हाल ही में संगीतकार ए.आर. रहमान ने बयान दिया, “मुझे बॉलीवुड में अब काम कम मिल रहा है। कभी-कभी रचनात्मक निर्णय लेने की ताकत उन लोगों के हाथ में होती है जिनमें असल में क्रिएटिविटी नहीं होती। यह कभी-कभी साम्प्रदायिक कारणों से भी हो सकता है, लेकिन यह सीधे तौर पर पता नहीं चलता। यह केवल अफवाहों के रूप में पता चलता है कि मुझे किसी प्रोजेक्ट में चुना गया था, लेकिन फिर कंपनी ने अपने पांच अन्य कंपोजर्स को हायर कर लिया।’’ ऐसा ही एक बयान ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम में खिलाड़ी उस्मान ख्वाजा ने दिया। उन्होंने कहा, “जब मेरी पींठ में चोट लगी थी, तब जिस तरह मीडिया और पूर्व खिलाड़ी मेरे ऊपर टूट पड़े…, बातें कही गईं जैसे- ‘वह आलसी है’, ‘उसने ठीक से ट्रेनिंग नहीं की’… आदि। ये वही नस्लीय रूढ़ियां (स्टीरियोटाइप) हैं जिनके साथ मैं पला-बढ़ा हूं।”
इन दो अलग-अलग क्षेत्रों की हस्तियों की टिप्पणियों में गहरी समानता है। पहली ये कि ए. आर. रहमान हो या उस्मान ख्वाजा, दोनों ही लोकतांत्रिक देश में अपने हुनर के कारण हाथों-हाथ लिए गए, और जैसे ही इनके करियर या प्रतिभा का चरम आया और ढलान शुरू हुई, दोनों ने ही मुस्लिम विक्टिम कार्ड निकाल लिया। जब तालियां बज रही थीं, पुरस्कार बरस रहे थे, सब ठीक था, लेकिन जरा सा मौसम बदला, तो इन्होंने उन्हीं लोगों, समाज पर उंगली उठा दी, जिन्होंने इन्हें मौका दिया, सिर-माथे बैठाया।
दुनिया भर में मुस्लिम समाज दो मुद्राओं में रहता है। पहला, विशेषाधिकार चाहिए, यदि अल्पसंख्यक हैं तो उन्हें विशिष्ट दर्जा चाहिए। यदि बहुसंख्यक हैं, तो बहुलतावादी समाज बर्दाश्त नहीं। पड़ोस में बांग्लादेश में क्या हो रहा है? पाकिस्तान में क्या हो रहा है? दोनों देशों में अल्पसंख्यक समुदाय, जिनमें हिंदू, सिख व ईसाई शामिल हैं, के विरूद्ध सुनियोजित जिहादी हिंसा हो रही है। वहीं भारत जैसा बहुलतावादी समाज है, जहां अल्पसंख्यक के रूप में मुसलमानों की शिकायतों की सूची कभी खत्म ही नहीं होती।

ताजा मामला अल्लाह रखा रहमान यानी ए.आर. रहमान (कन्वर्जन से पहले अरुणाचलम् शेखर दिलीप कुमार मुदलियार) का है। वही, जो ‘मां तुझे सलाम’ गाने वाले गायक-संगीतकार हैं। वंदे मातरम् को उन्होंने ‘मां तुझे सलाम’ में बदल डाला, और पूरे देश ने सहजता से स्वीकार किया। राष्ट्रीय पर्व के मौके पर यह पूरी शान से बजाया जाता है। इन्हें पद्मश्री मिला, पद्म विभूषण मिला, बार-बार राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। ए.आर. रहमान इस बात को नहीं पचा पा रहे हैं कि उनका दौर बीत गया है। हर व्यक्ति के करियर का एक चरम होता है, उनका वह पीछे छूट चुका है, तो अब वह कैसे कह सकते हैं कि उन्हें काम नहीं मिलता।
