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स्वामी विवेकानंद: जिनकी चेतना से जागी भारत की स्वतंत्रता की ज्वाला

स्वामी जी की प्रगाढ़ मान्यता थी कि धरती की गोद में यदि कोई ऐसा देश है जिसने मनुष्य की हर तरह की बेहतरी के लिए ईमानदार कोशिशें की हैं, तो वह भारत ही है। उनकी दृष्टि में हिन्दू धर्म के सर्वश्रेष्ठ चिन्तकों के विचारों का निचोड़ पूरी दुनिया के लिए अब भी ईर्ष्या का विषय है।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी — edited by Mahak Singh
Jan 12, 2026, 11:50 am IST
in भारत
swami vivekananda

swami vivekananda

भारतभूमि के प्रति जो अगाध प्रेम स्वामी विवेकानंद जी ने देशवासियों के अंतस में संचारित किया था, वही स्वतंत्रता आंदोलन की मुख्य प्रेरणा बना। वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के पुरोधा थे। आजादी के आंदोलन के सभी चरणों पर उनका व्यापक प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित देखा जा सकता है।

राष्ट्रीय चेतना का आवाहन

भारत भ्रमण के दौरान देशभर के राजाओं को जोड़ने का प्रयत्न भी इस उद्देश्य से स्वामी जी ने किया था। उन्होंने अपनी प्रचंड तपश्चर्या से सूक्ष्म जगत को इतना मथ डाला था कि भारत की प्रसुप्त आत्मा जाग उठी थी। इसी का परिणाम था कि जन-जन में स्वतंत्रता की ज्वाला धधक उठी थी। युवाओं में स्वतंत्रता के लिए आत्माहुति के पीछे उनकी ही प्रेरणा थी। सूक्ष्म स्थूल का आधार होता है। जो सूक्ष्म में घटित होता है वही कालांतर में स्थूल में परिवर्तित हो जाता है। इसी आधार पर स्वामी विवेकानंद ने भारतीय स्वतंत्रता के लिए सूक्ष्म जगत को उद्वेलित किया था।

स्वतंत्रता का भविष्यदर्शन

नवजीवन प्रकाशन कोलकाता से प्रकाशित भूपेंद्र नाथ दत्ता की पुस्तक ‘’पैट्रियोट प्रॉफिट स्वामी विवेकानंद’’ में उल्लेख है कि अपनी फ्रांसीसी शिष्या जोसेफाईन मैक्लियाड से स्वामी जी ने कहा था कि क्या निवेदिता नहीं जानती है कि मैंने परतंत्र राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए पूरा प्रयास किया किंतु विदेशियों के शासन के कारण देशवासियों की प्रसुप्त चेतना अभी अभी इस परिवर्तन के लिए तैयार नहीं है, किन्तु निकट भविष्य में इसके सुपरिणाम अवश्य सामने आएंगे।

स्वामी विवेकानंद का राष्ट्रवादी प्रभाव

भगिनी निवेदिता लिखती हैं, ‘’ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर स्वामी विवेकानंद का प्रभाव फ्रांसीसी क्रांति पर रूसो के प्रभाव अथवा रूसी व चीनी क्रांति पर कार्ल मार्क्स के प्रभाव से किसी भी तरह से कम नहीं था। कोई भी स्वतंत्रता आंदोलन राष्ट्रव्यापी चेतना की पृष्ठभूमि तैयार किए बिना आकार नहीं ले सकता।‘’ उनके अनुसार विभिन्न समकालीन स्रोतों से स्पष्ट होता है कि भारत में राष्ट्रीयता की भावना की जागरण में स्वामी विवेकानंद का प्रभाव सबसे सशक्त था। वे नींव के निर्माण में लगने वाली आधारशिला ही नहीं; अपितु राष्ट्रीय जीवन के अन्यतम प्रतीक भी थे। अपनी मित्र व स्वामी विवेकानंद की अनुयायी श्रीमती एरिक हेमंड को भेजे पत्र में भगनी निवेदिता ने इस बात का उल्लेख करते हुए लिखा था,‘’अंग्रेज उनके प्रति आशंकित हैं। अल्मोड़ा में पुलिस अपने जासूसों के द्वारा स्वामी जी पर दृष्टि रही है। यद्यपि स्वामी जी इस बात को गंभीरता से नहीं लेते हैं पर यदि ब्रिटिश सरकार स्वामी जी के खिलाफ कोई अनुचित कदम उठाएगी तो उसका विरोध करने वाली राष्ट्रवादी ताकतों में वे भी पूर्ण निष्ठा से शिरकत करेंगी।‘’

यह भी पढ़ें- स्वामी विवेकानंद के प्रेरणादायक विचार जो युवाओं को सफलता की राह दिखाते हैं

