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होम भारत पंजाब

संस्कृति के साथ राष्ट्रीय चेतना का पर्व भी है लोहड़ी

लोहड़ी का पर्व मकर संक्रांति से एक दिन पहले मनाया जाता है। जानें भगवान कृष्ण द्वारा लोहिता राक्षसी वध की पौराणिक कथा, पंजाब के लोकनायक दुल्ला भट्टी की मुगलों के खिलाफ वीरता, सुंदर-मुंदरी गीत का रहस्य, बेटियों की लोहड़ी, किसानों का उत्सव और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव।

Written byराकेश सैनराकेश सैन — edited by कुलदीप सिंह
Jan 12, 2026, 01:11 pm IST
inपंजाब
Lohri

प्रतीकात्मक तस्वीर

मकर संक्रांति से एक दिन पूर्व मनाया जाने वाला लोहड़ी का पर्व न केवल हमारी सांस्कृतिक विरासत बल्कि राष्ट्रीय चेतना से भी जुड़ा है। पौराणिक इतिहास के अनुसार, इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने लोहिता राक्षसी का वध कर समाज को भयमुक्त किया वहीं पंजाब के लोकनायक दु्ल्ला भट्टी ने मुगलों के खिलाफ संघर्ष कर न केवल गरीबों को अत्याचारों से मुक्ति दिलवाई बल्कि समाज में राष्ट्रीय चेतना का भी संचार किया। दुल्ला भट्टी की घटना इस देश के उन मुसलमानों के लिए भी सबक है जो अपने आप को मुगल आक्रांताओं से जोड़ते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि इन विदेशी आक्रांताओं ने भारत के स्थानीय मुसलमानों के साथ भी उतना ही दुर्रव्यवहार व अत्याचार किए जितना कि हिन्दुओं के साथ।

लोहिता राक्षसी का वध

पौराणिक इतिहास है कि भगवान श्री कृष्ण के समय से ही लोहड़ी का त्योहार मनाया जाता है। इस विषय में एक कथा है कि भगवान श्री कृष्ण के जन्म बाद कंस ने श्री कृष्ण को मारने की बहुत कोशिश की और इसके लिए कंश ने कई असुरों और राक्षसों को गोकुल भेजा।  इस क्रम में कंस ने एक लोहिता नाम की राक्षसी को गोकुल भेजा था। जब लोहिता गोकुल आई तब सभी गांव वाले मकर संक्रांति की तैयारी में व्यस्त थे क्योंकि अगले दिन मकर संक्रांति का त्योहार था। मौके का लाभ उठाकर लोहिता ने श्री कृष्ण को मारने का प्रयास किया लेकिन श्री कृष्ण ने खेल ही खेल में लोहिता का वध कर दिया। जब नंद बाबा, यशोदा और गांव वालों ने राक्षसी के मृत शरीर को देखा तो सूर्य देव का उपकार मानते हुए लकड़ियों का ढेर लगाकर अग्नि को प्रज्ज्वलित किया और अग्नि में चावल, मूंगफली, तिल से बनी चीजें जैसे रेवड़ियां और गजक डालकर आंनद मनाने लगे।

प्रकृति और कृषि से जुड़ाव

इस संदर्भ में एक अन्य मान्यता भी है। दरअसल सूर्यदेव को प्रकृित में अन्नदाता माना जाता है। इनके कारण ही कृषि उन्नत और समृद्ध होती है इसलिए जब घर में नई फसल तैयार होकर आती है तो सबसे पहले इन्हें भेंट किया जाता है। अग्नि में जब कुछ भी भेंट स्वरूप डाला जाता है तब वह यज्ञ भाग के रूप में देवताओं के पास पहुंच जाता है। यही कारण है कि नए चावल, मूंगफली, गुड़, तिल से तैयार रेवड़ी और गजक जो इस समय होते हैं उन्हें अग्नि में डालकर सूर्य देव और अग्नि देव का धन्यवाद किया जाता और माना जाता है कि ऐसा करने से अगली फसल भी अच्छी होगी और घर में समृद्धि आती है।

