नर्मदा: मोक्ष की रहस्यमयी नदी एवं श्रद्धा, सभ्यता और साधना की अविरल आत्मकथा
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नर्मदा: मोक्ष की रहस्यमयी नदी एवं श्रद्धा, सभ्यता और साधना की अविरल आत्मकथा

माँ नर्मदा की कथा, महिमा और आज का पर्यावरण संकट। यदि नर्मदा नहीं रहीं तो हमारी संस्कृति भी नहीं रहेगी – संकल्प लें, बचाइए।

Written byदीपक द्विवेदीदीपक द्विवेदी — edited by कुलदीप सिंह
Jan 25, 2026, 10:21 am IST
in विश्लेषण, मध्य प्रदेश
प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

त्वदीय पाद पंकज नमामि देवी नर्मदे… भोर का समय है, अमरकंटक की पहाड़ियों पर हल्की धुंध पसरी है। देवदार और साल के वृक्षों के बीच एक छोटा-सा कुंड शांत भाव से चमक रहा है। कुछ साधु मौन में बैठे हैं। घंटियों की मध्यम ध्वनि वातावरण में घुल रही है। कोई जल में अर्घ्य दे रहा है, कोई आँख मूँदकर मंत्र जप रहा है। यहीं से एक कथा जन्म लेती है…यही वह स्थान है जहाँ एक नदी नहीं, एक देवी अवतरित हुई थी। नर्मदा। रेवा। नर्मदा मैया। वह केवल जलधारा नहीं है। वह इतिहास की स्मृति, संस्कृति की धड़कन, तप की राह और मोक्ष का द्वार है। नर्मदा को पढ़ा नहीं जाता, नर्मदा को जिया जाता है।

स्कंद पुराण के रेवा खंड में वर्णन आता है, भगवान शिव ऋक्ष पर्वत पर गहन तप कर रहे थे। तप की ऊष्मा से उनके शरीर से पसीने की बूंदें गिरीं। उन्हीं बूंदों से एक दिव्य कन्या प्रकट हुई। शिव की इला नामक कला नर्मदा बन गई। कुछ ग्रंथ कहते हैं ब्रह्मा के आँसुओं से नर्मदा और सोन उत्पन्न हुए। माघ शुक्ल सप्तमी मकर राशि में सूर्य और मध्याह्न का अभिजीत मुहूर्त था और इसी दिव्य क्षण में बारह वर्ष की कन्या के रूप में नर्मदा ने पृथ्वी पर अवतरण किया। इसीलिए यह दिन नर्मदा प्राकट्य दिवस कहलाया।

शिव ने वर दिया तू दक्षिण गंगा कहलाएगी, तू मोक्ष की राह बनेगी तू प्रलय में भी नष्ट नहीं होगी। और इस प्रकार स्वर्ग की नदी धरती की माँ बनी। नर्मदा की धारा प्रकृति के नियमों को चुनौती देती है। भारत की लगभग सभी नदियाँ पूर्व की ओर बहती हैं, पर नर्मदा पश्चिम की ओर बहती है। क्यों? लोककथा कहती है सोनभद्र और जुहिला नदियाँ प्रेम में बंध गईं। एक-दूसरे की ओर बहने लगीं। नर्मदा ने यह दृश्य देखा, उन्हें यह बंधन स्वीकार नहीं था। उन्होंने कहा मैं किसी बंधन में नहीं बँधूँगी। मैं तपस्विनी रहूँगी। और उसी क्षण उन्होंने अपनी धारा की दिशा बदल दी। इसलिए नर्मदा कुंवारी मैया कहलायीं -स्वतंत्र, विरक्त, योगिनी।

भारत में असंख्य नदियाँ हैं पर आश्चर्यजनक तथ्य यह है केवल नर्मदा नदी का स्वतंत्र पुराण है- नर्मदा पुराण । स्कंदपुराण के रेवाखंड में नर्मदा की महिमा सैकड़ों अध्यायों में वर्णित है। वायु पुराण, शिव पुराण, महाभारत, वशिष्ठ संहिता, ब्राह्मी संहिता सभी ग्रंथ नर्मदा की दिव्यता के साक्षी हैं। शास्त्रों में अद्भुत विधान है , त्रिभि: सारस्वतं तोयं सप्ताहेन तु यमुनाम्। सद्य: पुनाति गांगेयं दर्शनादेव नार्मदम्॥ सरस्वती तीन दिन में, यमुना सात दिन में, गंगा एक स्नान में पवित्र करती है , पर नर्मदा तो दर्शन मात्र से ही पवित्र कर देती है। मान्यता है स्मरण से जन्मभर के पाप, दर्शन से तीन जन्मों के, स्नान से हजारों जन्मों के पाप नष्ट होते हैं। शिव स्वयं जिसका जल सेवन करते हैं, मार्कण्डेय पुराण कहता है नर्मदा सेवते नित्यं स्वयं देवो महेश्वर:…स्वयं महादेव प्रतिदिन नर्मदा जल का पान करते हैं। वायु पुराण में कहा गया नर्मदा का जल त्रिदेवों का स्वरूप है। शिवजी ने वर दिया प्रलयेषु न मृता सा नर्मदा अर्थात प्रलय में भी जो न मरे वह है माँ नर्मदा।

