अमुमन जब भी हम कैंसर के बारे में सोचते हैं तो मन में किसी बुजुर्ग या फिर अधेड़ उम्र के शख्स की तस्वीर उभरती है। ऐसा माना जाता है कि बढ़ती उम्र, खराब जीन या धूम्रपान जैसी पुरानी आदतें ही कैंसर का कारण बनती हैं। लेकिन विश्व कैंसर दिवस के अवसर पर जारी की गई एक रिपोर्ट बताती है कि युवाओं में भी कैंसर का खतरा बढ़ रहा है। अब कैंसर केवल बुजुर्गों की बीमारी नहीं रह गई है, बल्कि जेन-जी (Gen Z) और मिलेनियल्स इसकी चपेट में तेजी से आ रहे हैं।
क्या कहते हैं आंकड़े?
लेटेस्ट रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में कैंसर विशेषज्ञ (ऑन्कोलॉजिस्ट) एक परेशान करने वाला ट्रेंड देख रहे हैं। वह है 20 से 40 साल की उम्र के युवाओं में कैंसर के मामलों का तेजी से बढ़ना। ‘द लैंसेट’ में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, अमेरिका में 1990 के बाद पैदा हुए लोगों में 17 प्रकार के कैंसर की दर लगातार बढ़ रही है। विशेष रूप से अग्न्याशय (पैनक्रियाज) और छोटी आंत के कैंसर में सबसे ज्यादा उछाल देखा गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि 1980 के बाद पैदा हुए लोगों में मलाशय के कैंसर (रेक्टल कैंसर) का खतरा 1950 के दशक में जन्मे लोगों की तुलना में 4 गुना अधिक है।
भारत की स्थिति भी कम गंभीर नहीं है। आईसीएमआर (ICMR) का कहना है कि हर 9 में से 1 भारतीय को अपने जीवनकाल में कैंसर होने की संभावना है। अपोलो हॉस्पिटल्स के एक अध्ययन से पता चला है कि पश्चिमी देशों की तुलना में भारतीयों को बहुत कम उम्र में कैंसर हो रहा है।
युवाओं में कैंसर बढ़ने के मुख्य कारण हैं-
- खान-पान और मोटापा: आज की युवा पीढ़ी का खाना अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड और शुगर से भरा है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि अधिक वजन (बीएमआई) न केवल मोटापे का कारण है, बल्कि यह कोलन, किडनी और पैंक्रियाटिक कैंसर के जोखिम को भी बढ़ा देता है। बचपन में अधिक वजन होना बाद के जीवन में कोलोरेक्टल कैंसर के खतरे को 39 प्रतिशत तक बढ़ा सकता है।
- नींद की कमी और तनाव: जेन-जी और मिलेनियल्स पिछली पीढ़ियों की तुलना में कम सोते हैं। मोबाइल फोन की नीली रोशनी ‘मेलाटोनिन’ हार्मोन के स्राव को रोकती है, जो कोशिकाओं के चक्र को नियंत्रित करता है। नींद की कमी और बढ़ा हुआ ‘कोर्टिसोल’ (स्ट्रेस हार्मोन) शरीर की इम्यूनिटी को कमजोर कर देता है, जिससे सोई हुई ट्यूमर कोशिकाएं जीवित हो सकती हैं।
- शराब और ‘फॉरएवर केमिकल्स’: शराब शरीर में ‘एसिटालडिहाइड’ बनाती है जो डीएनए को नुकसान पहुंचाती है। इसके अलावा, प्लास्टिक और माइक्रोप्लास्टिक्स का बढ़ता उपयोग भी कैंसर का कारण बन रहा है।
- गर्भकालीन दवाएं: एक चौंकाने वाला खुलासा यह भी हुआ है कि गर्भावस्था के दौरान महिलाओं द्वारा ली गई कुछ दवाएं (जैसे बेंडेक्टिन) बच्चों में वयस्क होने पर कोलन कैंसर के जोखिम को 3.6 गुना तक बढ़ा सकती हैं।
क्या हैं इससे बचने के उपाय?
- विशेषज्ञों का कहना है कि जीवनशैली (लाइफस्टाइल) में छोटे बदलाव बड़े परिणाम दे सकते हैं, जैसे: -संतुलित आहार लें और प्रोसेस्ड फूड से बचें।
- शराब और धूम्रपान को पूरी तरह छोड़ दें।
- स्क्रीन टाइम कम करें और पर्याप्त नींद लें।
- एचपीवी और हेपेटाइटिस-बी का टीकाकरण करवाएं।
- नियमित स्क्रीनिंग और शरीर में होने वाले असामान्य बदलावों पर नजर रखें।

















