पांच से 16 साल की उम्र के एक औसत बच्चे का व्यवहार बीते पांच से छह साल में तेजी से बदला है। गुस्सा, जिद, चुप रहने की आदत अप्रत्याशित जवाब आदि बच्चों व किशोरों के व्यवहार पर तेजी से हावी हो रहे हैं। घर में स्मार्ट टीवी, लैपटॉप, टैबलेट, डेस्कटॉप और गेम कंसोल-सब इंटरनेट से जुड़े हैं। यानी पूरी दुनिया बच्चे की उंगलियों पर है। ऐसे में इंटरनेट और स्मार्ट फोन का सीमित या नियंत्रित प्रयोग चुनौती बन गया है।
गाजियाबाद में तीन बहनों का मामला सुर्खियां बना, लेकिन इसी बीच अगले दिन एक और रील इंटरनेट पर वायरल होती है, पटना के एक स्कूल में तकरीबन 16 साल के एक लड़के ने अध्यापिका को थप्पड़ मार दिया। वजह केवल यह थी कि अध्यापिका बच्चे से रोज देरी से आने का कारण पूछती थी, छात्र ने गुस्से में जवाब दिया, पूछने का इतना हक तो मैंने अपने मम्मी-पापा को नहीं दिया, आप कौन होती हैं? पूरा मामला सीसीटीवी में कैद हो गया, वजह कुछ भी हो सकती हैं, गलत परवरिश, संस्कारों की कमी, तनाव या फिर मोबाइल की लत, लेकिन बच्चों का सामान्य दिखने वाला व्यवहार मनमानी पूरी नहीं होने पर असामान्य हो जाता है।
बच्चों के व्यवहार में बदलाव पर यदि नोटिस करने को कहा जाएं तो अमूमन हर तीसरे घर में यह समस्या देखी जा सकती है, जहां मोबाइल की आदत आम हो चुकी है, कभी जिद पूरी करने के लिए तो कभी अपनी सहूलियत को देखते हुए माता पिता आसानी से उन बच्चों को भी मोबाइल दे रहे हैं, जिन्हें अभी चम्मच तक पकड़ना नहीं आता। मेट्रो में समूह के बीच एक महिला को बात करते हुए सुना कि उनका तीन साल का बेटा मोबाइल देखे बिना खाना नहीं खाता, होश संभालने से पहले वह मोबाइल पर बड़ी तेजी से उंगलियां चलाता है, जिस बात को बच्चे की मां गर्व के साथ कह रही थी, कल सही आदत बच्चों के मौलिक व्यवहार पर हावी हो जाएगी, उस समय हम कहते हैं कि बच्चे मोबाइल से प्यार करते हैं माता-पिता से नहीं।
आर्थिक सर्वेक्षण में दिखी सच्चाई
इसी वर्ष केंद्रीय बजट सत्र के ठीक पहले संसद के पटल पर देश का आर्थिक सर्वेक्षण जारी किया गया, जिसमें कहा गया कि युवाओं में सोशल मीडिया और फोन की लत का सीधा असर पढ़ाई और काम करने की जगह पर उत्पादकता पर पड़ रहा है। रील स्क्राल करने की आदत अफीम के नशे से भी अधिक गंभीर हो गई हैं, जो केवल बच्चों में ही नहीं लगभग हर उम्र पर हावी है। सर्वेक्षण के अनुसार करीब 75 प्रतिशत छात्र पढ़ाई के दौरान भी सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं, जिससे उन्हें फोकस करने में दिक्कत होती है। इसके साथ ही लंबे समय तक एकाग्रता से पढ़ाई भी नहीं हो पाती। आर्थिक सर्वेक्षण के रिपोर्ट के बाद इस बात पर भी बहस शुरू हुई कि क्या फेसबुक और इंस्टाग्राम कंपनियां सोची समझी रणनीति के तहत भारतीय बच्चों को बौदि्धक रूप से कम कुशल बनाने पर काम कर रही हैं, क्योंकि चीन सहित कई देशों ने बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर सख्त पाबंदिया लगा दी हैं।
कैली जीएम का मामला देखें
इस संदर्भ में कैलिफोर्निया की कोर्ट में जारी 20 वर्षीय कैली जीएम का मुकदमा भारत के लिए नजीर बन सकता है। दरअसल कैली ने मेटा और यूट्यूब पर आरोप लगाया कि कंपनियों ने जान-बूझकर इन एप को लत के रूप में डिजाइन किया है। कैली ने छह साल की उम्र में यूटूयूब शुरू किया, 11 साल की उम्र में इंस्टाग्राम पर एकाउंट बनाया और आज 20 साल की उम्र में घनघोर मानसिक परेशानियों से जूझ रही हैं। भारत में यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर एकाउंट बनाने के नियम हैं लेकिन बाध्यताएं अधिक नहीं हैं, जिसे आसानी से पास कर अकाउंट बनाया जा सकता है। बात यहां यूट्यूबर बनने से अधिक रील देखने और स्क्रीन टाइम पर ध्यान देने की जरूरत की है।

