रॉकेट फोर्स: भारत तेजी ढाई फ्रंट वॉर के लिए खुद को तैयार करने में जुटा है। क्योंकि पश्चिम में पाकिस्तान और उत्तर-पूर्व में ड्रैगन चीन लगातार भारत की सीमाओं पर नजरें गड़ाए बैठे हैं। ऐसे में सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने देश में रॉकेट फोर्स बनाने की बात कही है। ऐसे में ये जानना आवश्यक हो गया है कि आखिर ये बला है क्या और देश को इसकी इतनी आवश्यकता क्यों है? वह भी तब जब हमारे पास पहले से ही ऐसी क्षमताएं हैं?
क्या कहा जनरल द्विवेदी ने
दरअसल, भारतीय सेना के प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने 13 जनवरी 2026 को वार्षिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि अब भारत को एक रॉकेट-कम-मिसाइल फोर्स बनाने की जरूरत है। चीन और पाकिस्तान ने पहले ही ऐसी फोर्स बना ली है, इसलिए हमारे लिए भी यह समय की मांग है। उन्होंने कहा, “यह आज की जरूरत है, जितनी जल्दी हम ऐसी फोर्स बनाएंगे, देश की सुरक्षा के लिए उतना ही बेहतर होगा।” सरकार इस पर सहमत है, लेकिन अभी फैसला होना बाकी है कि यह फोर्स सेना के अंदर रहेगी या रक्षा मंत्रालय या CDS के सीधे नियंत्रण में।
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रॉकेट फोर्स क्या है?
रॉकेट फोर्स एक खास तरह की सैन्य इकाई है, जो लंबी दूरी की रॉकेट और मिसाइल सिस्टम चलाती है। आज के युद्ध में यह बहुत अहम है क्योंकि इसमें सैनिकों को दुश्मन के बहुत करीब जाने की जरूरत नहीं पड़ती। कमांड सेंटर से ही सैकड़ों किलोमीटर दूर के टारगेट पर सटीक हमला किया जा सकता है। रॉकेट और मिसाइल मिलकर दुश्मन के एयरफील्ड, कमांड सेंटर, बेस या बुनियादी ढांचे को कुछ ही मिनटों में पंगु बना सकते हैं। ब्रह्मोस जैसी सुपरसोनिक मिसाइल या प्रलय जैसी बैलिस्टिक मिसाइल रडार, जीपीएस और इन्फ्रारेड से गाइड होकर काम करती हैं। ये नॉन-कॉन्टैक्ट युद्ध का मुख्य हथियार बन गए हैं।
भारत के लिए क्यों है महत्वपूर्ण
भारत की सुरक्षा स्थिति को देखते हुए यह फोर्स बहुत जरूरी है। चीन ने 2015 में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी रॉकेट फोर्स (PLARF) बनाई, जो दुनिया की सबसे बड़ी मिसाइल ताकतों में से एक है। इसमें 1250 से ज्यादा मिसाइलें और हाइपरसोनिक तकनीक शामिल है। पाकिस्तान ने भी हाल में (13 अगस्त 2025 को) चीन की तर्ज पर आर्मी रॉकेट फोर्स कमांड (ARFC) बनाने की घोषणा की, जिसमें फतह सीरीज की मिसाइलें (750-1000 किमी रेंज) तेजी से बढ़ रही हैं।
जबकि भारत के पास पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट सिस्टम है, जिसकी रेंज अब 120 किमी तक पहुंच गई है। आगे 150 किमी, 300-450 किमी तक ले जाने के कॉन्ट्रैक्ट साइन हो चुके हैं। प्रलय और ब्रह्मोस जैसे सिस्टम भी हैं। लेकिन ये अभी आर्टिलरी या एयर डिफेंस के अंदर बंटे हुए हैं। एक डेडिकेटेड फोर्स बनाने से ये सब एक साथ इंटीग्रेट होकर ज्यादा असरदार होंगे।











