संविधान की शपथ और विरोधाभासी राजनीतिक आचरण
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संविधान की शपथ और विरोधाभासी राजनीतिक आचरण

जब वरिष्ठ नेता संयम और अनुशासन का उदाहरण प्रस्तुत करने के बजाय टकराव को वैधता देते दिखें, तो कार्यकर्ताओं और सांसदों से मर्यादा पालन की अपेक्षा निश्चित ही कठिन हो जाती है।

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Feb 14, 2026, 08:52 am IST
inभारत, सम्पादकीय, संविधान

भारत की सबसे बड़ी शक्ति यदि कुछ है, तो वह है उसकी संस्कृति। और इस शक्ति की उद्घोषणा क्या है? भारतीय संस्कृति के प्रवाह और मूल्यों से पल्लवित इस देश का संविधान। भारत का संविधान केवल शासन संचालन का विधिक दस्तावेज नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन का दिशासूचक भी है।

स्मरण रखिए, जब कोई मुख्यमंत्री, सांसद या मंत्री पद की शपथ लेता है, तो वह केवल शब्द नहीं दोहराता, वह एक व्रत ग्रहण करता है कि वह संविधान की मर्यादा, उसकी मूल भावना और उसकी संस्थाओं की रक्षा करेगा। किंतु बीते वर्षों की अनेक घटनाएं संकेत देती हैं कि लोकतंत्र के भीतर से ही लोकतांत्रिक मूल्यों को चुनौती देने की प्रवृत्ति गहरा रही है। ऐसे में चिंता जगाने वाला प्रश्न किसी एक दल का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति का है जिसमें शपथ और आचरण के बीच अंतर बढ़ता जा रहा है।

इसका पहला उदाहरण पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी व उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस से जुड़ा है। भारत का संघीय ढांचा सहकारी संघवाद पर आधारित है। संविधान के अनुच्छेद-256 और 257 स्पष्ट करते हैं कि राज्यों का दायित्व है कि वे संसद द्वारा बनाए गए कानूनों और केंद्र की वैध नीतियों के क्रियान्वयन में सहयोग करें। राज्यों को असहमति का अधिकार अवश्य है, किंतु नहीं भूलना चाहिए कि असहमति तथा असहयोग दो भिन्न बातें हैं। असहयोग की राजनीति संघीय संतुलन को कमजोर कर सकती है।

पश्चिम बंगाल में केंद्र की कुछ प्रक्रियाओं, विशेषकर मतदाता पहचान सत्यापन या नागरिकता से संबंधित प्रश्नों जैसे-एसआईआर पर राज्य सरकार द्वारा तीखा प्रतिरोध दर्ज किया गया। यदि यह प्रतिरोध विधिक व्याख्या और संवैधानिक आशंकाओं पर आधारित हो, तो वह लोकतांत्रिक अधिकार के दायरे में आता है। परंतु जब प्रतिरोध प्रशासनिक ठिठकन का रूप ले ले और उसे राजनीतिक ध्रुवीकरण का औजार बनाया जाए, तब प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या संघीय ढांचे की भावना आहत हो रही है?यह तब है, जब सीमावर्ती राज्य होने के कारण पश्चिम बंगाल की अवैध प्रवासन और घुसपैठ के मुद्दे पर विशेष जिम्मेदारी बनती है। राष्ट्रीय सुरक्षा और स्थानीय जनसांख्यिकीय संतुलन जैसे विषय सभ्यतागत भी हैं और संवेदनशील भी। यदि राज्य सरकार पर यह आरोप लगता है कि वह कठोर कार्रवाई की बजाय राजनीतिक संतुलन साधने में अधिक रुचि रखती है, तो यह केवल विपक्ष का आरोप नहीं रह जाता, बल्कि शासन की विश्वसनीयता का प्रश्न बन जाता है। इस विषय के न्यायिक परीक्षण और पारदर्शी जांच ने राज्य सरकार की हठधर्मिता को स्पष्ट रूप से उजागर किया है।

एक और गंभीर पहलू राजनीतिक हिंसा का है। चुनावों के बाद हिंसा, विरोधी कार्यकर्ताओं पर हमलों और प्रशासन की निष्क्रियता के आरोप लोकतंत्र की आत्मा को चोट पहुंचाते हैं। संविधान न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता की बात करता है। यदि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, वैमनस्य और उपद्रव में बदल जाए, तो यह केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं रहती, बल्कि संवैधानिक संस्कृति के क्षरण का संकेत बन जाती है। सत्ता का दायित्व केवल शासन चलाना नहीं, बल्कि भयमुक्त वातावरण सुनिश्चित करना भी है।

दूसरा उदाहरण राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस और उसके नेतृत्व से जुड़े घटनाक्रमों का है। संसद लोकतांत्रिक संवाद का सर्वोच्च मंच है। यहां तीखी असहमति भी मर्यादा के भीतर व्यक्त की जाती है। हाल में केंद्रीय संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू ने आरोप लगाया कि लगभग 20 से 25 कांग्रेस सांसद लोकसभा अध्यक्ष के कक्ष में जबरन घुस गए और अभद्र व्यवहार किया। उन्होंने यह भी कहा कि प्रियंका गांधी वाड्रा और के.सी. वेणुगोपाल जैसे वरिष्ठ नेता वहां मौजूद थे और सांसदों को शांत करने के बजाय उन्हें उकसा रहे थे।