ऋषियों की शरणस्थली और पंद्रह नाम

एक समय भारत में भयंकर सूखा पड़ा तब ऋषियों ने महर्षि मार्कण्डेय से मार्ग पूछा। उन्होंने कहा नर्मदा तट का आश्रय लो। तब अनेक ऋषि परिवार सहित नर्मदा तट पर बसे और नर्मदा के पंद्रह नामों का स्मरण किया नर्मदा, त्रिकुटा, दक्षिणी गंगा, महती, सुरसा, कृपा, मंदाकिनी, महार्णवा, रेवा, विपापा, विपाशा, विमला, करभा, रंजना, वायुवाहिनी।

परिक्रमा : पृथ्वी की सबसे लंबी साधना

नर्मदा संसार की एकमात्र नदी हैं, जिसकी पूरी परिक्रमा होती है। लगभग 2600 से 3300 किलोमीटर , तीन वर्ष, तीन माह, तेरह दिन। नदी को कहीं पार नहीं करनाऔर दक्षिण तट से समुद्र तक फिर उत्तर तट से वापसी।कहा जाता है नर्मदा की परिक्रमा शरीर की नहीं, आत्मा की यात्रा है।

शंकराचार्य और नर्मदाष्टकम्

केरल का एक बालक हज़ारों किलोमीटर चला। ओंकारेश्वर पहुँचा,गुरु मिले। वही आगे चलकर आदि शंकराचार्य बना। नर्मदा की महिमा से अभिभूत होकर उन्होंने रचा , नर्मदाष्टकम् सर्वत्र सिद्धि प्रदायिनी, भवाब्धि ताप त्रय हारिणी…”

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कंकर-कंकर शंकर: स्वयं सिद्ध शिवलिंग

विष्णु ने वर दिया नर्मदा जल की हर शिला ,शिव तुल्य होगी। इसीलिए केवल नर्मदा से स्वयं प्रतिष्ठित शिवलिंग प्राप्त होते हैं। इनकी प्राण-प्रतिष्ठा नहीं होती। ये स्वयं सिद्ध होते हैं। इसलिए कहा गया नर्मदा के कंकर, उठे शंकर। नर्मदा तट पर देव, ऋषि, मुनि, योगी सिद्धि प्राप्त करते हैं और यहीं प्राण त्यागते हैं।

भूगोल और सभ्यता की जीवन रेखा

नर्मदा की लंबाई 1312 किलोमीटर, वे रिफ्ट घाटी की नदी हैं। डेल्टा नहीं बनातीं, उनके तट पर मानव सभ्यता के सबसे प्राचीन प्रमाण मिले हथनौरा का नर्मदा मानव। महिष्मती, भरूच, भृगुकच्छ व्यापार के केंद्र बने। रोमन जहाज़ यहीं तक आए।
प्रवाह नदी का प्रयोजन है। नदी अगर बहेगी नहीं, तो नदी नहीं रहेगी।— अमृतलाल वेगड़

पश्चिम की ओर बहने वाली यह दुर्लभ नदी ‘रेवा’ के नाम से पूजित रही है पर आज वही रेवा अस्तित्व की सबसे कठिन परीक्षा से गुजर रही है। नर्मदा का जन्म अमरकंटक के उस पठार से होता है जहाँ कभी झरनों, कुंडों और धाराओं की भरमार थी। वैज्ञानिक बताते हैं कि नर्मदा के जल का लगभग 20–22 प्रतिशत आधार प्रवाह (भूमिगत जल) से और लगभग 60 प्रतिशत वर्षा से आता है। कभी अमरकंटक क्षेत्र से सात सहायक धाराएँ नर्मदा के उद्गम को पोषित करती थीं। आज इनमें से केवल एक स्रोत — ब्रह्म कुंड (सूर्य कुंड) ही बारहमासी बचा है। शेष सभी स्रोत अब केवल मानसून में जीवित होते हैं।सावित्री, सोन, गायत्री, कपिलधारा, अरंडी, अमरावती, वैतरणी जिन धाराओं ने कभी नर्मदा को जन्म दिया, वे आज स्मृति बनती जा रही हैं। कई झरने सड़क, निर्माण और सीमेंट में दबा दिए गए। अमरकंटक का भूजल स्तर पिछले दशकों में 30 प्रतिशत तक गिर चुका है।अमरकंटक की रक्षा ही नर्मदा की रक्षा है यह अब केवल भावनात्मक नहीं, वैज्ञानिक सत्य बन चुका है।