रहमान ने जो कहा, जरा उसका पोस्टमार्टम करते हैं। पहले उन्होंने शिकायत की, ‘मुझे बॉलीवुड में अब कम काम मिलने लगे हैं’, लेकिन इसकी वजह उन्होंने अपनी चुकती प्रतिभा को नहीं माना। उनका कहना है कि क्रिएटविटी ऐसे लोगों के हाथ में आ गई है, जिनके अंदर क्रिएटिविटी ही नहीं है। (यहां गौर करें, गीतकार अभिजीत भट्टाचार्य के अनुसार, ए.आर. रहमान ने ‘म्यूजिक इंडस्ट्री’ का सबसे बड़ा नुकसान किया है, वह लैपटॉप कल्चर लेकर आए)। उनकी वजह से फिल्मों के ज्यादातर संगीतकार बेरोजगार हैं। रहमान ने लैपटॉप प्रोग्रामिंग को बढ़ावा दिया। पहले सौ लोग वायलिन बजाते थे, अब सब लैपटॉप पर हो जाता है।
भजन गायक अनूप जलोटा का कहना है कि एआर रहमान पहले हिंदू थे और बाद में उन्होंने इस्लाम अपनाया। उन्होंने बहुत काम किया और लोगों के दिलों में जगह बनाई, अगर उन्हें अब लगता है कि हमारे देश में मुसलमान होने की वजह से उनको फिल्में नहीं मिल रहीं, तो वह फिर से हिंदू हो जाएं। हिंदू धर्म में आएं, उन्हें फिर से फिल्में मिलना शुरू हो जाएंगी। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि रहमान को वह यह सुझाव इसलिए दे रहे हैं कि उन्हें हिंदू होकर देख लेना चाहिए कि फिल्में मिलती हैं या नहीं।
अभिनेत्री और भाजपा सांसद कंगना रानौत ने तो अल्लाह रक्खा को ‘पूर्वाग्रही और स्तरहीन’ व्यक्ति बताया। उन्होंने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी में बताया कि अपनी फिल्म ‘इमरजेंसी’ के लिए उन्होंने रहमान से संपर्क किया, लेकिन रहमान ने इसे प्रोपेगेंडा फिल्म बताते हुए इससे जुड़ने से इंकार कर दिया। अभिनेत्री को लगता है कि उनके भाजपा सांसद होने के कारण रहमान इस फिल्म से नहीं जुड़े।

और कितना झूठ बोलोगे!
अब ऐसा क्यों है, इस विषय में रहमान का कहना है कि ‘इसके कभी-कभी सांप्रदायिक कारण हो सकते हैं’। इसके तो यही मायने हुए कि बॉलीवुड उन्हें मुसलमान होने के कारण काम नहीं दे रहा है, लेकिन वह जो बोल रहे हैं सरासर झूठ है। उन्हें तो खूब काम मिल रहा है। उदाहरण के तौर पर, 2024 में रिलीज हुई फिल्म ‘मैदान’ में उन्होंने संगीत दिया, इसी साल रिलीज हुई ‘अमर सिंह चमकीला’ में भी इन्हीं का संगीत था। 2025 में ‘छावा’ फिल्म में उनका ही संगीत निर्देशन था। अब वही इस फिल्म को वह ‘नफरत फैलाने वाली’ बता रहे हैं। हालांकि फीस उन्होंने पूरी ली है। पिछले दिनों रिलीज हुई फिल्म ‘तेरे इश्क में’ में भी उन्हीं का संगीत है। 2025 की ही एक और फिल्म ‘उफ् ये सियापा’ में भी रहमान ने संगीत दिया। 2026 में वह नीतेश तिवारी की रामायण में काम कर रहे हैं। इसके अलावा ‘गांधी टॉक्स’ में भी उन्होंने ही संगीत दिया है।
कहीं और है निशाना
