राष्ट्रीय विचार की मजबूत धारा: रायपुर साहित्य उत्सव 2026 ने स्थापित किया नया मानक
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राष्ट्रीय विचार की मजबूत धारा: रायपुर साहित्य उत्सव 2026 ने स्थापित किया नया मानक

अब समय बदल रहा है। साहित्य और पाठक दोनों में परिवर्तन आया है। पुराने मठ ध्वस्त हो रहे हैं और नए राष्ट्रीय गढ़ उभर रहे हैं। कई लेखक वामपंथ की डूबती नाव छोड़कर राष्ट्रीय विचार के जहाज पर सवार होने को तैयार हैं।

Written byआशीष कुमार 'अंशु'आशीष कुमार 'अंशु' — edited by Mahak Singh
Jan 27, 2026, 02:07 pm IST
in भारत

राष्ट्रीय विचार परिवार के साहित्यिक आयोजनों की श्रृंखला में एक नया अध्याय जुड़ गया है। लोकमंथन, नर्मदा साहित्य मंथन, शब्दोत्सव के बाद अब रायपुर साहित्य उत्सव ने वैचारिक मोर्चे पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। ये उत्सव अब महज साहित्यिक कार्यक्रम नहीं रहे, बल्कि राष्ट्र की सांस्कृतिक और वैचारिक चेतना को मजबूत करने वाले पत्थर साबित हो रहे हैं। कुछ समय पहले तक चर्चा होती थी कि जयपुर साहित्य उत्सव जैसा कुछ चाहिए, जश्ने-रेख्ता जैसा कुछ चाहिए। आज वह चर्चा पुरानी हो चुकी है। राष्ट्रीय विचार के ये मंच इतने प्रभावशाली हो गए हैं कि वामपंथी लेखक-साहित्यकार भी इनसे फोमो (Fear of Missing Out) का शिकार हो रहे हैं। रायपुर साहित्य उत्सव को लेकर उनकी चिंता साफ दिखी- क्यों हमारे लोगों को शामिल नहीं किया जा रहा? एक जमाने में यही गिरोह साहित्य का नियामक था। प्रो. रामदरश मिश्र, निर्मल वर्मा जैसे वरिष्ठ साहित्यकारों को बाहर रखा जाता था। पुरस्कार रचनात्मकता से अधिक गिरोहबाजी पर निर्भर थे। राजेंद्र यादव ने खुद स्वीकार किया था कि एक लेखक की बेटी की शादी के लिए पुरस्कार दिलवा दिया गया। पुरस्कार कल्याणकारी योजनाओं की तरह वितरित होते थे, न कि उत्कृष्टता के आधार पर।

बदलते साहित्य का नया राष्ट्रीय स्वर

अब समय बदल रहा है। साहित्य और पाठक दोनों में परिवर्तन आया है। पुराने मठ ध्वस्त हो रहे हैं और नए राष्ट्रीय गढ़ उभर रहे हैं। कई लेखक वामपंथ की डूबती नाव छोड़कर राष्ट्रीय विचार के जहाज पर सवार होने को तैयार हैं। शब्दोत्सव की सफलता से अभी उबर भी नहीं पाए थे कि रायपुर साहित्य उत्सव ने उनकी नींद उड़ा दी। अब नर्मदा साहित्य मंथन का पांचवां संस्करण इंदौर में 30 जनवरी से 1 फरवरी 2026 तक दस्तक देने वाला है। ये उत्सव राष्ट्रीय विचार की निरंतरता और विस्तार का प्रमाण हैं। रायपुर साहित्य उत्सव 2026 का आयोजन छत्तीसगढ़ की राजधानी के नवा रायपुर स्थित पुरखौती मुक्तांगन में 23 से 25 जनवरी तक हुआ। ‘आदि से अनादि तक’ थीम पर आधारित यह तीन दिवसीय उत्सव छत्तीसगढ़ राज्य के रजत जयंती वर्ष और गणतंत्र के अमृतकाल के अवसर पर आयोजित किया गया। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व वाली सरकार की यह पहल छत्तीसगढ़ की साहित्यिक विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत पहचान दिलाने में सफल रही। उत्सव में 120 से अधिक ख्यातिप्राप्त साहित्यकारों ने भाग लिया और 42 सत्रों में समकालीन सामाजिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक मुद्दों पर गहन विमर्श हुआ।

विकसित भारत में साहित्य की भूमिका

उत्सव का शुभारंभ 23 जनवरी को विनोद कुमार शुक्ल मंडप में हुआ। मुख्य अतिथि राज्यसभा के उप सभापति हरिवंश और अध्यक्ष मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने दीप प्रज्ज्वलित किया। उपमुख्यमंत्री अरुण साव, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा की कुलपति डॉ. कुमुद शर्मा, अभिनेता मनोज जोशी सहित कई गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे। हरिवंश ने छत्तीसगढ़ के महान साहित्यकार स्व. विनोद कुमार शुक्ल को नमन करते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ी साहित्य की प्राचीन परंपरा रही है। उन्होंने कबीर के काशी और कवर्धा से जुड़ाव का जिक्र किया तथा मैथिलीशरण गुप्त की पंक्तियों से साहित्य की समाज-दिशा देने वाली भूमिका पर प्रकाश डाला। हरिवंश ने कहा, “एक पुस्तक और एक लेखक दुनिया बदलने की शक्ति रखते हैं।” उन्होंने भारत की आर्थिक प्रगति, आत्मनिर्भरता और 2047 के विकसित भारत संकल्प में साहित्य की भूमिका रेखांकित की।