नर्मदा की धमनियाँ: सूखती सहायक नदियाँ

नर्मदा का विराट रूप उसकी सहायक नदियों से बनता है। भूगोलवेत्ता संजीव पांडे बताते हैं कि जंगलों की रेतीली भूमि वर्षा जल को संग्रहित कर धीरे-धीरे नदियों में छोड़ती है। यही जल नर्मदा को अविरल रखता है। पर आज बंजर, हिरन, शेर, शक्कर, परियट, ओमनी, सिंगरी, पलकमती, देनवा, बाबई, गंजाल, दूधी, तवा, तेंदुबी, वारना, हथनी अदि इनमें से अधिकांश नदियाँ या तो मौसमी बन चुकी हैं या सूखने की कगार पर हैं।

नर्मदा नदी पर खतरे

रेत उत्खनन, वन कटाई और भूजल दोहन ने इन नदियों की रीढ़ तोड़ दी है। और जब धमनियाँ सूखती हैं, तो मुख्य धारा भी एक दिन थक जाती है। नर्मदा किनारे बसे शहर प्रतिदिन लाखों लीटर बिना उपचार का सीवेज नदी में छोड़ रहे हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार मंडला–भेड़ाघाट, सेठानी घाट–नेमावर और गरुड़ेश्वर–भरूच के बीच नर्मदा गंभीर रूप से प्रदूषित है। विडंबना यह है कि जिन शहरों का मल नर्मदा ढोती है, वही शहर पीने का पानी उसी नदी से लेते हैं। इंदौर, भोपाल, जबलपुर सहित मध्यप्रदेश के 18 नगर, गुजरात–राजस्थान के शुष्क क्षेत्र, उद्योग और सिंचाई — सभी की प्यास नर्मदा बुझा रही है। क्षिप्रा, गंभीर, पार्वती, ताप्ती तक जल पहुँचाने की योजनाएँ चल रही हैं। पर नर्मदा कोई हिमालयी नदी नहीं है। उसका जीवन केवल वर्षा और सहायक नदियों पर टिका है। केंद्रीय जल आयोग के आँकड़े बताते हैं कि गरुड़ेश्वर स्टेशन पर वार्षिक प्रवाह लगातार घट रहा है।

नर्मदा कंट्रोल अथॉरिटी के अनुसार हाल के वर्षों में जल उपलब्धता घटकर केवल 14.66 मिलियन एकड़ फीट रह गई है अब तक का न्यूनतम स्तर है। अमरकंटक, डिंडोरी और मंडला क्षेत्रों में बाक्साइट, मुरम और रेत खनन ने पहाड़ों को नग्न कर दिया। बालको और हिंडालको की खुदाइयों ने सैकड़ों हेक्टेयर वन नष्ट कर दिए। रेत खनन ने नर्मदा के तटीय क्षेत्र को 500–1000 मीटर से सिमटाकर सीधे किनारे तक ला दिया है। इससे बाढ़ नियंत्रण, भूजल पुनर्भरण और जैव विविधता तीनों नष्ट हो रहे हैं। ये क्षेत्र केवल प्राकृतिक नहीं, मानव इतिहास के जीवाश्म स्थल भी हैं जिनका नष्ट होना अपूरणीय क्षति है।

नर्मदा घाटी में प्रस्तावित और संचालित 18 थर्मल व परमाणु परियोजनाओं की कुल क्षमता 25,000 मेगावाट से अधिक है। एक मेगावाट बिजली के लिए प्रति घंटा 3,200 लीटर पानी। प्रस्तावित परियोजनाओं से प्रति घंटा 7 करोड़ लीटर जल नर्मदा से निकाला जाएगा। थर्मल संयंत्रों से निकलने वाली राख तवा और सहायक नदियों को विषैला बना चुकी है। चुटका परमाणु परियोजना से निकलने वाला विकिरणयुक्त जल नर्मदा को दूषित करता है। जैसे-जैसे बिजली परियोजनाएँ बढ़ेंगी, उनके पीछे-पीछे उद्योगों का जाल फैलेगा और नदी का संकट गहराता जाएगा।

