मकर संक्रान्ति: मातृशक्ति द्वारा राष्ट्रधर्म जागरण का प्रतीक माघी
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मकर संक्रान्ति: मातृशक्ति द्वारा राष्ट्रधर्म जागरण का प्रतीक माघी

माघी पर्व मकर संक्रांति का उत्सव है, लेकिन सिख इतिहास में यह चालीस मुक्तों की शहादत का प्रतीक बन गया। जानिए मुक्तसर साहिब की लड़ाई, माता भग कौर की भूमिका और दर्शनीय गुरुद्वारों की कहानी।

Written byराकेश सैनराकेश सैन — edited by कुलदीप सिंह
Jan 13, 2026, 01:42 pm IST
in पंजाब
Maghi

प्रतीकात्मक तस्वीर

मकर संक्रान्ति परिवर्तन का पर्व है परंतु सिख इतिहास में ऐसी घटना घटी कि यह पर्व शहीदी पर्व बन गया। पंजाब में इसे माघी पर्व कहा जाता है। पन्थ की दैनिक अरदास में जिन चालीस मुक्तों का नाम बड़े गौरव से लिया जाता है उन्हीं चालीस शूरवीरों ने देश व धर्म के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया था। असल में इन शूरवीरों के शौर्य जागरण की प्रेरणा बनी देश की मातृ शक्ति जिसने सोए हुए पुरुषार्थ को ऐसा जगाया कि चालीस शूरवीरों ने अपने से बड़ी मुगल सेना के दांत खट्टे कर दिए।

इतिहास के अनुसार, बैसाख 1705 विक्रमी संवत में जब गुरू गोबिंद सिंह ने धर्मयुद्ध करते हुए आनंदपुर साहिब का किला छोडक़र मालवा का रुख किया। गुरु जी ने कोटकपूरा नगर पहुंच कर वहां के चौधरी कपूरे से किले की मांग की ताकि यहां मोर्चा लगा कर पीछा कर रही वीजर खान की सेना का मुकाबला किया जा सके, लेकिन चौधरी ने मुगल सत्ता से डरते हुए मदद करने से इनकार कर दिया। इसके बाद गुरूजी खिदराने की ढाब पहुंचे। साथ ही दुश्मन की फौज भी यहां पहुंच गई। कहा जाता है कि आनंदपुर साहिब के भयंकर युद्ध के बीच गुरू की फौज के 40 योद्धा गुरुजी का साथ छोड़ कर अपने घरों को जाने लगे। जाने से पहले गुरुजी ने उनसे लिखवा लिया कि ‘आज से न तो वे उनके गुरु हैं और न ही उन्हें छोडऩे वाले सिख उनके शिष्य। सिख परम्परा में इसे बेदावा के नाम से जाना जाता है।

मातृशक्ति ने जगाया देश का पुरुषार्थ

कहते हैं कि गुरुजी का साथ छोड़ने के बाद उन्हें आत्मग्लानि हुई और घर जाने पर महिलाओं ने भी उन्हें धिक्कारा कि ऐन मुश्किल समय में आप गुरुजी का साथ कैसे छोड़ आए। इन महिलाओं ने इन सिखों को चूड़ियां पहन कर घर बैठने, बच्चे पालने का कह कर खुद लड़ाई के मैदान में जाने की बात कही। मातृशक्ति द्वारा देश का पुरुषार्थ जगाने के बाद इन सिखों को अपनी गलती का अहसास हुआ। फिर वे माता भाग कौर के नेतृत्व में आए और इस स्थान पर गुरुजी को घेरा डाले हुए मुगल सेना पर कहर बन कर टूट पड़े और वीरगति को प्राप्त हुए। कहते हैं कि इस लड़ाई में गुरुजी ने अपने इन बहादुर शिष्यों की वीरता आंखों से देखी और खुद एक टिब्बे (टीले) पर बैठ कर दुश्मनों पर तीर चलाते रहे। अंत में जब इन्हीं 40 वीरों में से भाई महासिंह नामक योद्धा को गुरूजी के दर्शन हुए तो वह जख्मी हालत में थे। यहां भाई महासिंह को गुरूजी ने कहा कि उनकी वीरता से प्रसन्न हैं तो भाई महा सिंह ने गुरूजी से अपनी भूल सुधारने का आग्रह किया। इस पर गुरूजी ने उन सभी वीर शहीदों को माफ कर सम्मान बख्शा। आनंदपुर साहिब में इन चालीस सिखों द्वारा लिख कर दिए गए बेदावे को फाड़ कर उन्हें मुक्त कर दिया। यही है वह एतिहासिक कहानी, जिसके बाद खिदराने की ढाब का नाम मुक्तिसर पड़ा।