यह आरोप संसदीय परंपराओं के गंभीर उल्लंघन का संकेत है। लोकसभा अध्यक्ष की संस्था दलगत राजनीति से ऊपर मानी जाती है। उसके प्रति असम्मान, अंततः पूरी संसदीय प्रणाली के प्रति असम्मान है। दूसरी ओर, विपक्ष का तर्क अक्सर यह होता है कि जब उनकी बात सुनने से इनकार किया जाता है, तब उन्हें कड़े प्रतिरोध का सहारा लेना पड़ता है। यह तर्क लोकतंत्र में असहमति के अधिकार की याद दिलाता है, परंतु यह भी सच है कि विरोध और अव्यवस्था के बीच एक महीन रेखा होती है। उस रेखा को लांघना लोकतांत्रिक संघर्ष नहीं, संस्थागत क्षरण बन जाता है।

यहां मूल प्रश्न नेतृत्व की भूमिका का है। जब वरिष्ठ नेता संयम और अनुशासन का उदाहरण प्रस्तुत करने के बजाय टकराव को वैधता देते दिखें, तो कार्यकर्ताओं और सांसदों से मर्यादा पालन की अपेक्षा निश्चित ही कठिन हो जाती है। राजनीतिक हताशा यदि रणनीतिक अवरोध में बदल जाए, तो सदन का कामकाज बाधित होता है और इससे अंततः जनता के मुद्दे, उनकी आवाज ही दबती है। इन दोनों उदाहरणों को साथ रखकर देखें तो एक व्यापक प्रवृत्ति उभरती है। लोकतंत्र का सहारा लेकर लोकतंत्र को ही कमजोर करना।
बहुमत की शक्ति का उपयोग असहमति को दबाने में हो या अल्पमत की बेचैनी अव्यवस्थित प्रतिरोध में बदले, दोनों स्थितियां संविधान की मूल भावना के विपरीत हैं। लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने या विरोध दर्ज कराने का माध्यम नहीं, बल्कि नियमों, परंपराओं और पारस्परिक सम्मान की सतत साधना है।

संविधान की प्रस्तावना हमें लोकतांत्रिक गणराज्य और कानून के शासन की दिशा देती है। कानून का शासन यह अपेक्षा करता है कि सत्ता और विपक्ष, दोनों स्वयं को नियमों के अधीन मानें। जब राज्य सरकार केंद्र के साथ टकराव को राजनीतिक पूंजी में बदलती है, या जब विपक्ष संसदीय मंच को संघर्ष के अखाड़े में बदल देता है, तब लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर आंच आती है।

इस स्थिति का समाधान केवल आरोप-प्रत्यारोप में नहीं है। पहली आवश्यकता है संस्थागत संतुलन को बनाए रखना। यह आवश्यक है कि हर परिस्थिति में संसदीय आचरण संहिता का कठोर पालन हो, चाहे उल्लंघन सत्तापक्ष करे या विपक्ष। केंद्र-राज्य विवादों के समाधान के लिए संवाद और मध्यस्थता की विश्वसनीय व्यवस्था मजबूत की जाए। दूसरी आवश्यकता है संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता का संरक्षण और इनका पारदर्शी कामकाज। जब नागरिकों को यह भरोसा हो कि न्यायपालिका, निर्वाचन आयोग या अन्य निकाय निष्पक्ष हैं, तब राजनीतिक संघर्ष भी सीमाओं में रहता है।

तीसरी और शायद सबसे कठिन आवश्यकता राजनीतिक नैतिकता के पुनरुद्धार की है। दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र, नेतृत्व की जवाबदेही और भाषाई संयम अनिवार्य हैं। हिंसक या उत्तेजक आचरण को राजनीतिक चतुराई या त्वरित लोकप्रियता के माध्यम के रूप में नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अपराध के रूप में देखा जाना चाहिए।

अंततः शक्ति जनता की है। मतदाता यदि केवल जातीय, आस्थागत या भावनात्मक मुद्दों पर नहीं, बल्कि संवैधानिक आचरण पर भी निर्णय देंगे, तो राजनीतिक दलों को अपना व्यवहार सुधारना ही होगा।

संविधान की शपथ एक औपचारिकता नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन का नैतिक अनुबंध है। जब यह अनुबंध बार-बार टूटता है, तो केवल किसी एक दल की नहीं, पूरे लोकतंत्र की साख दांव पर लगती है। आज आवश्यकता इस आत्ममंथन की है कि हम लोकतंत्र को हथियार बना रहे हैं या उसे मूल्य की तरह जी रहे हैं। संविधान की रक्षा केवल न्यायालयों या सदनों में नहीं होती, वह राजनीतिक संस्कृति और नागरिक सजगता में भी होती है। इसे राजनीतिक दलों और बटन दबाकर उनका भविष्य तय करने वाले नागरिकों, दोनों को समझना होगा, आत्मसात करना होगा।

X@hiteshshankar

Topics: हठधर्मितासंसदीय आचरण संहितासंविधान की शपथसहकारी संघवादसंस्थागत स्वायत्ततामर्यादा पालनराजनीतिक ध्रुवीकरणरणनीतिक अवरोधलोकतांत्रिक अपराधआत्ममंथनपाञ्चजन्य विशेषनैतिक अनुबंधसंविधान की प्रस्तावनानागरिक सजगता
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हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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