हाल ही में एक फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ के टीजर में जिस प्रकार हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाई गई उससे एक बार फिर यह स्पष्ट हो गया है कि बॉलीवुड के कुछ लोग आसानी से सुधरने वाले नहीं। लेकिन इधर हिंदू समुदाय ने भी अपनी शक्ति प्रदर्शित कर दिखा दिया कि अब हिंदू समाज जाग्रत हो चुका है। सनातन का अपमान अब सहन नहीं होगा। यदि किसी फिल्मकार ने हिंदू धर्म और हिंदुओं का मजाक बनाकर उनकी या उनके विद्वानों और देवी देवताओं की गंदी और बेहूदी छवि प्रस्तुत करने की जुर्रत की तो वह सहा नहीं जाएगा। ओटीटी नेटफिलिक्स की फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ के विरोध में जिस प्रकार सारे हिंदू समाज ने तुरंत सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर अपनी आवाज बुलंद की उससे ओटीटी और सिनेमा के कई बड़े दिग्गज कांप उठे हैं।
असल में नेटफिलिक्स ने मुंबई में 3 फरवरी को वर्ष 2026 में अपने प्लेटफॉर्म पर दिखाए जाने वाले नए कार्यक्रमों की घोषणा की। जिसमें नीरज पांडे की फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ भी शामिल थी। लेकिन नेटफिलिक्स के लिए यह वार्षिक घोषणा ‘सिर मुंडाते ही ओले पड़े’ जैसा साबित हुई। जैसे ही ‘घूसखोर पंडत’ का टीजर सामने आया तो हंगामा मच गया। सबसे पहले तो इस फिल्म के नाम पर ही ब्राह्मण समाज आक्रोशित हो उठा। फिल्म का नाम ‘घूसखोर पंडत’ दर्शाता है कि पंडित घूसखोर-रिश्वतखोर है। सिर्फ इतना ही नहीं फिल्म के नायक पुलिस अधिकारी अजय दीक्षित के परिचय में उसे ‘पंडत’ नाम से बदनाम और भ्रष्ट होने के साथ उसे चरित्रहीन भी बताया है।
कई शहरों में हुए प्रदर्शन
फिल्म को लेकर भोपाल, इंदौर, उज्जैन, बनारस, लखनऊ, मथुरा, अयोध्या, जयपुर और मुंबई सहित देश के कई शहरों में इतने तीव्र प्रदर्शन हुए कि सभी हैरान हो गए। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पुलिस को सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए। मुख्यमंत्री के निर्देश पर लखनऊ के हजरतगंज कोतवाली के प्रभारी निरीक्षक विक्रम सिंह ने संज्ञान लेते हुए फिल्म के निर्देशक और उनकी पूरी टीम के विरुद्ध सुसंगत धाराओं में 6 फरवरी को प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) पंजीकृत कर दी। एफआईआर में फिल्म की टीम पर जो आरोप लगाए वे निश्चय ही बेहद गंभीर हैं।

एफआईआर में फिल्म के प्रति तीन मुख्य बिन्दु हैं- जातिगत अपमान, सामाजिक आक्रोश और शांति भंग करने का प्रयास। जिसमें कहा गया है, फिल्म का शीर्षक एक विशेष समुदाय, जाति (ब्राह्मण) को लक्षित कर अपमानित करने के उद्देश्य से रखा गया है। जिससे समाज में आक्रोश व्याप्त है। साथ ही प्रथम दृष्ट्या यह प्रतीत होता है कि निर्देशक और उनकी टीम द्वारा समाज में वैमनस्यता फैलाने, शांति भंग करने और सौहार्द बिगाड़ने के उद्देश्य से इस सामग्री को दिखाया गया है। उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से भी कहा गया कि किसी भी समुदाय की भावनाओं को आहत करने या शांति व्यवस्था के साथ खिलवाड़ करने वाले तत्वों के विरुद्ध ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति के अंतर्गत कठोरतम कार्रवाई की जाएगी।
