ईरान की क्रांति की वे महिलाएं, जिन्हें सफल क्रांति के बाद मिली मौत?
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ईरान की क्रांति की वे महिलाएं, जिन्हें सफल क्रांति के बाद मिली मौत?

1979 की ईरान क्रांति में लाखों महिलाओं ने हिस्सा लिया, लेकिन इस्लामिक शासन ने उनके सपनों को कुचल दिया। फर्रोखरू पारसा, अशरफ रजावी जैसी नायिकाओं को फाँसी दी गई। जानिए कैसे आजादी का सपना दमन में बदल गया।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा — edited by कुलदीप सिंह
Feb 10, 2026, 09:53 am IST
in विश्व
Iranian revolution

प्रतीकात्मक तस्वीर (एआई जेनरेटेड)

वर्ष 1979 की ईरान की क्रांति, जिसमें लाखों महिलाओं ने भाग लिया था और अपना तमाम जीवन उन सपनों को पूरा करने के लिए लगा दिया, जो सपना उन्हें कथित आजादी की तरफ ले जा रहा था। ईरान के शाह के कथित कुशासन के खिलाफ शुरू हुआ आंदोलन सफल हुआ और इस सफलता की कीमत अंतत: किसने चुकाई, यह भी एक विमर्श का विषय है।

ईरान में वर्ष 1979 में हुई सफल क्रांति की सफल नायिकाओं के साथ क्या हुआ, आज इस लेख में जानते हैं। कैसे उनकी आजादी और समानता के सपने चकनाचूर हो गए। उन्हें या तो इस्लामिक शासन ने मार डाला या फिर फांसी पर लटका दिया। उनका एक सपना तो उसी दिन चकनाचूर हो गया था, जब वे अपनी साथी महिलाओं के त्याग के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए 8 मार्च को एकत्र हो रही थीं और उससे एक दिन पहले ही अनिवार्य हिजाब का फरमान आ गया था। और उनका जश्न एक बार फिर से विद्रोह में बदल गया था।

जिन्हें सत्ता दिलाई उन्हीं ने किया विश्वासघात

हालांकि उस समय बढ़ते विद्रोह के चलते यह फरमान वापस ले लिया गया था, परंतु वह केवल तात्कालिक था। उसके बाद इन महिलाओं पर जो दमन चक्र चला, उसकी इतिहास में कहीं तुलना नहीं है। महिलाओं के अधिकारों की बात करने वाली महिलाओं को ही क्रांति के बाद चुनी गई सरकार के हाथों गोलियों का सामना करना पड़ा था। आइए जानते हैं ऐसी ही कुछ महिलाओं के विषय में। ईरान की वे महिलाएं, जो छली गई और आज तक छली जा रही हैं।

जो महिलाएं शाह के जाने का जश्न मना रही थी, उन्होनें अपने जश्न में यह देखा ही नहीं कि नई क्रांति काउंसिल और नई सरकार ने एक भी महिला को अपने सदस्य के रूप में शामिल नहीं किया था। न ही उन्हें यह अनुमान भी था कि आखिर उनके साथ क्या होने जा रहा है। महिलाओं को यह लगा था कि उनके अधिकारों मे वृद्धि होगी परंतु इसके विपरीत उनके अधिकार उस शासन में पूरी तरह से कुचल दिए गए, जो उनकी क्रांति के कारण आया था।

महिलाओं की आजादी छीनने का दुष्चक्र

जो शासन आया, उसने महिलाओं को शासन से तो हटाया ही, इसके साथ ही उन्हें सार्वजनिक जीवन से भी हटाने का दुष्चक्र रचा। महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए ईरान के शाह के शासन में फॅमिली प्रोटेक्शन लॉ बनाया गया था। इस कानून में महिलाओं के लिए शादी की उम्र को बढ़ा दिया गया था, महिलाओं को तलाक देने का अधिकार दिया गया था और उन्हें उनके बच्चों पर अधिकार दिया गया था। पारिवारिक विवादों में निष्पक्षता को सुनिश्चित करने के लिए पारिवारिक न्यायालयों की स्थापना भी की गई थी। इस कानून को ही निलंबित कर दिया गया था और इसके साथ ही महिलाओं के हाथों से तलाक का अधिकार चल गया।