युवाओं में क्रांतिकारी चेतना के प्रेरणास्रोत

ज्ञात हो कि स्वामी जी के लेखों और भाषणों ने अनेक सुशिक्षित हिंदुओं पर गहरी छाप छोड़ी थी। उस दौर में पुलिस जब भी किसी क्रांतिकारी के घर की तलाशी लेने जाती थी तो वहां उसे वहां स्वामी विवेकानंद जी की पुस्तकें अवश्य मिलती थीं। सुप्रसिद्ध देशभक्त क्रांतिकारी ब्रह्मबांधव उपाध्याय और अश्विनी कुमार दत्त का कहना था कि स्वामी जी ने उन्हें बंगाली युवाओं की अस्थिओं से एक ऐसा शक्तिशाली हथियार बनाने को कहा था जो भारतमाता को गुलामी की बेड़ियों से स्वतंत्र करा सके। चर्चित बंगाली लेखक कालीचरण घोष अपनी प्रेरणादायी रचना ‘’दि रोल ऑफ ऑनर एनेक्टोड ऑफ इंडियन मार्टियर्स’’ में बंगाल के युवा क्रांतिकारियों के मन पर स्वामी जी के प्रभाव के बारे में लिखते हैं, ‘’स्वामी जी की वाणी ने न सिर्फ देश के युवाओं के मन में राष्ट्रभक्ति की भावना भरी थी वरन उनमें राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय होने की प्रवृत्ति भी विकसित की थी । स्वामी विवेकानंद का बौद्धिक जगत पर पड़ा प्रभाव उनके देहावसान के बाद बंगाल में क्रांतिकारी आंदोलन के रूप में श्री अरविंद के उद्भव के रूप में सामने आया था।

राष्ट्रचेतना के प्रतीक

निसंदेह; यदि हम भारतवासी राष्ट्र को सही स्वरूप में जानना चाहते हैं तो हमें विवेकानन्द के विचारों को पूरी ईमानदारी से पढ़ने की जरूरत है। महज 39 वर्ष के संक्षिप्त जीवनकाल में स्वामी विवेकानन्द जो काम कर गये, वे आने वाली अनेक शताब्दियों तक हम भारतवासियों का सशक्त मार्गदर्शन करने में सक्षम हैं। तीस वर्ष की आयु में इस युवा संन्यासी ने शिकागो (अमेरिका) के विश्व धर्म सम्मेलन में जिस ओजस्विता के साथ हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व कर उसे सार्वभौमिक पहचान दिलवायी, वह अतुलनीय है। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर का कहना था, ‘’यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानन्द को पढ़िये। उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पायेंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं।”

धर्म, देश और मानवता

फ्रांसीसी इतिहासकार रोम्या रोलां अपनी पुस्तक “लाइफ ऑफ विवेकानंद’’ में स्वामी जी के बारे में लिखते हैं,”उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असम्भव है, वे जहाँ भी गये, सर्वप्रथम ही रहे। हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता था। वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी। हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री उन्हें देख ठिठक कर रुक गया था और आश्चर्यपूर्वक चिल्ला उठा-‘शिव!’ यह ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के आराध्य देव ने अपना नाम उनके माथे पर लिख दिया हो। वे केवल सन्त ही नहीं, एक महान देशभक्त, वक्ता, विचारक, लेखक और मानव-प्रेमी भी थे।”

स्वामी जी का अटूट विश्वास था कि पवित्र भारतवर्ष धर्म एवं दर्शन की पुण्यभूमि है। यहीं बड़े-बड़े महात्माओं व ऋषियों का जन्म हुआ, यही संन्यास एवं त्याग की भूमि है तथा यहीं-केवल यहीं-आदिकाल से लेकर आज तक मनुष्य के लिये जीवन के सर्वोच्च आदर्श एवं मुक्ति का द्वार खुला हुआ है। उनकी यह जीवन दृष्टि उनके कथन-“‘उठो, जागो, स्वयं जागकर औरों को जगाओ। अपने नर-जन्म को सफल करो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये।” से परिपुष्ट होती है। कहा जाता है कि उन्नीसवीं सदी के आखिरी वर्षोँ में विवेकानन्द क्रान्ति के जरिये देश को आजाद करना चाहते थे परन्तु उन्हें जल्द ही यह विश्वास हो गया था कि अभी देश की सामाजिक परिस्थितियां उन इरादों के लिये परिपक्व नहीं हैं। इसके बाद उन्होंने ‘एकला चलो‘ की नीति का पालन करते हुए एक परिव्राजक के रूप में भारत और दुनिया को खंगाल डाला।

भारत का आध्यात्मिक आत्मविश्वास

स्वामी जी की प्रगाढ़ मान्यता थी कि धरती की गोद में यदि कोई ऐसा देश है जिसने मनुष्य की हर तरह की बेहतरी के लिए ईमानदार कोशिशें की हैं, तो वह भारत ही है। उनकी दृष्टि में हिन्दू धर्म के सर्वश्रेष्ठ चिन्तकों के विचारों का निचोड़ पूरी दुनिया के लिए अब भी ईर्ष्या का विषय है। स्वामी जी ने संकेत दिया था कि विदेशों में भौतिक समृद्धि तो है और उसकी भारत को जरूरत भी है लेकिन हमें याचक नहीं बनना चाहिये। हमारे पास उससे ज्यादा बहुत कुछ है जो हम पश्चिम को दे सकते हैं और पश्चिम को उसकी बेहद जरूरत है।

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