‘फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया’ सिने एम्पलाइज ने भी इस फिल्म के शीर्षक और सामग्री को आपत्तिजनक और हिंदू समुदाय का अपमान बताते हुए फिल्म के प्रतिबंध की मांग की। साथ ही ओटीटी की फिल्मों आदि के शीर्षक के लिए भी अनिवार्य पंजीकरण कराने पर जोर दिया। उधर राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने भी सूचना प्रसारण मंत्रालय को नोटिस भेजकर फिल्म के निर्माताओं के विरुद्ध कार्रवाई करने के लिए कहा। केंद्र सरकार ने भी नेटफिलिक्स से इसका टीजर हटा देने के आदेश देने में देर नहीं लगाई।
इस सबके साथ वरिष्ठ अधिवक्ता विनीत जिंदल ने दिल्ली उच्च न्यायालय में भी फिल्म के शीर्षक पर जन भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाते हुए एक याचिका 4 फरवरी को दायर कर कहा कि इस फिल्म के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगाया जाए।
एक साथ एक फिल्म पर चौतरफा हमले से ओटीटी प्लेटाफॉर्म नेटफिलिक्स, इस फिल्म के निर्माता नीरज पांडे निर्देशक रितेश शाह और मनोज बाजपेयी सहित फिल्म से जुड़े अन्य लोगों को भी दिन में तारे नजर आने लगे। यह देखते हुए जहां नीरज पांडे और मनोज बाजपेयी फिल्म को लेकर सफाई देते और क्षमा मांगते हुए सामने आए। तत्काल फिल्म के टीजर और इससे जुड़ी सभी सामग्री सोशल मीडिया के सभी मंचों से भी तभी हटा दी। इस दौरान फिल्म के शीर्षक को लेकर बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती भी फिल्म के विरोध में खुलकर उतर आईं।
फिल्म की टीम के विरुद्ध उच्च न्यायालय कोई और निर्णय ले, इससे पूर्व ही फिल्मकार ने अपनी फिल्म का शीर्षक बदलने का निर्णय लेकर शपथ पत्र न्यायालय में दाखिल करा दिया। साथ ही यह आश्वासन भी दिया कि इस फिल्म में कोई संवाद या सामग्री ऐसी नहीं होगी जिससे किसी समुदाय को ठेस पहुंचे। निर्माताओं का यह निर्णय देख न्यायालय ने इस याचिका का निपटारा कर दिया। यह निश्चय ही हिंदू समुदाय की, सनातन की बड़ी जीत है। लेकिन यह भी कि इस विवाद से फिल्म को करोड़ों रुपए का प्रचार मुफ्त में मिल गया।
घटिया सोच
यह सच है कि असंख्य फिल्में समाज का आइना बनकर भी दर्शकों के सामने आती रही हैं। साथ ही यह भी कि समाज के किसी वर्ग में भी अच्छे और बुरे दोनों किस्म के लोग मिलते रहते हैं। इसलिए समाज में व्याप्त बुराई को दिखाने में कुछ गलत नहीं। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि कुछ फिल्मकारों, पटकथा लेखकों को हिन्दू समुदाय में ही बुरे लोग क्यों दिखते हैं ? आज ही नहीं बरसों से सिर्फ हिन्दू धर्म और हिन्दू देवी देवताओं का उपहास करता रहा है। ऐसा भी नहीं कि हिंदू धर्म का मजाक उड़ाने वाले और उनकी बेहूदी तस्वीर प्रस्तुत करने वाले फिल्मकार और लेखक गैरहिन्दू ही हों।
