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भारत की महान ऋषि परंपरा की अप्रतिम विभूति

पश्चिम बंगाल के हुगली जिले में कामारपुकुर नामक गांव में सन 1836 ई. में फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को खुदीराम चट्टोपाध्याय तथा  चन्द्रा देवी के पुत्र रूप में एक निर्धन ब्राह्मण परिवार में जन्मी यह आध्यात्मिक विभूति पांच वर्ष की उम्र से ही अद्भुत आध्यात्मिक प्रतिभा का परिचय देने लगी थी। म

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी — edited by Mahak Singh
Feb 19, 2026, 01:23 pm IST
inभारत
श्री रामकृष्ण परमहंस

श्री रामकृष्ण परमहंस

दक्षिणेश्वर (कोलकाता) के महानतम संत श्री श्री रामकृष्ण परमहंस देव की गणना भारतीय नवजागरण काल के उन शीर्ष पुरोधाओं में होती है जिन्होंने विदेशी दासता के अंधयुग में विलुप्त हो रही भारत की आध्यात्मिक ज्ञान परम्परा को पुन: प्रवाहमान किया था। इतिहासकार सुशोभन सरकार लिखते हैं,  ‘’नवजागरण काल के दौरान दक्षिणेश्वर के संत रामकृष्ण परमहंस ने अपने चुम्बकीय व्यक्तित्व के माध्यम से भारतभूमि के सनातन धर्म के मूल तत्वज्ञान  को इस सहजता से देश की आम जनता के सामने प्रस्तुत किया था जिससे उस  विदेशी दासता के काल में देश में तेजी से फैल रही ईसाई धर्मांतरण की प्रवृति पर रोक लगी।‘’ समूचे विश्व में हिंदुत्व के मूल सिद्धांतों का डंका बजाने वाले युवा संन्यासी की स्पष्ट उद्घोषणा थी कि वह सिर्फ श्री श्री रामकृष्ण परमहंस के साधारण से यंत्र मात्र हैं।

परीक्षण की प्रयोगशाला में हिन्दुत्व की प्रतिष्ठा

पश्चिम बंगाल के हुगली जिले में कामारपुकुर नामक गांव में सन 1836 ई. में फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को खुदीराम चट्टोपाध्याय तथा  चन्द्रा देवी के पुत्र रूप में एक निर्धन ब्राह्मण परिवार में जन्मी यह आध्यात्मिक विभूति पांच वर्ष की उम्र से ही अद्भुत आध्यात्मिक प्रतिभा का परिचय देने लगी थी। मगर औपचारिक स्कूली शिक्षा के प्रति इनकी जरा भी रुचि नहीं थी। दक्षिणेश्वर काली मंदिर में पुजारी बन अपनी निश्चल भक्ति से मां काली का वरद पुत्र बनने वाले अध्यात्म विद्या के इस महासाधक का अतुलनीय जीवन चरित्र  यह बताता है कि एकमात्र ईश्वर ही सत्य है, शेष सब मिथ्या। दक्षिणेश्वर के इस अनूठे संत ने सभा-सम्मेलनों में शास्त्रार्थ किए बिना, मंच पर भाषण और वक्तव्य दिए बिना; केवल अपने सरल सौम्य आचरण और अपनी ईश्वरीय अनुभूतियों के बल पर यह साबित कर दिखाया कि हिन्दुत्व का केवल वेद-उपनिषद् वाला रूप ही नहीं, बल्कि वह रूप भी पूर्ण सत्य है जिसके आख्यान पुरा कथाओं व संतों-मनीषियों की जीवनियों में मिलते हैं। उन्होंने हिन्दुत्व की रक्षा अन्य धर्मों को पछाड़कर नहीं, प्रत्युत उसमें निहित मूल तत्वज्ञान को परीक्षण की तुला पर तौल कर की थी। भारत की महान ऋषि परंपरा की इस अप्रतिम विभूति की स्पष्ट मान्यता थी कि हिन्दू धर्म भारत के महान तत्वदर्शी ऋषियों द्वारा पोषित व पल्लवित सनातन धर्म को सिर्फ आत्मचेतना के अनुभव द्वारा ही जिया जा सकता है।