लोकनायक दुल्ला भट्टी से जुड़ी घटना

लोहड़ी की अग्नि में पंजाब का इतिहास, लोकपरंपराएं और जीवन मूल्य एक साथ सिमट आते हैं। यही कारण है कि यह पर्व महज उत्सव नहीं, बल्कि संस्कारों की विरासत बन चुका है। लोहड़ी का उत्सव लोकगीत सुंदर-मुंदरिए के बिना अधूरा है। इस गीत में नाम आता है दुल्ला भट्टी का। भारत-पाकिस्तान की वाघा सीमा से लगभग 200 किलोमीटर दूर सांदल बार के इलाके में साल 1547 में भाटी राजपूत खानदान के मुस्लिम परिवार में लद्दी और फरीद खान राजपूत के घर दुल्ला भट्टी का जन्म हुआ। दुल्ला के दादा सांदल भट्टी ने मुगल बादशाह हुमायूं को लगान देने से इंकार कर दिया। उससे गुस्सा हो हुमायूं ने सांदल भट्टी की हत्या करवा कर उसकी खाल में हवा भरवा दी और गांव के बाहर लटका दिया। दुल्ला भट्टी को संबोदित करते हुए पंजाब के लोकगीतों में अभी तक इस घटना का जिक्र मिलता है-

तेरा दादा सांदल मारेया,
दित्ता बोरे विच पवा।
मुगलां पुट्ठियां खल्लां लुहा के,
भरेया नाल हवा।

दुल्ला भट्टी ने जवानी में मुगल साम्राज्य के प्रति विद्रोह की मशाल जलाए रखी। अकबर उसे डाकू कहता था जबकि पंजाब के लोग उसे जननायक मानते थे। वह गांव की बहन-बेटियों का न केवल सम्मान करता बल्कि उनकी रक्षा भी करता। इसी तरह सुंदर-मुंदरी नामक दो युवतियों पर एक शक्तिशाली जिमींदार की बुरी नजर थी, इन बहनों का रिश्ता हो गया परंतु जिमींदार के भय से उनकी शादी नहीं हो पा रही थी। बताते हैं कि दुल्ला भट्टी ने इन बहनों को अपनी बेटियां बना कर उन परिवारों में शादी करवाई जहां इनके परिवार वाले चाहते थे। लोहड़ी की आग के चारों ओर फेरे दिलवाए गए और कन्यादान में शक्कर दी गई। आज भी गाया जाता है कि-

सुंदर मुंदरीए – हो,
तेरा कौन विचारा – हो,
दुल्ला भट्टी वाला – हो,
दुल्ले दी धी विहायी – हो,
सेर सक्कर पाई – हो,

यह गीत केवल सामूहिक गायन नहीं बल्कि मुगलकालीन पंजाब के जननायक दुल्ला भट्टी के विद्रोह और नारी सम्मान की कथा है। यही कारण है कि लोकगीतों में उनका नाम आज भी श्रद्धा से लिया जाता है। यह गीत याद दिलाता है कि पंजाब की मिट्टी में अन्याय के खिलाफ खड़े होने का साहस रचा-बसा है। कहते हैं कि एक बार दुल्ला भट्टी व उनके साथियों ने जंगलों में शिकार करने आए सलीम को भी दुल्ला भट्टी ने पकड़ लिया परंतु यह कहते हुए छोड़ दिया कि मेरी तो दुश्मनी मुगल बादशाह से है, उसके बेटे से नहीं। पाकिस्तानी पंजाब में आज भी लोग मानते हैं कि दुल्ला ने एक बार अकबर को भी पकड़ लिया था, परंतु डर के मारे बंदी अकबर ने दुल्ला को कहा कि ‘वो बादशाह नहीं बल्कि भंड (भाण्ड) है’ तो दुल्ला हंस पड़ा और कहा जब बादशाह ने अपने आप को भाण्ड मान लिया तो उसे मारने का क्या फायदा।’ कहते हैं कि अकबर इस अपमान को बर्दाश्त नहीं कर पाया और उसने 12 हजार की सेना दुल्ला भट्टी को गिरफ्तार करने के लिए भेजी पर वह काबू नहीं आया। एक दिन साल 1599 में उसे धोखे से गिरफ्तार कर लिया गया और लाहौर के पास मिआनी साहिब गांव में उसे फांसी दे दी गई। वहां पर आज भी उसकी कब्र मौजूद है।

