कन्याकुमारी : जहां स्वामी विवेकानंद ने देखा था भारत के नवनिर्माण का दिव्य स्वप्न
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कन्याकुमारी : जहां स्वामी विवेकानंद ने देखा था भारत के नवनिर्माण का दिव्य स्वप्न

स्वामी विवेकानंद के जीवन पर लिखे लोकप्रिय उपन्यास ‘न भूतो न भविष्यति’ में उपन्यासकार नरेंद्र कोहली ने स्वामी विवेकानंद को कन्याकुमारी में हुई अद्भुत अनुभूतियों का अत्यंत मनोमुग्धकारी वर्णन किया है।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी — edited by Mahak Singh
Jan 10, 2026, 01:19 pm IST
in भारत
स्वामी विवेकानंद

स्वामी विवेकानंद

माँ जगदम्बा की तपोस्थली कन्याकुमारी निःसंदेह अद्भुत है। हिंद महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के सागरों की सम्मिलित उत्ताल तरंगें इस पुण्यभूमि की उस पावन श्रीपाद शिला को नित्य पखारती हैं; जहां देवाधिदेव महादेव को पति रूप में पाने के लिए माँ आदिशक्ति ने कन्या रूप में घोर तपस्या की थी। मुख्य मंदिर से दूर समुद्र के मध्य स्थित इस श्रीपाद शिला पर अंकित माँ के चरण चिह्न शताब्दियों से उनकी दुर्धर्ष तपश्चर्या के साक्षी बने हुए हैं। इसी पावन धरती पर स्वामी विवेकानंद ने सर्वप्रथम भारत के नव निर्माण का स्वप्न देखा था।

आह्वान और आत्मसमर्पण

स्वामी विवेकानंद के जीवन पर लिखे लोकप्रिय उपन्यास ‘न भूतो न भविष्यति’ में उपन्यासकार नरेंद्र कोहली ने स्वामी विवेकानंद को कन्याकुमारी में हुई अद्भुत अनुभूतियों का अत्यंत मनोमुग्धकारी वर्णन किया है। वे लिखते हैं, ‘’अदृश्य का आकर्षण, संस्कारों की सांकल अथवा नियति का विधान उस युवा संन्यासी को उस ओर इंगित कर रहा था। संभव है कि पहले कभी यहां मंदिर रहा हो परंतु अभी तो सागर की लहरों ने श्रीपाद शिला को मुख्य भूमि से अलग कर दिया था। उस युवा संन्यासी ने मंदिर में मां के विग्रह को प्रणाम किया और फिर मंदिर से बाहर निकलकर उस शिला की ओर एकटक देखने लगा। सागर तट पर कुछ लोग अपने नौकाओं के साथ थे परंतु उन्हें देने के लिए उनके पास पैसा ना था और बिना पैसे के उन्हें भला कोई क्यों गन्तव्य तक ले जाता। वे अपने प्राणों में मां की पुकार को आकुलता से अनुभव कर रहे थे और यह त्वरा तीव्र से तीव्रतम होती जा रही थी। सहसा मन में यह विचार कौंधा कि जिसकी सृष्टि है, जिसका सागर है, जिसके सभी समुद्री जलचर और महामत्स्य हैं; जब वही मां मुझे बुला रही हैं तब फिर प्रतीक्षा किसकी और अवरोध कैसे! भला मां से बड़ा कोई नाविक है क्या! और इस निश्चय के साथ वे पास की एक चट्टान पर चढ़े और उस अथाह जलराशि में कूद पड़े। ‘छपाक’ की ध्वनि से लोगों का ध्यान उधर गया। तट पर खड़े लोगों ने देखा कि एक युवक संन्यासी सागर में तैरता हुआ श्रीपाद शिला की दिशा में बढ़ रहा था। सागर बेहद अशांत था।

यह भी पढ़ें- स्वामी विवेकानंद के प्रेरणादायक विचार जो युवाओं को सफलता की राह दिखाते हैं

ध्यान से राष्ट्रनिर्माण तक

तेज लहरों ने साधु को उसकी हिम्मत के लिए चेतावनी दी, लेकिन उसके मन में ब्रह्मांड की माँ से मिलने की एक अजीब इच्छा थी। यूं समुद्र तो उन्होंने अनेक बार देखे थे पर लहरों ने इस तरह अजगर बनकर उनको कभी न बांधा था; परन्तु महासागर की इन तूफानी लहरों के बीच अठखेलियां करते भयावह महामत्स्यों और मानवभक्षी शार्कों के बीच भी वे पूरी तरह शांत व निर्भीक थे क्यूंकि वे भलीभांति जानते थे कि मां उनके साथ लीला कर रही हैं। जगन्माता की अदृश्य कृपा का यह अभेद्य कवच उन्हें उनके गंतव्य की ओर तेजी से अग्रसर कर रहा था। अचानक उन्होंने अनुभव किया कि वे श्रीपाद शिला के निकट पहुंच गये हैं। उन्होंने दृष्टि उठायी तो सामने अलौकिक दृश्य उपस्थित था। नजरों के सामने सागर और आकाश मिलकर एक हो रहे थे। दृष्टि के सामने श्रीपाद शिला को देख उनकी आंखों में आंसू छलक उठे। उन्होंने शिला पर मस्तक रखकर प्रणाम किया और कह उठे- हे माँ! तुम्हारी तपस्या से पाषाण तक पिघल गये थे तभी तो तुम्हारे चरण चिह्न यहां अंकित हो सके। प्रार्थना की उस स्थिति में उन्हें भुवन मोहिनी जगत व्यापिनी मां जगदम्बा की प्रत्यक्ष उपस्थिति का अनुभव हुआ और सहसा वे ध्यानस्थ हो उठे। उनके ध्यान में भारत के गौरवशाली अतीत की स्मृतियाँ जागृत हो उठीं। आद्यशक्ति जगदम्बा उन्हें अनुभव करा रही थीं कि उसी सर्वोच्च स्थिति की पुनर्प्राप्ति के लिए भारत की आध्यात्मिक चेतना की नव प्रतिष्ठा अनिवार्य है। तीन दिन की इस अविराम ध्यान साधना के साथ वह युवा संन्यासी एक राष्ट्र निर्माता, विश्व शिल्पी स्वामी विवेकानंद के रूप में परिणत हो गया।‘’

Topics: Swami Vivekananda idea ​​nation buildingSwami VivekanandaKanyakumariShripad Shilareconstruction of IndiaVivekananda's meditationKanyakumari Sadhana
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