महाराष्ट्र सरकार द्वारा मुस्लिम समुदाय के कुछ वर्गों को दिए जा रहे 5 प्रतिशत SEBC (सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग) आरक्षण को खत्म कर दिया है। सरकार का कहना है कि यह फैसला किसी नए राजनीतिक निर्णय का परिणाम नहीं है, बल्कि वर्ष 2014 की नीति से जुड़ी कानूनी स्थिति को स्पष्ट करने और सरकारी रिकॉर्ड को दुरुस्त करने के उद्देश्य से लिया गया है।
वर्ष 2014 में तत्कालीन कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने मुस्लिम समुदाय के कुछ सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को विशेष पिछड़ा वर्ग-ए (SBC-A) श्रेणी के अंतर्गत 5 प्रतिशत आरक्षण देने का निर्णय लिया था। इस योजना का मकसद उन मुस्लिम समुदायों की मदद करना था जो पहले से ही पीछे रह गए हैं। इसके तहत उन्हें पढ़ाई और नौकरी के बेहतर मौके दिए गए। सरकारी और अर्ध-सरकारी नौकरियों में सीधी भर्ती और स्कूल–कॉलेज में आरक्षण की सुविधा दी गई। साथ ही, सही लोगों को जाति प्रमाण पत्र और वैलिडिटी प्रमाण पत्र जारी करने के निर्देश दिए गए ताकि यह पक्का हो सके कि लाभ उन तक पहुंचे।
हालांकि, इस फैसले को उसी वर्ष अदालत में चुनौती दी गई। बॉम्बे हाईकोर्ट ने 14 नवंबर 2014 को एक अंतरिम आदेश जारी करते हुए राज्य सरकार के अधीन सरकारी नौकरियों में इस आरक्षण पर रोक लगा दी। इसके बाद यह मामला लंबे समय तक न्यायिक प्रक्रिया में उलझा रहा और नीति की वैधता पर अंतिम निर्णय नहीं हो सका। चूंकि यह व्यवस्था अध्यादेश के माध्यम से लागू की गई थी, इसलिए इसे विधानसभा में स्थायी कानून का रूप नहीं मिल पाया। देवेंद्र फडणवीस सरकार का कहना है कि जैसे ही अध्यादेश की समय-सीमा खत्म हुई, उससे जुड़े सभी सरकारी आदेश अपने-आप बेअसर हो गए। इसी वजह से सामान्य प्रशासन विभाग ने 2014 और 2015 में जारी किए गए सभी संबंधित आदेशों और परिपत्रों को औपचारिक रूप से रद्द कर दिया।

















