मेरे पिता को आंखों के सामने जला दिया गया, सज्जन कुमार के बरी होने पर टूटी 1984 दंगा पीड़ितों की उम्मीद
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मेरे पिता को आंखों के सामने जला दिया गया, सज्जन कुमार के बरी होने पर टूटी 1984 दंगा पीड़ितों की उम्मीद

अदालत के बाहर खड़ी निर्मल कौर की आंखों में आंसू थे। उन्होंने न्यूज़ एजेंसी पीटीआई से कहा कि उनके पिता को उनकी आंखों के सामने जिंदा जला दिया गया था। उस दिन के बाद से उनका परिवार कभी सामान्य जीवन में लौट नहीं सका।

Written byMahak SinghMahak Singh
Jan 23, 2026, 02:53 pm IST
inदिल्ली
सज्जन कुमार (फाइल फोटो)

सज्जन कुमार (फाइल फोटो)

दिल्ली की एक अदालत के बाहर गुरुवार का दिन 1984 के सिख विरोधी दंगों के पीड़ितों और उनके परिवारों के लिए फिर से जख्म हरा करने वाला साबित हुआ। कांग्रेस के पूर्व सांसद सज्जन कुमार की भूमिका पर आए फैसले ने उन लोगों की उम्मीदों को तोड़ दिया, जो बीते चार दशकों से इंसाफ की आस में अदालतों के चक्कर काट रहे थे। अदालत द्वारा इस मामले में सज्जन कुमार को बरी किए जाने के बाद, पीड़ित परिवारों का दर्द और गहरा हो गया।

42 साल की कानूनी लड़ा- अदालत के बाहर खड़ी निर्मल कौर की आंखों में आंसू थे। उन्होंने न्यूज़ एजेंसी पीटीआई से कहा कि उनके पिता को उनकी आंखों के सामने जिंदा जला दिया गया था। उस दिन के बाद से उनका परिवार कभी सामान्य जीवन में लौट नहीं सका। “मैंने 42 साल अदालतों में गुज़ार दिए, इस उम्मीद में कि एक दिन न्याय मिलेगा। लेकिन मेरी जिंदगी की हर अच्छी चीज मुझसे छिन गई,” उन्होंने भर्राई आवाज में कहा।

अब खोने को कुछ नहीं बचा- उनके पास खड़ी एक और महिला गुस्से और निराशा से कांप रही थीं। उन्होंने कहा कि जिन लोगों को वे अपने परिवार की मौत के लिए जिम्मेदार मानती हैं, उन्हें सज़ा मिलनी चाहिए, यहां तक कि फांसी भी। उनका कहना था कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो वे कोर्ट के बाहर ही डटे रहेंगे, भले ही इसका अंजाम कुछ भी हो। उनके शब्दों में साफ झलक रहा था कि इन परिवारों के पास अब खोने के लिए कुछ नहीं बचा है। एक अन्य पीड़ित परिवार के सदस्य वज़ीर सिंह ने कहा कि सज्जन कुमार हजारों सिखों की हत्या के लिए ज़िम्मेदार था। उन्होंने कहा कि वे इस फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट और जरूरत पड़ी तो सुप्रीम कोर्ट तक जाने के लिए भी तैयार हैं। पीड़ितों की रिश्तेदार बागी कौर ने 1984 की भयावह यादों को साझा करते हुए कहा कि उनके परिवार के दस लोग दंगों में मारे गए थे। उन्होंने बताया कि सड़कों पर लाशें बिछी थीं और लोगों को सड़क पार करने के लिए शवों के ऊपर से कूदना पड़ता था। “हम हमेशा कोर्ट में गए, लेकिन अब लगता है कि हमारी परेशानी को कोई नहीं सुन रहा।”

भावनाओं से नहीं, सबूतों से होता है न्याय- अदालत ने अपने 60 पन्नों के आदेश में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को बिना किसी संदेह के साबित करने में असफल रहा। जज दिग विनय सिंह ने माना कि कोर्ट पीड़ितों और उनके परिवारों के आघात को समझता है, लेकिन फैसला भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि सबूतों के आधार पर किया जाना चाहिए। कोर्ट के अनुसार, ज़्यादातर गवाह सुनी-सुनाई बातों पर निर्भर थे या वे कई दशकों तक आरोपी की पहचान नहीं कर पाए। हालांकि इस मामले में बरी होने के बावजूद, सज्जन कुमार 1984 से जुड़े एक अन्य मामले में उम्रकैद की सजा काट रहा है।

Topics: Sajjan KumarDelhi Courtjustice for victims1984 दंगा1984 RiotsAnti Sikh riots
Mahak Singh
Mahak Singh
2022 में ज़ी न्यूज़ से पत्रकारिता की शुरुआत की। उसके बाद न्यूज़ नेशन, दैनिक जागरण और न्यूज़ 24 जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में कार्य करते हुए पत्रकारिता के विभिन्न आयामों का अनुभव प्राप्त किया। वर्तमान में पाञ्चजन्य में सब एडिटर के रूप में कार्यरत हूं। ज़िमा ज़ी इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया आर्ट्स से मैने पत्रकारिता की है। [Read more]
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