जनरल नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक पर विवाद, भारतीय सेना और नेतृत्व को बदनाम करने का प्रयास
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जनरल नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक पर विवाद, भारतीय सेना और नेतृत्व को बदनाम करने का प्रयास

राहुल गांधी द्वारा पुस्तक (फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी) को सार्वजनिक तौर पर संसद में दिखाना गलत है

Written byलेफ्टिनेंट जनरल एम के दास,पीवीएसएम, बार टू एसएम, वीएसएम ( सेवानिवृत)लेफ्टिनेंट जनरल एम के दास,पीवीएसएम, बार टू एसएम, वीएसएम ( सेवानिवृत)
Feb 13, 2026, 06:17 pm IST
inमत अभिमत
जनरल नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक और राहुल गांधी

जनरल नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक और राहुल गांधी

लोकसभा में विपक्ष के नेता (एलओपी) राहुल गांधी ने जनरल एमएम नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक के अंशों को उद्धृत करने की कोशिश करके विवाद खड़ा कर दिया है। दरअसल, वह कारवां पत्रिका में प्रकाशित एक लेख का हवाला दे रहे थे, जिसमें जनरल नरवणे के अप्रकाशित संस्मरणों के अंशों का इस्तेमाल किया गया है। पुस्तक के प्रकाशक पेंगुइन रेंडम हाउस ने यह स्पष्ट किया है की पुस्तक या उसकी सॉफ्ट कॉपी अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है। जनरल नरवणे ने भी यही बात कही है। इस प्रकार राहुल गांधी जी द्वारा पुस्तक (फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी) को सार्वजनिक तौर पर संसद में दिखाना गलत है। दिल्ली पुलिस भी मामले की छानबीन कर रही है।

कारवां में प्रकाशित लेख सोशल मीडिया पर उपलब्ध है और इसे पढ़ने के बाद, यह कहा जा सकता है कि यह लेख भारतीय सेना और उसके नेतृत्व को बदनाम करने का एक जानबूझकर किया गया प्रयास है। ऐसे निराधार दावों के सैन्य परिप्रेक्ष्य को समझना महत्वपूर्ण है। लेख में कहा गया है कि 31 अगस्त 2020 की शाम को, जब इन्फैंट्री (पैदल सेना) सैनिकों द्वारा समर्थित चार चीनी टैंक पूर्वी लद्दाख में कैलाश रेंज पर रेचिन ला की तरफ बढ़ रहे थे, तो उत्तरी सेना कमांडर ने तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल नरवणे से दिशा-निर्देश मांगे। लेख में कहा गया है कि जनरल नरवणे ने प्रधानमंत्री, आरएम, विदेश मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और सीडीएस सहित शीर्ष नेतृत्व से स्पष्ट निर्देश मांगे हैं कि उभरती स्थिति से कैसे निपटा जाए।

पूर्वी लद्दाख में गलवान की घटना

15 जून 2020 की रात को भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच पूर्वी लद्दाख के गलवान में एक बड़ी हिंसक झड़प के बाद भारत और चीन के बीच संबंधों में नाटकीय मोड़ आ गया। जब भारतीय सैनिकों ने एलएसी के विवादित हिस्से में लगाए गए तंबू हटाने के लिए चीनियों को मनाने के लिए निहत्थे जाकर बातचीत की तो चीनियों ने उन पर लाठी, गदा और कंटीले तारों से हमला किया, जिसमें 20 भारतीय वीरगति को प्राप्त हुए। भारतीय सैनिकों ने नियमों के अनुसार फायर नहीं खोला लेकिन अपनी बहादुरी से चीनी पक्ष को भारी नुकसान पहुंचाया, जिसके परिणामस्वरूप 40 से अधिक चीनी सैनिक मारे गए। गलवान झड़प के बाद भारतीय सेना ने गोली चलाने पर लगी पाबंदियां हटा लीं और चीनियों के साथ युद्ध के नियमों में बदलाव किया गया। इसके अलावा, भारतीय सेना द्वारा पूर्वी लद्दाख में पर्याप्त सुदृढीकरण किया गया और स्ट्राइक तत्वों को आगे भेजा गया ।

भारतीय सैनिकों का शौर्य

भारतीय सैनिकों ने 29-30 अगस्त 2020 की दरम्यानी रात को कैलाश रेंज पर कब्जा करके एक उच्च युद्ध कला का प्रदर्शन किया । इस विशाल पर्वत में हेलमेट टॉप, ब्लैक टॉप, रेजांग ला और रेचिन ला जैसी ऊंचाइयां हैं जो एलएसी के पार चीनी मोल्डो गैरीसन को डोमिनेट करती हैं। यह कैलाश रेंज 1962 के युद्ध के बाद से भारत के पास नहीं थी। ऐसे कठिन इलाके में भी भारतीय सेना अपने टैंकों को इन ऊंचाइयों तक ले जाने में सक्षम रहीं। हालांकि भारतीय सैनिकों के पास इतनी कठिन ऊंचाइयों पर अपनी चौकियाँ तैयार करने के लिए सिर्फ एक दिन का समय था, लेकिन हमारे वीर सैनिक कम समय में भी चीनी खतरे से निपटने के लिए तैयार थे। 12,000 फीट से अधिक की इतनी ऊंचाई पर, रेचिन ला की ओर बढ़ने वाले चार टैंक भारतीय सैनिकों के लिए एक कठिन लक्ष्य नहीं थे।