जाहिर है, अल्लाह रक्खा यानी ए.आर. रहमान का निशाना वर्तमान केंद्र सरकार पर है। उन्हें पहला पद्म पुरस्कार अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा नीत राजग सरकार ने ही दिया था, लेकिन उन्होंने किसी साक्षात्कार में इस बात के लिए धन्यवाद नहीं दिया। उन्हें विभिन्न भाजपा सरकारों के कार्यकाल में पांच बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिल चुके हैं। इस बारे में भी उन्होंने कभी बात नहीं की। यह ठीक आस्ट्रेलियाई क्रिकेटर उस्मान ख्वाजा जैसा मामला है। खराब फिटनेस और व्यवहार के आरोपों के बावजूद उन्हें आस्ट्रेलिया जैसे प्रतिस्पर्धी देश में खूब मौके मिले, लेकिन सेवानिवृत्त होने का ऐलान करते ही उन्होंने ‘मुसलमान होने के कारण अन्याय’ का नगाड़ा पीट डाला।

हिंदू से बने मुसलमान
अल्लाह रक्खा रहमान असल में पहली पीढ़ी के कनवर्टेड मुसलमान हैं। बताया जाता है कि पिता की बीमारी के समय उनका परिवार एक सूफी के संपर्क में आया। इस सूफी के प्रभाव में दिलीप शेखर का पूरा परिवार मुसलमान हो गया। वह दिलीप से अल्लाह रक्खा हो गए। परिवार भले ही नया मुसलमान है, लेकिन है, कट्टर। इतना कट्टर कि उनकी जवान बेटी बुरके में ढकी रहती है। उनके घर में तिलक या अन्य हिंदू धार्मिक चिह्न के साथ दाखिला नहीं मिलता।
प्रसिद्ध तमिल कवि और गीतकार पेराई सूदन ने संगीतकार ए. आर. रहमान के परिवार को लेकर काफी सनसनीखेज आरोप लगाए थे। पेराई सूदन को रहमान ने मिलने के लिए बुलाया, लेकिन जब वह रहमान के घर पहुंचे, तो गेट पर उनकी मां करीमा बेगम मिली। करीमा बेगम ने कहा कि पहले आपको माथे पर लगा तिलक हटाना होगा। बकौल पेराई सूदन, करीमा बेगम ने कहा, “हम मुसलमान हैं। अगर आपको अंदर आना है, तो तिलक हटाना होगा।’’ पेराई सूदन ने तिलक हटाने से इंकार कर दिया और बिना अल्लाह रक्खा से मिले, वापस लौट आए। यह वही इस्लामिक जिद है, जो कहती है कि ‘आप नमाजी टोपी पहनिए, लेकिन मैं तिलक नहीं लगा सकता। आप अस्सलाम वालेकुम का जवाब वालेकुम अस्सलाम से दें, लेकिन मैं जवाब में नमस्ते नहीं कह सकता।’
हिंदू—हिंदी दोनों से घृणा
अल्लाह रक्खा अपनी हिंदू घृणा को छिपाते भी नहीं। उन्होंने एक कार्यक्रम में कहा कि मुझे अच्छाई और बुराई में से एक को चुनने का मौका मिला। मैंने अच्छाई को चुना। इस वक्तव्य का सार ये है कि अल्लाह रक्खा की नजर में हिंदू धर्म ‘बुराई’ है, जिसे छोड़कर उन्होंने इस्लाम को चुना है। हिंदू के साथ ही अल्लाह रक्खा को हिंदी से भी घृणा है। आज वह हिंदी फिल्मों में काम न मिलने का कारण अपने मजहब को बता रहे हैं, लेकिन हिंदी को लेकर उनकी क्या सोच है, इस पर भी तो गौर कीजिए। जिस शख्स को दुनिया भर में शोहरत हिंदी से मिली, वह सार्वजनिक कार्यक्रमों व इंटरव्यू में खुलकर कहता है, ‘नो हिंदी’। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जब देश की संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की वकालत की, तो रहमान उन कुछ लोगों में से थे, जिन्होंने कहा कि हिंदी संपर्क भाषा नहीं हो सकती।