लड़कियों के लिए शादी की उम्र 18 से कम कर दी गई। ऐसे ही तमाम कानून बना दिए गए। महिलाओं के लिए क्रांति एक दु:स्वप्न बन गई थी।

मासूमेह शादमानी (मदर कबीरी): शाह के समय में सक्रिय रूप से क्रांति करने वाली 40 साल की मासूमेह पांच बच्चों की मां थी और ऐसा कहा जाता है कि उन्हें शाह के शासन में प्रताड़ित किया गया। उन्हें 1979 की क्रांति के दौरान रिहा कर दिया गया था, लेकिन दो साल बाद नई सरकार ने उन्हें फांसी दे दी।

अशरफ रजावी: ईरान के पीपल्स मुजाहिदीन ऑर्गनाइजेशन (PMOI/MEK) की एक जानी-मानी सदस्य, वह शाह के समय में एक राजनीतिक कैदी थीं, क्रांति के दौरान उन्हें रिहा कर दिया गया था, लेकिन बाद में 1982 में खोमैनी सरकार ने उन्हें मौत के घाट उतार दिया।

अशरफ अहमदी: MEK की एक और महिला कार्यकर्ता, जिन्हें शाह के समय में प्रेग्नेंसी के दौरान प्रताड़ित किया गया था। उन्हें क्रांति से ठीक पहले रिहा कर दिया गया था, लेकिन बाद में उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया गया और 1988 में राजनीतिक कैदियों के हत्याकांड के समय फांसी दे दी गई।

फर्रोखरू पारसा (1980 में फाँसी): वह एक डॉक्टर और टीचर थीं, जो क्रांति से पहले पहली महिला कैबिनेट मंत्री (शिक्षा मंत्री) थीं। क्रांति के बाद उन्होनें शिक्षा में लैंगिक समानता को बढ़ावा देने का प्रयास किया, परंतु इसी प्रयास के चलते 8 मई, 1980 को उन्हें फायरिंग स्क्वाड द्वारा मौत की सज़ा दी गई थी।

अशरफ रजावी (1982 में हत्या): MEK की एक प्रमुख सदस्य जिन्हें 1979 की क्रांति से ठीक पहले शाह की जेल से रिहा किया गया था। महिलाओं के प्रति कड़े और सख्त नियमों और कानूनों के खिलाफ उन्होंने नई सरकार के खिलाफ लड़ना जारी रखा और 1982 में एक छापे में उनकी हत्या कर दी गई थी।

मगर यह सिलसिला यहीं नहीं रुका था। जब नई कथित सरकार ने अपने विरोधियों को कुचलना शुरू किया तो उसकी जद में वे महिलाएं भी आईं, जिन्होनें इस क्रांति का आरंभ किया था। वर्ष 1988 की गर्मियों के दौरान, सैकड़ों महिलाओं को फाँसी दी गई, जिनमें से कई 1979 से राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए लड़ रही थीं। इनमें पीपल्स मुजाहिदीन (MEK) की सदस्य सम्मिलित थीं, जिनमें मुख्य थीं:

मलीहेह अघवामी: एक राजनीतिक कैदी जिनपर कई चर्चाएं हुई थीं।

शिराज की बहाई महिलाएं: (1983 में फाँसी): हालांकि सभी 1979 के विरोध प्रदर्शनों में सक्रिय नहीं थीं, लेकिन 18 जून, 1983 को शिराज में इन महिलाओं को फांसी दे दी गई थी। और इन महिलाओं में मोना महमूदनेजाद (17 साल), रोया एशरागी और ज़रीन मोगीमी शामिल थीं। उन्हें उनके धर्म और बच्चों को पढ़ाने के लिए फाँसी दी गई थी।

यह सब उन महिलाओं के साथ हो रहा था, जिन्होनें ईरान में 1979 की क्रांति को सफल बनाया था और उनकी क्रांति को चुराकर सत्ता में जो बैठा, उसने इन महिलाओं को ही पहले चुप कराया। महिलाएं, जो सुधार के सपने को आँखों में लेकर जी रही थीं, वे उस सपने को लेकर चली गईं।

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