चालीस सिंहों के नाम

भाई शमीर सिंह, भाई सरजा सिंह, भाई साधू सिंह, भाई सुहेल सिंह, भाई सुल्तान सिंह, भाई सोभा सिंह, भाई संत सिंह, भाई हरसा सिंह, भाई हरी सिंह, भाई करन सिंह, भाई करम सिंह, भाई काला सिंह, भाई कीरत सिंह, भाई कृपाल सिंह, भाई खुशहाल सिंह, भाई गुलाब सिंह, भाई गंगा सिंह, भाई गंडा सिंह, भाई घरबारा सिंह, भाई चम्मा सिंह, भाई जादो सिंह, भाई जोगा सिंह, भाई जंग सिंह, भाई दयाल सिंह, भाई दरबारा सिंह, भाई दिलबाग सिंह, भाई धर्म सिंह, भाई धन्ना सिंह, भाई निहाल सिंह, भाई निधान सिंह, भाई बू? सिंह, भाई भाग सिंह, भाई भोला सिंह, भाई भंगा सिंह, भाई महा सिंह, भाई मज्जा सिंह, भाई मान सिंह, भाई मया सिंह, भाई राय सिंह व भाई लछमन सिंह।

दर्शनीय स्थल

गुरुद्वारा टुट्टी गंढी साहिब-यही वो जगह है, जहां भाई महा सिंह का अपनी गोद में लेकर बेदावा फाड़ दिया और सभी वीरों को बागी न मारकर फिर से अपने साथ जोड़ लिया था। पंजाबी में टुट्टी गंढी, लेकिन हिंदी भाषा में टूटी हुई गांठ देना के नाम से इस गुरुद्वारे को जाना जाता है।

गुरुद्वारा तंबू साहिब– मुगलों के साथ खिदराने के युद्ध के समय जिस स्थान पर सिखों द्वारा तंबू लगाए गए थे, वहां गुरुद्वारा तंबू साहिब सुशोभित है। माता भाग कौर की याद में भी इसके पास गुरुद्वारा भाग कौर बना है।

गुरुद्वारा शहीद गंज साहिब- इस स्थान पर गुरू गोबिंद सिंह जी ने क्षेत्र के सिखों की सहायता से मुगलों के साथ युद्ध करते समय शहीद हुए चालीस मुक्तों का अंतिम संस्कार किया था। जिस कारण यहां पर गुरुद्वारा शहीद गंज साहिब सुशोभित है।

गुरुद्वारा रकाबसर साहिब- यह वह स्थान है, जहां दशमेश पिता के घोड़े की रकाब टूट गई थी। जब गुरू साहिब टिब्बी साहिब से उतर कर खिदराने की रणभूमि की ओर चले तो घोड़े की रकाब पर पांव रखते ही वह टूट गई थी। अब तक वह टूटी हुई रकाब उसी प्रकार सुरक्षित रखी हुई है तथा वहां गुरुद्वारा रकाबसर बना हुआ है।

गुरुद्वारा तरनतारन दुख निवारण साहिब – गुरुद्वारा तरनतारन दुख निवारण बठिंडा रोड पर स्थित है जहां प्रत्येक रविवार श्रद्धालु सरोवर में स्नान करते हैं। चालीस मुक्तों की इस पवित्र धरती पर माघी के शुभ अवसर पर दूर-दूर से लाखों की संख्या में आए श्रद्धालु यहां बने पवित्र सरोवर में स्नान कर अपने जीवन को सफल बनाते हैं।

शहीदी पार्क – थोड़ी दूर ही शहीदी पार्क भी है, जहां एक मीनार स्थापित है। इस मीनार का निर्माण धातु के चालीस छल्लों से किया गया है, जो उन चालीस वीर शहीदों की शहदात का प्रतीक हैं। मीनार पर खिदराने की ढाब का तमाम इतिहास अंकित है।

‘नूरदीन’ को आज भी पड़ते हैं ‘जूते’

श्री मुक्तसर साहिब में एक ऐसे नूरदीन गद्दार की कब्र है जिस पर हर श्रद्धालु जा कर जूते मारता है। असल में गुरु गोबिन्द सिंह जी की सेना में शामिल नूरदीन ने एक दिन धोखे से गुरुजी पर हमला कर उनकी हत्या का प्रयास किया, परन्तु गुरुजी ने उसे ही यमलोक पहुंचा दिया। मु$गलों ने गुरु गोबिंद सिंह को युद्ध में हराना असम्भव समझा, इसलिए उन्होंने एक गद्दार नूरदीन को सिख का रूप देकर गुरु के पास भेजा और वो उनकी सेना में शामिल हो गया।

एक दिन सुबह जब गुरुजी दातुन कर रहे थे, तब नूरदीन ने तलवार से हमला किया, लेकिन गुरु ने पानी का लोटा उसके सिर पर दे मारा जिससे उसकी मौत हो गई। इस घटना की जगह आज श्री मुक्तसर साहिब के पास गुरुद्वारा दातनसर है। लोग नूरदीन की कब्र पर जूते-चप्पल मारते हैं, जो गद्दारी का प्रतीक है। लेकिन यह भी दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि गुरु गोबिन्द सिंह जी आखिरकार ऐसे ही एक पठान जमशेद खान के हमले का शिकार हुए जो उनके बलिदान होने का कारण बना।

Topics: गुरु गोबिंद सिंहKhidrane Di Dhabमकर संक्रांतिMaghi FairMakar Sankrantiमाघी मेलाmuktsar sahibमाघी पर्वचालीस मुक्तेमुक्तसर साहिबखिदराने दी ढाबMaghi FestivalGuru Gobind SinghChalis Mukte
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