इतिहास कभी मरता नहीं। वह सिर्फ़ रूप बदलता है— कभी खंडहर बनकर, कभी स्मृति बनकर, और कभी पुनर्निर्माण बनकर। सोमनाथ भारत का पहला ज्योतिर्लिंग है, और शायद पहला बड़ा घाव भी। जहाँ पत्थर टूटे, लेकिन स्मृति नहीं टूटी। सदियों तक वह स्मृति समाज के भीतर चुपचाप बहती रही— न नारों में, न घोषणाओं में, बल्कि चेतना में। परख के इस विशेष अंक में संपादक हितेश शंकर ने की बात की है, उस यात्रा की, जो पूछती है- • क्या मंदिरों का ध्वंस केवल सत्ता की राजनीति था या सभ्यता पर आघात? • क्या पुनर्निर्माण बदले का प्रतीक है या आत्मविश्वास की पुनर्स्थापना? • और क्या भारत अपने अतीत को दबाए बिना, भविष्य को साझा कर सकता है? सोमनाथ से अयोध्या तक, यह कहानी बदले की नहीं… परिमार्जन की है। वीडियो अच्छा लगा हो, तो अपनी राय कमेंट बॉक्स में दें और दूसरों के साथ भी इसे शेयर करें.











