दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में एनडीटीवी के संस्थापकों प्रणॉय रॉय और राधिका रॉय के खिलाफ इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की दोबारा शुरू की गई कार्रवाई को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने इसे परेशान करने वाला और मनमाना कदम बताया है।
बैकग्राउंड क्या था?
प्रणॉय रॉय और राधिका रॉय ने आरआरपीआर होल्डिंग प्राइवेट लिमिटेड (जो एनडीटीवी का प्रमोटर है) से ब्याज-मुक्त लोन लिए थे। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने पहले 2009-10 के असेसमेंट ईयर के लिए 2011 में इन लोन और एनडीटीवी के शेयर ट्रांजेक्शन की जांच शुरू की थी। उस समय आरआरपीआर की किताबें मंगवाई गईं, रॉय दंपति से स्पष्टीकरण मांगा गया और मार्च 2013 में जांच पूरी हुई, लेकिन उनकी इनकम में कोई एडिशन नहीं किया गया। यानी मामला बंद हो गया था।
डिपार्टमेंट ने क्या किया?
2016 में डिपार्टमेंट ने दोबारा नोटिस जारी किए। इस बार उन्होंने इन ब्याज-मुक्त लोन पर नॉटिकल इंटरेस्ट (काल्पनिक ब्याज) को डीम्ड इनकम मानकर टैक्स लगाने की कोशिश की। ये नोटिस 31 मार्च 2016 के थे। डिपार्टमेंट ने पुरानी जांच के बावजूद लिमिटेशन पीरियड बढ़ाकर ये कार्रवाई की।
रॉय दंपति का कहना क्या था?
प्रणॉय और राधिका ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि ये दोबारा खोलना राय बदलने जैसा है, जो कानून के खिलाफ है। एक ही ट्रांजेक्शन और एक ही मुद्दे पर दोबारा जांच नहीं हो सकती। उन्होंने इसे मनमाना और उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन बताया। उनका कहना था कि पहली जांच में सब कुछ देखा जा चुका था, फिर भी दोबारा परेशान किया जा रहा है।
कोर्ट ने क्या कहा?
दिल्ली हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच (जस्टिस दिनेश मेहता और विनोद कुमार) ने सुनवाई की। कोर्ट ने माना कि पहली जांच में आरआरपीआर की अकाउंट बुक्स चेक की गई थीं, स्पष्टीकरण लिए गए थे और कोई टैक्स नहीं लगाया गया था। अब उसी मुद्दे पर दोबारा नोटिस देना बिना अधिकार के और मनमाना है।
कोर्ट ने कहा कि ऐसी कार्रवाई से टैक्सपेयर को बेकार की परेशानी होती है और व्यवस्था में अनिश्चितता व अराजकता फैलती है। कोर्ट ने अपने फैसले में लिखा, “ऐसी परिस्थितियों में री-असेसमेंट शुरू करना एक तरफ तो असैसी को अनावश्यक परेशान करता है, दूसरी तरफ अनिश्चितता और अराजकता पैदा करता है।”
कोर्ट ने ये भी कहा कि सिर्फ नए अधिकारी को लगे कि पुराने वाले से ज्यादा समझदार हैं, तो पुरानी जांच को दोबारा नहीं खोला जा सकता। इससे टैक्सपेयर को बार-बार जांच के चक्कर में नहीं डाला जा सकता। कोर्ट ने इसे आर्टिकल 14 (समानता का अधिकार), आर्टिकल 19(1)(g) (व्यवसाय करने का अधिकार) और आर्टिकल 300A (संपत्ति का अधिकार) का उल्लंघन माना।
फैसला क्या हुआ?
कोर्ट ने 2016 के नोटिस और उसके बाद की सारी कार्रवाई रद्द कर दी। साथ ही इनकम टैक्स डिपार्टमेंट पर 2 लाख रुपये (प्रति केस 1 लाख) का जुर्माना लगाया, जो रॉय दंपति को दिया जाएगा। कोर्ट ने कहा कि ये जुर्माना छोटा है, लेकिन इतनी परेशानी के लिए कोई भी रकम काफी नहीं हो सकती।

