परमहंस देव जी के दीक्षा और शिक्षा गुरु

वैज्ञानिक अध्यात्म के प्रणेता युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य लिखते हैं, ‘’ स्वतंत्रता आंदोलन को शक्ति देने वाले भौगोलिक भूखंड के पीछे अलौकिक भारत को गहराई से देखने की जरूरत है। नरेन्द्र नामक एक साधारण नौजवान को स्वामी विवेकानंद बनाकर विश्वमंच पर सनातन हिंदुत्व को प्रकाशमान करने का श्रेय श्री श्री रामकृष्ण परमहंस देव जी को ही जाता है।‘’ परमहंस देव जी ने  अद्वैत व वेदांत की दीक्षा महात्मा तोतापुरी से ली थी और तंत्र-साधना एक भैरवी से सीखी थी। इस्लामी साधना गोविन्द राय ने सिखायी जो हिन्दू से मुसलमान हो गये थे और ईसाइयत की साधना उन्होंने ईसाई धर्म के ग्रंथों के अच्छे जानकार शंभुचरण मल्लिक से सीखी। मगर इन सभी साधनाओं में रमने के उपरांत धर्म के गूढ़ रहस्यों को हृदयंगम कर मां काली के चरणों में उनका विश्वास अचल हो गया।

जैसे बालक प्रत्येक वस्तु की याचना अपनी मां से करता है, वैसे ही रामकृष्ण भी हर चीज काली से मांगते थे और हर काम उनकी आज्ञा से करते थे। रामकृष्ण जी का कहना था कि वे नहीं वरन मां काली सदैव उनकी उंगली पकड़े रहती हैं। स्वामी निर्वेदानंद ने रामकृष्ण परमहंस को हिन्दू धर्म की गंगा कहा है जो वैयक्तिक समाधि के कमंडल में बंद थी। स्वामी विवेकानंद इस गंगा के भागीरथी हुए और उन्होंने देवसरिता को रामकृष्ण के कमंडल से निकालकर सारे विश्व में फैला दिया। वस्तुतः हिन्दू धर्म में जो गहराई और माधुर्य है, रामकृष्ण परमहंस उसकी प्रतिमा थे। उनकी इन्द्रियां पूर्ण रूप से उनके वश में थीं। संभवतः यही कारण था कि मैक्समूलर और रोम्यां रोला जैसे सुप्रसिद्ध पाश्चात्य विद्वानों ने परमहंस जी की जीवनी लिखकर स्वयं को धन्य किया था।

स्वामी जी के पत्रों से गुरु के प्रति झलकती श्रद्धा

अमरीका पहुंचने के बाद 29 जनवरी, 1894 को शिकागो से एक पूर्व दीवान श्री हरिदास बिहारीदास देसाई को स्वामी विवेकानंद लिखते हैं, “यदि मैं संसार त्याग न करता तो जिस महान आदर्श का मेरे गुरुदेव श्री रामकृष्ण परमहंस उपदेश करने आये थे, उसका प्रकाश न होता। उन्होंने भारत; विशेषत: बंगाल का  बहुत कल्याण किया है। दर्शन, विज्ञान या अन्य किसी भी विधा की थोड़ी भी सहायता न लेकर इस महापुरुष ने विश्व इतिहास में पहली बार इस सत्य की घोषणा की कि सभी धर्म मार्ग सत्य हैं।

