कला को हथियार बनाकर सनातन धर्म पर हमला: CF एंड्रूज से पिनाराई विजयन तक का एजेंडा
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कला को हथियार बनाकर सनातन धर्म पर हमला: CF एंड्रूज से पिनाराई विजयन तक का एजेंडा

नटराज से नाट्यशास्त्र तक महादेव की कला, लेकिन वामपंथी और मिशनरी एजेंडे ने इसे हिंदू-विरोधी हथियार बनाया। CF एंड्रूज की पुस्तक से लेकर केरल CM विजयन के कलोल्सव भाषण तक का खुलासा।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा — edited by कुलदीप सिंह
Jan 16, 2026, 10:10 am IST
inविश्लेषण
Pinarayi Vijayan using art as Leftist Agenda

पिनाराई विजयन

नृत्य के देव जहां नटराज अर्थात महादेव हैं तो संगीत के भी देव महादेव हैं। काव्य की परिभाषा देने वाले ग्रंथ नाट्यशास्त्र के रचयिता भी वही माने जाते हैं। मगर भारत में कला का प्रयोग उन्हीं देवों के अस्तित्व को नकारने के लिए लगातार मिशनरी और वामपंथियों ने किया है और इसकी जड़ें हमें सीएफ एंड्रूज़ की पुस्तक में मिलती है, जिसमें उन्होंने मिशनरी एजेंडे को फैलाने के लिए कला के प्रयोग की बात की थी। हमने जिसका उल्लेख पहले भी अपने लेख में किया है।

कला पर वामपंथी चाबुक

यह संयोग है कि जब दिल्ली में शब्दोत्सव का आयोजन हुआ और कला का भव्य रूप सामने आया और कला के उस रूप को लोगों ने देखा, जिसे एजेंडे के चलते दबाने का प्रयास किया जाता था, तो उसके कुछ ही समय बाद केरल के मुख्यमंत्री ने कला के माध्यम से एजेंडा फैलाने की वकालत की है। जैसा कि सीएफ एंड्रूज़ ने अपनी पुस्तक में लिखा था, “मेरा विश्वास दिनों दिन बढ़ रहा है कि भारतीय स्थितियों में यदि ईसाई सन्देश को स्वाभाविक बनाना है तो यह कला, संगीत और कविता के माध्यम से ही होगा बजाय इसके कि हम विवाद करें और तर्क वितर्क करें। इंग्लैण्ड से भारत के लिए एक ऐसी मिशनरी जरूरी है जिसमें कल्पना रचने की क्षमता हो और जिसमें साहित्यिक या कलात्मक या संगीत की क्षमता हो और वह उच्च क्षमता प्राप्त लोगों के दिल में संवेदनात्मक रूप से प्रवेश कर सके।”

सनातन धर्म को मिटाने के लिए कला और साहित्य का सहारा

और हिन्दू धर्म को मिटाने के लिए कला और साहित्य का सहारा लेने की बात की थी, वैसी ही बात अब केरल के मुख्यमंत्री विजयन करते हुए दिखाई दे रहे हैं। बुधवार को उन्होंने त्रिसुर में 64वें केरल स्कूल कलालोसवं का उद्घाटन करते हुए कहा कि कला का उद्देश्य केवल आनंद लाना ही नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे लोगों को जीवन के कठोर अनुभवों को भी बताने वाला होना चाहिए और कला के माध्यम से उन लोगों से लड़ना चाहिए, जो धर्म के नाम पर शांति और खुशी को नष्ट कर रहे हैं। उन्होंने एक और झूठ बोलते हुए कहा कि सामंतवाद के चलते पहले कलाओं पर सभी का अधिकार नहीं था, और सामंतवाद के जाने के बाद जब लोकतंत्र आया तो कला की प्रवृत्ति भी बदल गई और कला ने जीवन में लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता को स्थान दिया।

इसे भी पढ़ें: हद है चापलूसी की! वेनेजुएला की मारिया कोरिना माचाडो ने व्हाइट हाउस में ट्रंप से की मुलाकात, सौंपा अपना नोबल मेडल 

