डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों के कारण अमेरिका में भारतीय छात्रों की मुसीबतें बढ़ गई हैं। उनके नामांकन में भारी गिरावट आई है। ट्रंप 2.0 के पहले साल में भारतीय छात्रों की नई नामांकन करीब 75% तक कम हो गई है। यह आंकड़ा काफी चौंकाने वाला है क्योंकि पिछले कई सालों से भारत अमेरिका में सबसे ज्यादा अंतरराष्ट्रीय छात्रों को भेजने वाला देश रहा है।
रिपोर्ट का बैकग्राउंड
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप प्रशासन की शुरुआत (जनवरी 2025 से) के बाद से ही चीजें बदलनी शुरू हो गईं थी। पहले साल यानी 2025-26 एकेडमिक ईयर में यह गिरावट देखी गई। पहले ट्रंप के समय (2017-2021) में भी इमिग्रेशन पॉलिसी सख्त हुई थीं, लेकिन इस बार प्रभाव और तेज दिख रहा है।
मुख्य आंकड़े और तथ्य
- भारतीय छात्रों की नई एंरोलमेंट में 75% की कमी।
- कुल इंटरनेशनल स्टूडेंट्स में भारत का हिस्सा सबसे बड़ा था (लगभग 30% से ज्यादा), लेकिन अब नए आने वालों में भारी ड्रॉप।
- इससे पहले 2025 में जुलाई-अगस्त 2025 में भारतीय स्टूडेंट्स के आने में 46-50% तक की गिरावट दिखी थी, जो अब और बढ़कर 75% तक पहुंच गई लगती है।
- कई यूनिवर्सिटीज़ ने बताया कि नए इंटरनेशनल स्टूडेंट्स की कुल संख्या में 17% की गिरावट आई, और इसमें भारतीय छात्रों का ड्रॉप सबसे बड़ा कारण है।
वजहें क्या हैं?
ट्रंप 2.0 में इमिग्रेशन और वीजा पॉलिसी काफी सख्त हो गई हैं। मुख्य वजहें ये बताई जा रही हैं:
- स्टूडेंट वीजा (F-1) इंटरव्यू सस्पेंड या डिले होना।
- वीजा अप्रूवल में ज्यादा स्क्रूटनी और रिजेक्शन।
- ट्रैवल रेस्ट्रिक्शन्स और ओवरऑल इमिग्रेशन पर सख्ती।
- ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (OPT) और H-1B जैसे पोस्ट-स्टडी वर्क ऑप्शन्स पर अनिश्चितता।
- कई रिपोर्ट्स में 96% संस्थानों ने कहा कि वीजा संबंधी चिंताएं सबसे बड़ी वजह हैं।
प्रभाव क्या पड़ रहा है?
अमेरिकी यूनिवर्सिटीज़ के लिए यह बड़ा झटका है क्योंकि इंटरनेशनल स्टूडेंट्स (खासकर भारतीय) फुल ट्यूशन फीस देते हैं, जो यूनिवर्सिटी के बजट का अहम हिस्सा होता है। इससे रिसर्च, जॉब्स और कैंपस डाइवर्सिटी पर भी असर पड़ सकता है। दूसरी तरफ, भारतीय स्टूडेंट्स अब कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी जैसे देशों की तरफ देख रहे हैं जहां पॉलिसी ज्यादा स्टेबल लग रही है।

