अंग्रेजी शिक्षा के अभिमान में डूबे लोगों को फटकारते हुए स्वामी जी ने कहा, ” ऐ पढ़े लिखे मूर्खों! अपनी बुद्धि पर व्यर्थ गर्व न करो। कभी मैं भी करता था किन्तु विधाता ने मुझे ऐसे महान व्यक्ति के चरणों में अपना जीवन मंत्र पाने को बाध्य किया जो निरक्षर, घोर मूर्तिपूजक और दीखने में पागल जैसा था।” वहीं 3 मार्च 1894 को वाराणसी के एक बड़े विद्वान श्री प्रमदा दास मित्र को उन्होंने लिखा था, “मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि रामकृष्ण के बराबर दूसरा कोई नहीं है। वैसी अपूर्व सिद्धि, वैसी अपूर्व अकारण दया, जन्म-मरण से जकड़े हुए जीव के लिए वैसी प्रगाढ़ सहानुभूति इस संसार में और कहां? इस अद्भुत महापुरुष, अवतार या जो कुछ भी समझिये; ने अपने अन्तर्यामित्व गुण से मेरी सारी वेदनाओं को जानकर स्वयं आग्रहपूर्वक बुलाकर उन सबका निराकरण किया।” इसी तरह मां भारती को विदेशी चंगुल व  सामाजिक कुरीतियों के बंधन से मुक्त कराने के लिए अपने महान गुरु के अप्रतिम योगदान के प्रति श्रद्धा निवेदित करते हुए 1895 में अमरीका से अपने गुरुभाई स्वामी रामकृष्णानंद को पत्र में स्वामी विवेकानंद ने लिखते हैं, “वेद-वेदांत तथा अन्य अवतारों ने जो कार्य भूतकाल में किया, श्री रामकृष्ण ने उसकी साधना एक ही जीवन में कर डाली। उनके जन्म की तिथि से सत्य युग आरंभ हुआ है। वे सही मायने में शांति के दूत थे। कभी-कभी उनकी भविष्य दृष्टि चमत्कारिक लगती थी।”

श्री श्री परमहंस व गुरु गोलवलकर

जानना दिलचस्प हो कि श्री श्री रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गुरु गोलवलकर के मध्य एक अनूठा, अलौकिक व आध्यात्मिक संबंध था। स्वामी विवेकानंद के राष्ट्र निर्माण के अभियान को संघ के माध्यम से जमीनी स्तर पर साकार करने वाले गुरु गोलवलकर संघ में आने से पूर्व स्वामी रामकृष्ण के शिष्य स्वामी अखंडानंद की प्रेरणा से रामकृष्ण मिशन की आध्यात्मिक धारा से जुड़े थे। संघ के मनीषियों का कहना है कि अगर गुरु जी 19 वीं शताब्दी के प्रारंभिक दौर में पैदा हुए होते तो शायद वे स्वामी  रामकृष्ण के प्रत्यक्ष शिष्य होते और अगर वे 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में पैदा हुए होते तो स्वामी विवेकानंद के। परन्तु वे 20वीं शताब्दी में तब पैदा हुए जब समय की मांग प्राचीनकाल के स्वर्णिम भारत के पुनर्निर्माण की थी।

गुरु गोलवलर ने संघ के माध्यम से व्यक्ति निर्माण और राष्ट्र निर्माण के स्वामी विवेकानंद के अभियान के सबसे श्रमसाध्य पहलू को पूरा करने के लिए आध्यात्मिक साधना को छोड़ समाज सुधारक की भूमिका अपना ली। आध्यात्मिक और राष्ट्रवादी दृष्टि रखने वाले गुरु जी सही मायने में मां भारती के अनन्य सेवक थे। श्री श्री रामकृष्ण के राष्ट्रवादी विचारों को अपने जीवन में अमली जामा पहनाने वाले गुरु जी स्वयं के लिए मोक्ष का मार्ग खोजने वाले नहीं, अपितु एक ऐसे संत थे जिन्होंने सनातन धर्म की पुर्नस्थापना हेतु अपना समूचा जीवन समर्पित कर दिया था।

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