केरल के मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि कला पर किसी धर्म का अधिकार नहीं है और वह सभी के लिए है। उन्होंने यह कहा कि चीजें इस सीमा तक पहुँच चुकी हैं कि अब किसी भी फिल्म में जानकी या सीता जैसे नाम ही नहीं रखे जा सकते हैं। कला ऐसे दंगाइयों के खिलाफ लड़ने के लिए अचूक हथियार होनी चाहिए।

कला के नाम पर एजेंडा 

कला की तमाम विधाओं पर स्वतंत्रता के बाद से ही कम्युनिस्टों का कब्जा रहा। फिर चाहे वह फिल्में हों या फिर लेखन। फिल्मों के माध्यम से विभाजन के बाद से ही हिन्दू विरोधी फिल्में बनती रहीं। हिंदुओं को खलनायक बनाकर पेश किया जाता रहा। अय्याश शहजादा सलीम को इश्क का मसीहा बनाकर पेश किया गया। बाद में तो हिन्दी फिल्मों की यह प्रवृत्ति ही हो गई थी कि आतंकी और आतंक को ही क्लीन चिट दे दी जाए।

हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान

हिन्दू देवों का अपमान तो बहुत आम था। आमिर खान की पीके फिल्म कौन भूल सकता है और साथ ही शाहरुख खान की “मैं हूँ न” जिसमें हिन्दू और वह भी एक फौजी को आतंकी बना कर पेश किया गया था। कला का अर्थ केवल और केवल हिन्दू विरोध होकर रह गया था और एक प्रकार से एंड्रूज़ का सपना साकार वामपंथी कलाकार कर रहे थे। मगर समय ने करवट बदली और लोगों की समझ में आया कि सच्चाई कुछ और है और दिखाया कुछ और जा रहा है। और कला को वामपंथी कब्जे से निकालने के लिए कुछ लोगों ने कमर कसी और फिल्मों में और साहित्य दोनों में ही अब एजेंडे वाली चीजों को नकारा जाने लगा है।

कला को हथियार बना रहे वामपंथी

एजेंडा विफल हो रहा है और यही कारण है कि वामपंथी नेता कला को एक बार फिर से अपना हथियार बनाना चाहते हैं और धर्म पर हमला करना चाहते हैं। कला को धर्म से दूर रहने का कहने वाले विजयन सहित तमाम लोग तब एकदम चुप रह जाते हैं जब बंगाल में पूर्व मेदिनीपुर जिले के भगवानपुर स्थित एक निजी स्कूल में गायिका लग्नजिता चक्रवर्ती के साथ इसलिए दुर्व्यवहार किया गया था क्योंकि उन्होनें स्कूल में एक लाइव शो में “जागो माँ” गा दिया था और स्कूल के मालिक महबूब मलिक को यह पसंद नहीं आया था। न ही विजयन ने बांग्लादेश में कट्टरपंथियों के हाथों प्रताड़ित होते कलाकार देखे और अफगानिस्तान तक तो नजर गई ही नहीं, जहां पर तालिबान ने सभी कलाओं पर प्रतिबंध लगा दिया है।

न ही विजयन को सिस्टर लूसी कि वह पीड़ा दिखाई दी थी, जब बलात्कारी बिशप के मामले में वैटिकन में उनकी याचिका केवल इसलिए खारिज हो गई थी कि उनकी जीवनशैली “नन” जैसी नहीं है क्योंकि तमाम बातों के अतिरिक्त उन्होनें अपनी कविताओं की किताब भी छपवाई थी। उन्हें निष्कासित कर दिया गया था। मगर विजयन नहीं बोले थे।

दुर्भाग्य से कला को कोई बांध नहीं सकता है और अब कला में एजेंडे का विरोध करने वाले लोगों का स्वर मुखर हो गया है और यही कारण है कि अब विजयन ने फिर से षड्यन्त्र करने का प्रयास किया है।

Topics: Kerala School Kalolsavamसनातन धर्म विरोधLeftist artकला एजेंडापिनाराई विजयन भाषणCF एंड्रूज मिशनरीकेरल स्कूल कलोल्सववामपंथी कलाArt agendaPinarayi Vijayan speechCF Andrews missionarySanatana Dharma opposition
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