति के प्रश्न पर सरसंघचालक जी ने कहा कि हम भी यह चाहते हैं कि मंदिरों का नियंत्रण भक्तों के हाथों में हो। धर्माचार्य और सज्जन लोग मिलकर मंदिरों का संचालन करें। लेकिन इसके लिए हमें तैयारी करनी होगी। विश्व हिन्दू परिषद इस दिशा में काम कर रही है। मंदिरों का पैसा राष्ट्रहित व हिंदू कल्याण में लगना चाहिए।

