बदलती सोच: बेटियों की लोहड़ी

कभी लोहड़ी को केवल पुत्र-प्राप्ति से जोडक़र देखा जाता था लेकिन समय के साथ समाज की सोच में बदलाव आया है। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ की भावना अब पर्व की परंपराओं में भी झलकने लगी है। आज कई घरों में बेटियों की लोहड़ी भी पूरे उत्साह से मनाई जाती है। लोकगीतों के बोलों में भी परिवर्तन दिखता है, जहां अब मुंडे के साथ धी की लंबी उम्र और उज्ज्वल भविष्य की कामना की जाती है। हालांकि यह बदलाव अभी सभी तबकों तक पूरी तरह नहीं पहुंचा लेकिन यह संकेत है कि समाज प्रगतिशील दिशा में बढ़ रहा है।

किसान और प्रकृति का पर्व

लोहड़ी का सीधा संबंध किसान और उसकी फसल से है। माघी के आगमन से पहले मनाया जाने वाला यह पर्व रबी की फसल की उम्मीदों से जुड़ा है। अलाव में तिल, गुड़, रेवड़ी और मूंगफली अर्पित कर किसान प्रकृति के प्रति आभार जताता है। कड़ाके की ठंड में खेतों में मेहनत करने वाले किसान के लिए यह उत्सव परिश्रम और आशा का प्रतीक बन जाता है।

संस्कृति का संदेश

पंजाब की गलियों से लेकर हर गांव-शहर तक गूंजते लोहड़ी के गीत अपनी जड़ों की ओर लौटने का संदेश देते हैं। यह पर्व सिखाता है कि इस संस्कृति में राष्ट्रहित व जनहित के लिए की गई बगावत भी पूजनीय है और बुजुर्गों का सम्मान भी अनिवार्य है। बशर्ते इरादा नेक हो और समाजहित सर्वोपरि।

अर्थव्यवस्था की धड़कन

लोहड़ी पंजाब में सिर्फ सांस्कृतिक उत्सव नहीं बल्कि एक मजबूत मौसमी अर्थव्यवस्था भी खड़ी करती है। जनवरी के पहले पखवाड़े में मनाए जाने वाले इस पर्व से मूंगफली, रेवड़ी, गजक, गुड़, तिल, लकड़ी, ढोल, टेंट और डीजे जैसे कारोबारों को खासा लाभ होता है। यह सभी गतिविधियां स्वदेशी उत्पादों व उत्पादकों से जुड़ी हैं। अनुमान के मुताबिक लोहड़ी से पहले और बाद के करीब एक हफ्ते में ही शहरों और कस्बों में करोड़ों रुपये का कारोबार होता है। बाजारों में मूंगफली और रेवड़ी की अस्थायी से लेकर थोक दुकानों तक भीड़ उमड़ पड़ती है। दुकानदारों के अनुसार सामान्य दिनों की तुलना में इस दौरान बिक्री लगभग दस गुना तक बढ़ जाती है।

सबसे अधिक मांग मूंगफली, रेवड़ी, पॉपकॉर्न और गच्चक की रहती है, जबकि तिल और गुड़ से बने उत्पाद भी खूब बिकते हैं। ढोल वादक, टेंट हाउस और डीजे संचालकों के लिए भी लोहड़ी राहत लेकर आती है। विवाह के ऑफ-सीजन में यह पर्व उन्हें काम और आमदनी दोनों देता है। छोटे दुकानदारों का कहना है कि महंगाई और मंदी के बीच लोहड़ी की एक हफ्ते की कमाई साल की शुरुआत को संभालने में मदद करती है। लोहड़ी आज केवल परंपरा नहीं, बल्कि बदलती सोच और स्थानीय अर्थव्यवस्था दोनों की प्रतीक बन चुकी है। जहां एक ओर यह बेटियों के सम्मान का मंच बन रही है, वहीं दूसरी ओर हजारों परिवारों की रोजी-रोटी में गर्माहट घोल रही है।

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राकेश सैन
राकेश सैन
वरिष्ठ पत्रकार। पंजाब के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक मुद्दों पर लेखन। [Read more]
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