महाराष्ट्र के सौंदला गांव ने खुद को घोषित किया देश का पहला 'जाति मुक्त' गांव
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महाराष्ट्र के सौंदला गांव ने खुद को घोषित किया देश का पहला ‘जाति मुक्त’ गांव

महाराष्ट्र के अहिल्यानगर जिले के नेवासा तालुका स्थित सौंदला गांव ने 5 फरवरी 2026 को ग्रामसभा में सर्वसम्मति से खुद को 'जाति मुक्त' घोषित किया। ग्रामीण अब जातिसूचक सरनेम नहीं इस्तेमाल करेंगे, मानवता को एकमात्र धर्म मानेंगे।

Written byकुलदीप सिंहकुलदीप सिंह
Feb 16, 2026, 02:19 pm IST
inमहाराष्ट्र

महाराष्ट्र के अहिल्यानगर जिले (पूर्व अहमदनगर) में नेवासा तालुका के एक छोटे से गांव सौंदला ने हाल ही में खुद को देश का पहला ‘जाति मुक्त’ गांव घोषित कर दिया है। गांव की ग्रामसभा ने एक खास बैठक में ये फैसला सर्वसम्मति से लिया गया है। गांव की आबादी करीब 25,000 के आसपास है, और यहां के लोग अब जाति के आधार पर किसी भी तरह का भेदभाव या पहचान खत्म करने का संकल्प ले चुके हैं।

ग्रामसभा में क्या हुआ?

5 फरवरी 2026 को गांव में एक विशेष ग्रामसभा बुलाई गई। इसकी अध्यक्षता ग्राम प्रधान शरद बाबूराव अरगड़े ने की। बैठक में गांव के लगभग सभी लोग शामिल हुए – सवर्ण, बहुजन समुदाय के लोग और कुछ मुस्लिम परिवार भी। सबने मिलकर एक प्रस्ताव पास किया, जिसमें लिखा है कि अब से सौंदला गांव में कोई भी जाति का पालन नहीं करेगा, न ही किसी तरह की जातिगत प्रथा चलेगी। इसके बजाय मानवता ही एकमात्र धर्म होगी। प्रस्ताव में भारतीय संविधान की प्रस्तावना का जिक्र है और ये कहा गया है कि गांव वाले अब सिर्फ इंसानियत के रास्ते पर चलेंगे।

गांव में क्या-क्या बदलाव आएंगे?

लोग अपने नाम के आगे जातिसूचक सरनेम (उपनाम) का इस्तेमाल नहीं करेंगे।
स्कूल एडमिशन या किसी भी सरकारी/गैर-सरकारी काम में बच्चों को पिता का नाम या ‘भारतीय’ लिखने की सलाह दी जाएगी।
किसी भी सामाजिक या सरकारी कार्यक्रम में जाति का जिक्र नहीं होगा।
त्योहारों पर ‘एक पंगत’ में सब साथ बैठकर खाना खाएंगे, अलग-अलग ग्रुप नहीं बनेंगे।
मंदिरों और कुओं का इस्तेमाल सब बराबर करेंगे, किसी एक समुदाय का दबदबा नहीं रहेगा।
अगर कोई जातिगत भेदभाव करेगा तो पंचायत कार्रवाई करेगी।

ये आइडिया कैसे आया?

गांव के पढ़े-लिखे युवाओं ने ये बात शुरू की। वो देखते थे कि चुनावों में या त्योहारों पर जाति की वजह से झगड़े हो जाते हैं, समाज आगे नहीं बढ़ पाता। उन्होंने पहले बुजुर्गों से बात की, समझाया, और धीरे-धीरे पूरा गांव इस विचार से जुड़ गया। पहले भी गांव ने कुछ अच्छे फैसले लिए थे–जैसे विधवाओं के साथ भेदभाव रोकने का प्रस्ताव, गाली-गलौज पर 500 रुपये जुर्माना, और CCTV लगाकर निगरानी। एक बार 13 लोगों पर जुर्माना भी लगा था। यहां तक कि एक विधवा की दोबारा शादी भी हुई, जो पहले मुश्किल था।

सरपंच और अफसरों की बात

सरपंच शरद अरगड़े कहते हैं, “ये प्रस्ताव जाति के भेदभाव को खत्म करने और एकता लाने के लिए है। असल चुनौती ये है कि सरकारी कागजों में जाति सर्टिफिकेट और आरक्षण की जरूरत पड़ती है, लेकिन दिमाग से जाति खत्म करना ज्यादा जरूरी है।” जिलाधिकारी ने इस कदम की तारीफ की और कहा कि ये ‘सच्चा लोकतंत्र’ है। वो गांव को मॉडल विलेज बनाने के लिए स्पेशल ग्रांट देने पर विचार कर रहे हैं।

एक युवा सामाजिक कार्यकर्ता ने बताया, “चुनाव या उत्सव में जाति की वजह से परेशानी होती थी। हमने सोचा कि असली तरक्की के लिए इस पुरानी जंजीर को तोड़ना होगा। बुजुर्गों को समझाया, और आज पूरा गांव साथ है।”

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कुलदीप सिंह
कुलदीप सिंह
नागपुर स्थित राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज विद्यापीठ (नागपुर यूनिवर्सिटी) से मॉस कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट। बीते एक दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विशेष रुचि। पत्रकारिता की इस यात्रा की शुरुआत नागपुर नवभारत में इंटर्नशिप से शुरू होती है, तदोपरांत GTPL न्यूज चैनल, लोकमत समाचार, ग्रामसभा मेल, मोबाइल न्यूज 24 और Way2News हैदराबाद के बाद अब पाञ्चजन्य के साथ सफर जारी है। [Read more]
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