हालांकि रील देखकर बड़े होते बच्चों की पीढ़ी अभी देखना बाकी हैं, लेकिन कोविड के बाद से जो परिणाम सामने आएं वह सचेत करने वाले हैं। अधिकांश माता पिता इस बात को स्वीकार करते हैं कि जब से बच्चों की ऑनलाइन क्लास लगने लगी है तब से उनका इस बात पर नियंत्रण नही हैं कि बच्चे मोबाइल पर पढ़ाई कर रहे हैं या फिर गेम या कुछ और प्रतिबंधित कंटेंट देख रहे हैं। पेशे से अध्यापिका एक अभिवावक ने बताया कि साल में अधिकांश समय अब ऑनलाइन क्लास रहती हैं, कभी प्रदूषण, कभी बारिश, तो कभी ठंड, ऐसे में मैं खुद अपने बच्चों को मोबाइल का प्रयोग करने से नहीं रोक पाती। गाजियाबाद की घटना के बाद यूपी सरकार ने पांचवी कक्षा तक के बच्चों की ऑनलाइन क्लास पर प्रतिबंध लगा दिया है, लेकिन क्लास से इतर भी अब बच्चों व किशारों की दुनिया काफी व्यापक हो गई है। इसलिए मोबाइल केवल पढ़ने के लिए इस्तेमाल करना अकेला मुद्दा नहीं रह गया।
सोशल मीडिया को लेकर बने सख्त गाइडलाइन
बावजूद इनसब के डिजिटल दुनिया के महत्व को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता और न ही इंटरनेट के महत्व का कम आंका जा सकता। आज जो जानकारी केवल किताबों तक सीमित थी, अब उसके कई पहलू एक क्लिक पर उपलब्ध है। इस लिहाज से नीति निर्धारकों को दोनों पहलुओं को ध्यान में रखते हुए सोशल मीडिया प्रयोग के लिए सख्त गाइडलाइन तैयार करनी चाहिए जिससे हमारी पीढ़ी दुनिया की जेन जी से ज्ञान, कौशल और तकनीक में पीछे न रह जाएं और न कि तकनीकि के गलत प्रयोग की शिकार हो।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
इहबास (इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेव्यिर एंड एलायड साइंसेस) के मनोचिकित्सक डॉ ओम प्रकाश कहते है कि आर्थिक सर्वेक्षण के बाद तेजी से इस विषय पर बहस शुरू हुई लेकिन अगले ही दिन बजट में कांटेट क्रिएटर के लिए ट्रेनिंग और कार्यशालाओं की घोषणा भी की गई। भारतीय संचार तकनीकी पांच जीबी से छह जीबी की स्पीड की ओर बढ़ रही हैं, ऐसे में बच्चों पर इसके नकारात्मक प्रभावों के लिए ठोस रणनीति बनानी होगी और निश्चित रूप से इसमें परिवार और स्कूल प्रशासन की बड़ी जिम्मेदारी होनी चाहिए।
शोधकर्ताओं की सलाह
एम्स की चाइल्ड न्यूरोलॉजिस्ट डॉ शेफाली गुलाटी कहती हैं कि शराब और तंबाकू की तरह स्मार्टफोन के इस्तेमाल पर भी 13 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए पाबंदी लगाई जानी चाहिए। साथ ही, डिजिटल साक्षरता अनिवार्य की जानी चाहिए। छात्रों को सिंपल मोबाइल फोन दिए जाएं या फिर ऐसे टैबलेट दिए जाए, जो सिर्फ पढ़ाई के काम आएं. इससे बच्चों का ध्यान पढ़ाई पर रहेगा और वो बेवजह सोशल मीडिया में समय बर्बाद करने से बच सकेंगे।
कुछ तकनीकी उपाय
- 16 साल की उम्र के बच्चे माता पिता की निगरानी में करें एआई का इस्तेमाल
- एआई के बच्चों के लिए सुरक्षित वर्जन लांच किए जाने चाहिए, जिसे फिल्टर्ड फाइल इस्तेमाल हों
- क्लास छह तक पूरी तरह डिवाइस फ्री क्लासरूप होने चाहिए
- ग्रेड 5 से साइबर सुरक्षा पाठ्यक्रम को अनिवार्य रूप से लागू करना चाहिए, जिससे गेमिंग और साइबर ठगी से बचा जा सके।
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