अल्लाह रक्खा और उनके समर्थक ये भूल जाते हैं कि प्रतिभा का यदि चरम आता है, तो ढलान भी आती है। ये लोग ये नहीं बताते कि शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने भारत रत्न सम्मान दिया। तबला वादक जाकिर हुसैन को अटल बिहारी वाजपेयी के ही काल में पद्म भूषण मिला। 2023 में केंद्र की मोदी सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण सम्मान दिया। सरोद वादक उस्ताद अमजद अली खान को वर्ष 2001 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने पद्म विभूषण से नवाजा।
अल्लाह रक्खा जैसे ‘नव मुसलमान’ भूल जाते हैं कि मोहम्मद यूसुफ खान उर्फ दिलीप कुमार को इस देश की जनता ने कितना प्यार दिया। नौशाद और खैय्याम के संगीत को सबने सराहा। खान तिकड़ी का तो बॉलीवुड में कई दशकों तक दबदबा रहा। कुल मिलाकर बात मुसलमान होने की नहीं है, बात है, संगीत का रंग उतर जाने की। ‘आउट डेटिड’ (कालातीत) हो जाने की। इस तथ्य को स्वीकार करने जरूरत है, न की मुस्लिम कार्ड खेलने की।
देश को बदनाम करने के ये ठेकेदार

हामिद अंसारी दस साल देश के उप राष्ट्रपति रहे। उन्हें अपने कार्यकाल के अंतिम दिन विक्टिम कार्ड की याद आई। अंतिम कार्यदिवस पर अल्पसंख्यकों का मुद्दा उठाते हुए उन्होंने कहा कि देश के मुस्लिमों में बेचैनी और असुरक्षा की भावना घर कर रही है। साथ ही कहा कि लोकतंत्र की पहचान इसी बात से होती है कि उसमें अल्पसंख्यकों को कितनी सुरक्षा मिली हुई है। अपनी एक किताब में भी उन्होंने इसी तरह के तमाम दावे किए। एक साक्षात्कार को लेकर वह खासे ट्रोल हुए, जिसमें उन्होंने कहा कि 2014 से सेक्युलरिज्म के मायने बदल गए। यह वही अंसारी हैं, जो दस साल तक उप राष्ट्रपति रहे। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर रहे। अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष रहे। भारत के राजदूत रहे। इतना सब इसी देश ने दिया और फिर यही देश, यही समाज ‘सांप्रदायिक’ हो गया।
आमिर खान ने 2015 में (2014 में केंद्र में मोदी सरकार बनी) एक कार्यक्रम में कहा था, ‘पिछले 6-8 महीने से देश में डर और असुरक्षा की भावना बढ़ी है। यहां तक कि मेरा परिवार भी अब इसको महसूस कर रहा है। मैं और मेरी पत्नी किरण राव पूरी जिंदगी भारत में ही जिए हैं, लेकिन पहली बार उन्होंने मुझसे देश छोड़ने की बात कही। उन्हें अपने बच्चे के लिए डर लगता है। उन्हें ये भी लगता है कि आने वाले समय में हमारे इर्द-गिर्द कैसा माहौल होगा। वह जब भी अखबार खोलती हैं, उन्हें डर लगता है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि समाज में अशांति बढ़ी है।’ विक्टिम कार्ड खेलने के बावजूद आमिर खान कहीं नहीं गए। जिस पत्नी के कंधे पर बंदूक रखकर उन्होंने अपने दिल की बात कही, उसे तलाक दे दिया। इसी असुरक्षा के बीच उन्होंने पीके जैसी फिल्म बनाई और महादेव का अपमान करने का दुस्साहस किया। यह वही आमिर खान हैं, जिन्होंने भारत के प्रति शत्रुता रखने वाले व दिल में खलीफा बनने की हसरत पाले तुर्की के राष्ट्रपति तैयप एर्दोगन की खातिरदारी कबूल की थी।
शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान जब ड्रग्स मामले में फंसे तो उनके बचाव में मुस्लिम कट्टरपंथियों की सबसे बड़ी पैरोकार आरफा खानम ने ट्वीट किया कि ‘आर्यन खान मामले का कोई भी लेना देना ड्रग्स का सेवन करने से नहीं है, मगर इसमें शाहरुख खान को निशाना बनाया जा रहा है। आर्यन खान के जमानत लेने के मूल अधिकार को भी इस स्वतंत्र देश में नकारा जा रहा है। शाहरुख खान निश्चित ही हमारे समय के सबसे बड़े मुस्लिम सुपर स्टार हैं। यह शाहरुख खान के लिए सन्देश है कि या तो हमारा साथ दो या फिर सजा के लिए तैयार हो जाओ।’ आरफा ने जो लिखा, सो लिखा, लेकिन शाहरुख खान ने उनके इस दावे का कभी विरोध नहीं किया।
नसीरुद्दीन शाह ने 2021 में एक साक्षात्कार में कहा था कि मुसलमानों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाया जा रहा है। मुसलमानों के बीच डर पैदा करने की कोशिश की जा रही है, लेकिन मुसलमान हार नहीं मान लेंगे। मुसलमान इसका सामना करेंगे क्योंकि हमें अपना घर बचाना है। हमें अपने बच्चों को बचाना है। मुसलमानों को असुरक्षित महसूस कराने की संगठित कोशिश की जा रही है। यह शीर्ष से किया जा रहा है। सत्ताधारी पार्टी के लिए अलगाववाद नीति बन गया है।
मोहम्मद अजहरुद्दीन को एक खिलाड़ी के तौर पर सारे देश ने प्यार दिया। वे लंबे समय तक भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान रहे, लेकिन जैसे ही हैंसी क्रोनिए मैच फिक्सिंग मामले में अजहरुद्दीन का नाम आया, तो उन्होंने भी चिर-परिचित मुस्लिम विक्टिम कार्ड ही खेला। पुख्ता सुबूत होने के बावजूद अजहरुद्दीन ने कहा कि उन्हें अल्पसंख्यक (मुस्लिम) होने के कारण निशाना बनाया जा रहा है, कुछ खिलाड़ी उनसे ईर्ष्या करते हैं।
शबाना आजमी ने लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि ‘1992 में मुझे पहली बार इस बात का अहसास हुआ कि मैं मुसलमान हूं।’ याद रखिए, यही वह समय था, जब कारसेवकों ने बाबरी ढांचे को गिरा दिया था। शबाना आजमी के मुताबिक, इस घटना के बाद उनसे लोग कहने लगे कि आप तो मुस्लिम हो। हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया कि उन्हीं के साथ ऐसा क्यों हो रहा था। यह फेहरिस्त बहुत लंबी है। कभी अवैध हथियार रखने के मामले में जेल में रहे संजय दत्त को लगने लगा कि उन्हें उनकी मां के मजहब के कारण निशाना बनाया जा रहा है तो कभी फारुख अब्दुल्ला को लगता है कि वह अगर मुसलमान न होते, तो देश के प्रधानमंत्री बन जाते। यह चिर-परिचित वैश्विक प्रवृत्ति है। व्यवस्था से लाभ उठाओ और फिर उसी को कोसो। गीतकार लकी अली को भी लगता है कि मुसलमान होने का मतलब है कि एक दिन आप अकेले रह जाओगे। यह प्रवृत्ति मुसलमानों में सर्वव्यापी है। दिल्ली दंगे के लिए जेल में बंद उमर खालिद को ही देख लीजिए। 53 लोगों की जिंदगी लील लेने वाले दंगे के आरोपी को लगता है कि उसे मुसलमान होने के कारण गिरफ्तार किया गया।

