वैज्ञानिक चेतावनी: जब नदी संतुलन खोने लगे

2012 में नर्मदा जल सुरक्षित था। 2015 तक बीओडी 7.1 मिलीग्राम पहुँच गया (मानक 3 है)। 2016 में प्रो. मुकेश कटकवार ने कहा — नर्मदा जलीय जीवन को बनाए रखने में सक्षम नहीं रही। मत्स्य वैज्ञानिक उत्पल भौमिक ने बताया कि बाँधों के कारण नदी का तापमान बढ़ रहा है, घुलित ऑक्सीजन घट रही है और प्रजनन चक्र टूट रहा है। क्लोराइड स्तर 3000 पीपीएम तक पहुँच चुका है , यह मीठे जल के लवणीकरण का संकेत है। अमृतलाल वेगड़ की चेतावनी में हते थे पानी उतना ही है जितना डायनासोर के जमाने में था, पर हमारी लालसा कई गुना बढ़ गई है। उनके लिए नर्मदा केवल नदी नहीं, संस्कृति की आत्मा थी। वे जानते थे कि यदि प्रवाह रुका, तो केवल नदी नहीं मरेगी सभ्यता मरेगी।

नर्मदा मैया नहीं, तो हम नहीं

नर्मदा केवल एक पवित्र धारा नहीं है वह स्वयं माँ है। वह तपस्विनी है, जीवनदायिनी है, मोक्षदायिनी है। उसकी हर लहर में शिव का स्पर्श है, हर कंकर में शंकर का वास है, और हर बूँद में सृष्टि का भविष्य छिपा है। पर आज, जिस माँ ने सदियों से हमें जल दिया, अन्न दिया, आश्रय दिया वही माँ आज हमारी ही उपेक्षा से पीड़ित है। उसके स्रोत सूख रहे हैं, उसकी संतानों-सी सहायक नदियाँ दम तोड़ रही हैं, उसका जल विषैला बन रहा है, और उसके आँचल-से जंगल उजड़ते जा रहे हैं।

आज नर्मदा जयंती पर हम यह स्वीकार करें कि पूजा, आरती और जयघोष को अपने आचरण में बदले। इसलिए आज हम इस पवित्र अवसर पर सभी संतों, महात्माओं, साधुओं, सभी प्रशासनिक अधिकारियों, सभी जनप्रतिनिधियों, और सभी नर्मदा भक्तों से करबद्ध निवेदन करते हैं माँ नर्मदा को शब्दों से नहीं, कर्मों से बचाइए। घोषणाओं से नहीं, संरक्षण से पूजिए। उसे पर्यटन स्थल मत बनाइए, उसे प्रदर्शनी की वस्तु मत बनाइए, उसे व्यवसाय का साधन मत बनाइए। उसे बस माँ बने रहने दीजिए। उसकी धारा को निर्मल रखिए, उसके तट स्वच्छ रखिए, उसके जंगल बचाइए, उसकी सहायक नदियों के प्रवाह को फिर जीवित करिए क्योंकि विकल्प बहुत हैं बाँधों के विकल्प हैं,उद्योगों के विकल्प हैं, शहरों के विकल्प हैं पर माँ का कोई विकल्प नहीं होता।

आज इस नर्मदा जयंती पर हम सब उसके पुत्र और पुत्रियाँ यह संकल्प लेते हैं माँ, कि आपकी ऋणता को शब्दों से नहीं, कर्म से चुकाएँगे। हम वचन देते हैं कि आपकी धारा को अपवित्र नहीं होने देंगे, आपकी संतानों-सी नदियों को मरने नहीं देंगे, आपके भविष्य को अंधकार में नहीं जाने देंगे क्योंकि यदि आप नहीं रहीं तो हमारा भविष्य नहीं रहेगा, हमारी संस्कृति नहीं रहेगी, हमारे पूर्वजों की स्मृति तक नहीं बचेगी और तब स्मरण करने वाला भी कोई नहीं बचेगा कि माँ नर्मदा कौन थी…इसीलिए आज, पूर्ण श्रद्धा, विवेक और संकल्प के साथ हम कहते हैं नर्मदा मैया नहीं, तो हम नहीं, नदी नहीं, तो जीवन नहीं और प्रवाह नहीं, तो भविष्य नहीं।

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दीपक द्विवेदी
दीपक द्विवेदी
सिविल सेवा विशेषज्ञ , इतिहास संकलन समिति, जनजाति कल्याण केंद्र। इतिहास , भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विभिन्न विमर्श पर वैचारिक लेखन और उद्बोधन। [Read more]
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