छत्तीसगढ़ की साहित्यिक विरासत और प्रतिरोध की चेतना का उत्सव

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने छत्तीसगढ़ को प्रभु श्रीराम का ननिहाल बताते हुए कहा कि यह पावन भूमि साहित्य का महाकुंभ बनकर उभरी है। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम को समुद्र मंथन से तुलना की और माखनलाल चतुर्वेदी, माधवराव सप्रे, पंडित लोचन प्रसाद पांडेय, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी तथा गजानन माधव मुक्तिबोध जैसे साहित्यकारों की स्मृतियों को सहेजने की जिम्मेदारी बताई। अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि कविता अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध सिखाती है। उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने इसे छत्तीसगढ़ की साहित्यिक पहचान मजबूत करने वाला बताया। उद्घाटन के दौरान जे. नंदकुमार की कॉफी टेबल बुक (छत्तीसगढ़ के 25 वर्ष पर), प्रो. अंशु जोशी की ‘लाल दीवारें, सफेद झूठ’ और राजीव रंजन प्रसाद की ‘तेरा राज नहीं आएगा रे’ का विमोचन हुआ।

लोक, साहित्य और संस्कृति का जीवंत संगम

उत्सव में 42 सत्र हुए-5 समानांतर, 4 सामूहिक और 3 संवाद सत्र। अंतिम दिन पत्रकारिता-साहित्य, ट्रैवल ब्लॉगिंग, नाट्यशास्त्र, समाज-सिनेमा, संविधान-भारतीय मूल्य तथा शासन-साहित्य के अंतर्संबंधों पर चर्चा हुई। चाणक्य नाटक का मंचन, लोकनृत्य, लोकगीत, छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और कवि सम्मेलन ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया। सुरेंद्र दुबे मंडप में छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत पर भव्य चित्रकला प्रदर्शनी लगी-छत्तीसगढ़ महतारी (सोनल शर्मा), बस्तर बाजार (अवध कंवर), राजिम कुंभ (दिव्या चंद्रा) और रामगढ़ पहाड़ियों के चित्र आकर्षण के केंद्र बने। पेंटिंग और कार्टून कार्यशालाओं में युवाओं को मार्गदर्शन मिला। खान-पान में चाउमीन के ठेले नहीं थे, बल्कि कोदो का भात, चापड़ा चटनी, फर्रा, जिमिकंद का आचार और खट्टी कढ़ी जैसे पारंपरिक पकवान परोसे गए। पारंपरिक साड़ियां, आदिवासी आभूषण जैसे हसुली और बाजूबंद ने लोकाचार को जीवंत किया। चार पीढ़ियों का संगम, उत्तर-दक्षिण-पूर्वोत्तर-पश्चिम के साहित्यकारों की उपस्थिति और स्थानीय कलाकारों की प्रस्तुतियां इसे सच्चा लोक उत्सव बनाती रहीं।

डिजिटल युग में भी साहित्य अमर

समापन समारोह में राज्यपाल रमेन डेका ने कहा कि डिजिटल दौर में भी साहित्य का महत्व अक्षुण्ण रहेगा। ‘वंदे मातरम’ का उदाहरण देते हुए शब्दों की ताकत पर जोर दिया और ऐसे उत्सवों को गांव-छोटे शहरों तक पहुंचाने की अपील की। वित्त मंत्री ओ.पी. चौधरी और रंगकर्मी सच्चिदानंद जोशी ने सराहना की। निर्देशक चन्द्रप्रकाश द्विवेदी ने समय अनुशासन और छोटी-छोटी बातों के ध्यान की प्रशंसा की तथा बस्तर जैसे स्थानों में इसे दोहराने की बात कही।

रायपुर उत्सव की अलग पहचान

रायपुर साहित्य उत्सव जयपुर साहित्य उत्सव से कई मायनों में अधिक प्रभावी साबित हुआ। पहला, यह पूरी तरह राष्ट्रीय विचार पर केंद्रित था, जहां वैचारिक स्पष्टता और सांस्कृतिक गौरव प्रमुख थे, जबकि जयपुर अक्सर विविध विचारों के मिश्रण में खो जाता है। दूसरा, स्थानीय लोक-परंपराओं, आदिवासी संस्कृति और छत्तीसगढ़ी व्यंजनों का जीवंत समावेश इसे जड़ों से जुड़ा बनाता है-जयपुर में वैश्विक-शहरी स्वाद अधिक हावी रहता है। तीसरा, जनभागीदारी और युवा रचनाकारों को मंच मिला, जो वहां कम देखने को मिलता है। बीते दो वर्षों में साय सरकार ने साहित्य-संस्कृति को सामाजिक उत्तरदायित्व माना है। यह उत्सव जनभागीदारी, स्थानीय भाषाओं और युवाओं को मंच देकर सफल रहा। मुख्य आयोजक टीम-मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार पंकज झा, आर. कृष्णा दास और  शशांक शर्मा ने इसे यादगार बनाया।

रायपुर साहित्य उत्सव 2026 महज एक आयोजन नहीं था, बल्कि छत्तीसगढ़ की आत्मा का उत्सव था। यह राज्य को साहित्यिक मानचित्र पर मजबूत स्थान देगा और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेगा। राष्ट्रीय विचार की यह धारा अब रुकने वाली नहीं है।

Topics: Indian Literary FestivalChhattisgarh LiteratureNational Thought FamilyDeveloped India and LiteratureRaipur Literature Festival 2026Raipur Literature FestivalNational Thought Literature
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार अंशु पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों तक मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान STEP से जुड़े रहे हैं। [Read more]
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