इस फिल्म के निर्माता और लेखक नीरज पांडे और फिल्म में मुख्य भूमिका निभाने वाले मनोज बाजपेयी तो स्वयं हिंदू हैं और जाति ब्राह्मण हैं। फिर भी उन्होंने ब्राह्मण समुदाय की छवि धूमिल करने का प्रयास क्यों किया ? नीरज कहते हैं- ‘’यह एक काल्पनिक पात्र है। किसी हिंदू समुदाय को गलत दिखाने की कोई दुर्भावना नहीं है।‘’ माना कि यह काल्पनिक पात्र होगा। लेकिन हमारे कितने ही फिल्मकारों की कल्पना में बुरे लोग सिर्फ हिन्दू ही क्यों आते हैं? क्या पांडे या मनोज फिल्म का नाम घूसखोर मौलवी या घूसखोर पादरी रखने का साहस कर सकते थे ? जवाब होगा कभी नहीं। हकीकत क्या, कल्पनाओं में भी नहीं। क्योंकि हिंदू समुदाय अपनी सनातन प्रवृत्ति के चलते शांत अधिक रहता है। हमारी इसी उदारता को फिल्मकार कमजोरी मानकर हिंदू समाज को लेकर कुछ भी दिखाते रहते हैं।

दशकों से ऐसा करते आए हैं फिल्मकार
फिल्मकारों को हिंदू योगियों, ऋषियों, पंडितों, पुजारियों में दुष्कर्म व्यक्तित्व दिखाने की होड़ सी रही है। सन 1957 में महबूब खान की एक फिल्म आई थी ‘मदर इंडिया’। जिसमें भगवान भक्त सुखी लाला की भूमिका करने वाले अभिनेता कन्हैया लाल, फिल्म की नायिका राधा (नर्गिस) का शोषण ही नहीं करता, उसके साथ बलात्कार करने का प्रयास भी करता है। जब अपने बच्चों को भूख से मरता देख, मदद के लिए राधा रात को सुखी लाला के पास पहुंचती है तो वह देवी की उपासना कर रहा होता है। लेकिन पल भर में ही परस्त्री, भूख से तड़पते बच्चों की अबला मां राधा के प्रति उसमें वासना जाग उठती है।
राज कपूर के निर्देशन में 1985 में प्रदर्शित उनकी अंतिम फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ में भी दिखाया है कि नायिका गंगा जब बनारस के घाट पर एक पंडित से मदद मांगती है तो वह उसे मदद देने के बहाने अपने घर ले जाकर उसके साथ बलात्कार कर देता है। ध्यान से देखें तो हमारे फिल्मकार अपनी अधिकांश फिल्मों में भगवाधारी ही नहीं, धोती कुर्ता पहने जनेऊ धारी, माला धारी तिलक धारी व्यक्तियों को दुष्ट, भ्रष्ट दिखाते ही रहे हैं।
पीछे तो तब हद ही हो गई जब फिल्म ‘आदिपुरुष’ में प्रभु श्रीराम और हनुमान जी को लेकर बेहूदे संवादों का प्रयोग किया गया, उन्हें कमजोर दिखाया गया। इससे पूर्व फिल्म ‘पीके’ में भी भगवान शिव की वेश भूषा में एक कलाकार का जन शौचालय में बंद करके घोर उपहास किया गया। हिंदू धर्म को लेकर पाखंड और अंधविश्वास दिखाया गया। फिल्म ‘ओह माय गॉड’ में भी हिंदू रीति रिवाजों, मूर्तियों के अभिषेक पर सवाल उठाए गए। 2021 की वेब सीरीज ‘तांडव’ में तो भगवान शिव का रूप धरे व्यक्ति को ‘आजादी’ जैसे नारे लगाते हुए दिखाया गया। इससे पहले 2005 में दीपा मेहता की फिल्म ‘वाटर’ में भी बनारस में रह रही विधवाओं की स्थिति का धर्म बदनाम करने वाला चित्रण किया गया। इस सबका भी हिंदू समाज ने जमकर विरोध किया, सेट जला दिए गए। यह देख दीपा को फिल्म की शूटिंग भारत की जगह श्रीलंका में करनी पड़ी।
ऐसे दस बीस नहीं हजारों उदाहरण हैं, जो बताते हैं कि फिल्मकार रह रह कर हिंदू धर्म और सनातन संस्कृति की छवि देश–विदेश में धूमिल करते रहे हैं। लेकिन अब समय बदल रहा है। इस फिल्म के निर्माता–निर्देशक को जिस तरह अपनी करतूत के लिए मुंह की खानी पड़ी। हिंदुओं का आक्रोश देख उनकी कल्पनाएं जिस तरह एक झटके में हवा हो गईं। उसे देख प्रतीत होता है कि अब बॉलीवुड को सुधरना ही होगा!