चीन की चाल

एक बार जब भारतीय सैनिकों ने कैलाश रेंज और आसपास की चोटियों पर कब्जा कर लिया, तो चीनी स्थानीय कमांडरों को चेहरा बचाने के उपाय के रूप में कुछ प्रतिक्रिया दिखानी पड़ी। चीनी सेना जानती थी कि कैलाश रेंज की प्रमुख ऊंचाइयों पर भारतीय सैनिक अच्छी तरह से जमे हुए हैं और इस प्रकार उन्हें बेदखल करने के लिए एक बड़े जवाबी हमले की आवश्यकता होगी। इस तरह के उच्च ऊंचाई वाले इलाके में, आक्रामक अभियानों के लिए बड़े पैमाने पर लड़ाकू श्रेष्ठता की आवश्यकता होती है, कभी-कभी 1:12 के अनुपात में और लड़ाई हफ्तों और महीनों तक चल सकती है। इसलिए, पैदल सेना द्वारा समर्थित चीनी टैंकों की आवाजाही भारतीय सेना की प्रतिक्रिया को जानने का एक तरीका था। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए भारतीय स्थानीय कमांडरों को पूरी तरह से अधिकार पहले से ही दे दिया गया था।

गलवान से ऑपरेशन सिंदूर तक

चूंकि शीर्ष नेतृत्व द्वारा चीनियों के साथ संबंधों पर बारीकी से नजर रखी जा रही थी, इसलिए तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल नरवणे ने उच्च अधिकारियों को सूचित करके सही काम किया। भारत की प्रतिक्रिया पहले से ही भारतीय कमांडरों को पता थी, भले ही 31 अगस्त की रात को कैलाश रेंज में चीनियों के साथ संघर्ष बढ़ जाता। राजनीतिक नेतृत्व ने एक बार फिर भारतीय सेना के नेतृत्व का समर्थन किया और उन्हें जमीनी स्तर पर स्थिति से निपटने के लिए खुली छूट दी, जैसा कि वे उचित समझते हैं। राजनीतिक नेतृत्व युद्ध का माइक्रो मैनिज्मेन्ट नहीं करता है और जमीन पर स्थिति से स्थानीय कमांडर ही फैसला लेते हैं। जैसा बाद के घटनाक्रम में दिखा, चीनी टैंक पीछे हट गए जब उन्होंने भारतीय टैंक की गनों को अपनी तरफ तैयार देखा। भारतीय सैनिकों ने उसके बाद भी पूर्वी लद्दाख में कई चीनी उकसावे वाली कार्रवाइयों का आक्रामक जवाब दिया, जिसे पीएम मोदी के राजनीतिक नेतृत्व द्वारा विधिवत समर्थन दिया गया था। मई 2025 के ऑपरेशन सिंदूर में भी यहीं परम्परा बनी रही।

लेख का समय संदिग्ध

मेरे लिए, कारवां पत्रिका में इस लेख का समय संदिग्ध है। संसद के बजट सत्र से ठीक पहले लेख ने जनरल नरवणे की पुस्तक की अप्रकाशित पांडुलिपि से चुनिंदा रूप से उद्धृत कर मोदी सरकार को नीचा दिखाने की कोशिश की है। यह भी समझना होगा कि राजनीतिक नेतृत्व के साथ सेना प्रमुख का संवाद गुप्त सूचना है। कोई भी सेवानिवृत सेना प्रमुख या शीर्ष सैन्य अधिकारी ऐसी किसी भी संवेदनशील जानकारी को सार्वजनिक डोमेन में नहीं लाना चाहेगा जिससे दुश्मनों को मदद मिलती हो। अपने सैन्य करियर के दौरान, मैंने अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में चीनी सैनिकों का सामना किया है, लेकिन हमें उनसे निपटने के लिए खुली छूट थी। जनरल नरवणे ने खुद मार्च 2021 में स्पष्ट किया है कि भारत का कोई भी क्षेत्र चीनियों के पास नहीं है। मैं अपने अनुभव से कह सकता हूँ कि भारतीय सैनिक हर मौके पर चीनी सैनिकों पर भारी पड़ें हैं।

भारत की चीन पर बड़ी मनोवैज्ञानिक जीत

भारतीय सेना ने पूर्वी लद्दाख में चीनी सेना की ताकत का सामना बहादुरी से किया है और चीन के हर उकसावे का मुंहतोड़ जवाब दिया है। चीनियों ने अंततः हार मान ली और अक्टूबर 2024 में डिसइंगेजमेंट प्रक्रिया के लिए सहमत हो गए। चीन ने 2020 से पहले की स्थिति के लिए एलएसी की गश्त करने पर भी सहमति व्यक्त की और इस प्रकार भारत ने चीन पर एक बड़ी मनोवैज्ञानिक जीत हासिल की है। हम अक्सर रूस-यूक्रेन युद्ध के चार साल से चलने की बात करते हैं। भारतीय सेना इसके कहीं अधिक समय से चीनी सेना से पूर्वी लद्दाख में लोहा ले रही है। इसलिए चीनी खतरे से निपटने के लिए भारतीय सेना के नेतृत्व की क्षमता पर सवाल उठाने वाले एलओपी का बयान बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। इस तरह के आक्षेप, भले ही अनजाने में हों, सैनिकों और अधिकारियों का मनोबल गिराते हैं जो राष्ट्र की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए दिन-रात अपनी जान जोखिम में डालते हैं। राष्ट्र की सुरक्षा के व्यापक हित में इस विवाद को तुरंत समाप्त करना चाहिए।

 

Topics: गलवान की घटनाराहुल गांधीजनरल नरवणेपाञ्चजन्यजनरल नरवणे की किताबफोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी
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