जो कभी चेतावनी लगता था, वह अब घटित होती हुई सच्चाई बन चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन के नेताओं ने किसी संकट को गढ़ा नहीं-उन्होंने उस संकट का सामना किया जिसे सभ्य समाज जानबूझकर नजरअंदाज कर रहा था। अवैध घुसपैठ से सीमाओं की सुरक्षा और आपराधिक, आतंकवादी, कट्टरपंथी तथा नैतिक रूप से विकृत तत्वों को बाहर करने का उनका प्रयास तानाशाही नहीं, बल्कि आत्म-रक्षा था।
चुपचाप घुसपैठ: राष्ट्रहित पर खतरा
सच्चाई असहज है। जब देश विचारधाराओं, शब्दावली और “संवेदनशीलता” में उलझे रहे, तब घुसपैठिए जिनमें अपराधी गिरोह, कट्टर विचारक, मानव तस्कर और आदतन अपराधी शामिल हैं, चुपचाप घुसते गए। ये तत्व पाखंडी राष्ट्रविरोधी विचारधारा के प्रवर्तकों और झंडाबरदारों, कपटी धर्मनिरपेक्षता और तथाकथित उदारवादियों के संरक्षण में केवल टिके ही नहीं, बल्कि संस्थाओं में घुसपैठ कर सत्ता के गलियारों तक पहुँच गए। यह कल्पना नहीं-यह हकीकत है।
राष्ट्र की सीमा और नागरिक संरक्षण
आज कानून का पालन करने वाले नागरिकों को सहिष्णुता का पाठ पढ़ाया जाता है, जबकि अवैध घुसपैठियों, आतंकी तत्वों और अपराधियों को परिस्थितियों का शिकार बताया जाता है। सीमाओं को अनैतिक कहा जाता है और अराजकता को बौद्धिक जामा पहनाया जाता है। राष्ट्रीय सुरक्षा को डर का नाम दिया जाता है, और संस्थाएं कार्रवाई से पहले नाराज़गी का हिसाब लगाने लगती हैं। मोदीजी के नेतृत्व में जन कल्याणकारी सरकार ने इस पाखंड को तोड़ा-यह कहकर कि जो राष्ट्र अपनी सीमाएँ नहीं बचा सकता, वह अपने नागरिकों को भी नहीं बचा सकता। बिना दंड की करुणा मानवता नहीं, आत्मसमर्पण होती है।
नैरेटिव से बड़ा कोई अपराध नहीं
इसी सच्चाई के कारण उन्हें विभाजनकारी और खतरनाक बताया गया। लेकिन असली खतरा उनके शब्द नहीं थे। असली खतरा वह खालीपन था, जिसे उनके आलोचकों ने बनाया और जिसे अब अपराध, डर और नैतिक भ्रम भर रहे हैं। इतिहास निर्मम है। सभ्यताएं केवल बाहरी आक्रमण से नहीं गिरतीं- वे तब गिरती हैं जब अपराध को वैचारिक संरक्षण मिलता है और अस्तित्व से बड़ा नैरेटिव बन जाता है। यह अब वाम या दक्षिण की बहस नहीं है। यह निरंतरता बनाम पतन का प्रश्न है। सीमाएँ घृणा की नहीं, ज़िम्मेदारी की रेखाएँ हैं। और जो नेता उन्हें बचाते हैं, वे लोकतंत्र के दुश्मन नहीं- उसकी आख़िरी चेतावनी हैं।

















