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विमानन क्षेत्र: दबदबे से बना दबाव !

भारत के विमानन क्षेत्र में यात्रियों की बढ़ती संख्या, हवाईअड्डों के विस्तार और निजीकरण से प्रगति तो हुई, लेकिन कोविड के बाद बड़ी कंपनियों का एकाधिकार भी बढ़ा । इसलिए किराए में किराए में बेतहाशा वृद्धि हुई। चुनिंदा एयरलाइन्स के वर्चस्व को तोड़ेने के लिए जरूरी सुधारों के साथ नई कंपनियों को लाइसेंस देना होगा

Written byडॉ. अश्वनी महाजनडॉ. अश्वनी महाजन
Jan 7, 2026, 07:20 pm IST
inविश्लेषण

भारत की बढ़ती सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि, प्रति व्यक्ति आय में सुधार, मध्यम वर्ग की बढ़ती संख्या, जनसंख्या संरचना में परिवर्तन, युवाओं की बढ़ती आबादी, स्टार्टअप व उद्यमिता विकास जैसे कारकों ने वायु सेवाओं की मांग को बढ़ाया है। विमानन क्षेत्र को गति देने में सरकारी नीतियां भी सहायक रहीं। विशेषकर निजी क्षेत्र को हवाईअड्डा विकास के लिए प्रोत्साहन, नीतिगत सरलता आदि ने विमानन क्षेत्र को नए पंख दिए।

भारत में घरेलू यात्रियों की संख्या निरंतर बढ़ी और 2024 में यह संख्या 16.13 करोड़ यात्रियों तक पहुंच गई। यदि इसमें अंतरराष्ट्रीय यात्रियों को भी शामिल किया जाए तो भारत में कुल यात्री 37.6 करोड़ थे। सिर्फ मार्च 2025 में ही यह आंकड़ा 1.45 करोड़ पहुंच चुकी थी। बीते 11 वर्ष के दौरान देश में हवाईअड्डों की संख्या बढ़कर 160 से अधिक हो चुकी है, जो 2014 में 74 थी। हवाई यात्रियों की संख्या की दृष्टि से भारत आज दुनिया में तीसरे क्रम पर है।

निजीकरण के दौर में सरकारी क्षेत्र की कंपनी एयर इंडिया के एकाधिकार के समाप्त होने के बाद देश में निजी विमानन कंपनियों का दौर शुरू हुआ। विमान यात्रा तक आम आदमी के पहुंच बन गई, जो पहले केवल धनी लोगों तक सीमित थी। मध्यमवर्गीय परिवार के कैप्टन गोपीनाथ विमानन क्षेत्र में निजी क्षेत्र के हस्ताक्षर के रूप में स्थापित हुए। उनकी कंपनी एयर डेक्कन किफायती एयरलाइन के रूप में उभरी। हालांकि, विमान किरायों को सीमित रखने के उद्देश्य से यात्रा के दौरान भोजन सुविधा आदि में कटौती की गई। पहले जहां किराया 5,000 से 10,000 रुपये तक होता था, अब उसी के लिए यात्रा भाड़ा 1,000 से 2,500 रुपये तक सीमित हो गया है।

बढ़ती मांग, बढ़ता बाजार

धीरे-धीरे विमानन क्षेत्र में अधिक कंपनियां आने लगीं। दुनिया के विमानन उद्योग की बारीकियों को भारत के नए उद्यमी समझ चुके थे। बढ़ती जीडीपी और क्रय क्षमता ने विविध क्षेत्रों में मांग बढ़ाई, विमान यात्रा भी इससे अछूती न रही। छोटे शहरों में भी आबादी बढ़ी और कई शहरों में जहां पहले आबादी कम थी, वहां अब यह काफी बढ़ चुकी है। 2001 में भारत में 35 ऐसे शहर थे, जहां आबादी 10 लाख या अधिक थी, लेकिन आज उनकी आबादी 75-80 लाख हो चुकी है। यात्रियों की बढ़ती संख्या विमानन क्षेत्र के विस्तार का संकेत देती है। 2023 में भारतीय विमानन कंपनियों ने 1,000 से अधिक विमान खरीद का ऑर्डर देकर दुनिया को चकित कर दिया। प्रारंभिक दौर में प्रतिस्पर्धा के कारण हवाई किराया बहुत कम था। एक समय तो ऐसा भी आया, जब हवाई यात्रा और रेल यात्रा के बीच प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई। इससे यात्रियों को सुविधा मिली और किफायत भी।

एक तरफ भारत में विमानन क्षेत्र का विस्तार अभूतपूर्व है, वहीं यह अत्यंत प्रतिस्पर्धी क्षेत्र अब एकाधिकार की ओर बढ़ रहा है। इसमें कुछ कंपनियों का दबदबा बढ़ रहा है। कोविड महामारी के दौरान विमानन कंपनियों की आर्थिक स्थिति बिगड़ी। इंडिगो, एयर इंडिया और उसकी सहयोगी कंपनियां तो इससे उबर गईं, लेकिन गो-फर्स्ट और स्पाइसजेट को भारी नुकसान हुआ। गो-फर्स्ट एयरलाइंस, जो 8 प्रतिशत बाजार हिस्से के साथ भारत की चौथी सबसे बड़ी एयरलाइन थी, वित्तीय मुश्किलों के कारण दिवालिया हो गई। हालांकि, शुरुआत में इसकी समस्याएं वित्तीय से अधिक तकनीकी थीं, जिसमें इंजन सप्लायर ‘प्रैट एंड व्हिटनी इंजन्स’ मुख्य रूप से जिम्मेदार रही। यह कंपनी एयरबस ए-320 नियो एयरक्राफ्ट के इंजन सप्लाई करती है। गो-फर्स्ट को आपूर्ति किए गए इंजनों की खराबी के कारण कई जहाज ग्राउंड करने पड़े। इससे कंपनी को भारी वित्तीय नुकसान हुआ। देनदारियां चुकाने में नाकाम रहने पर दिवालिया प्रक्रिया शुरू हुई और 3 मई, 2023 में गो-फर्स्ट ने उड़ानें रोक दीं।

मिला किराए बढ़ाने का माैका

दिवालिया कानून के कारण गो-फर्स्ट जल्दी दिवालिया घोषित हो गई, पर स्पाइसजेट भारी संकटों के बावजूद व्यवसाय बचाने में सफल रही। इसने अपनी उधारी को काफी हद तक समायोजित तो कर लिया, पर इसका बाजार हिस्सा 12.6 प्रतिशत से घटकर मात्र 2.5 प्रतिशत रह गया। यानी, दो बड़ी विमानन कंपनियों, जिनका हिस्सा क्रमशः 6.9 प्रतिशत और 12.5 प्रतिशत था, में से एक बाजार से बाहर हो गई और दूसरे का हिस्सा बहुत कम रह गया। नतीजा, टाटा समूह की विमानन कंपनियों का हिस्सा 27 प्रतिशत और इंडिगो का 65 प्रतिशत बढ़ गया, जबकि स्पाइसजेट सहित शेष कंपनियों का हिस्सा मात्र 8 प्रतिशत रह गया। विमानन क्षेत्र में बढ़ते एकाधिकार ने बड़ी कंपनियों को किराया बढ़ाने का अवसर दे दिया। दिल्ली-मुंबई का विमान किराया, जो पहले 3,500-4,000 रुपये तक था, बढ़कर 6,000-7,000 रुपये हो गया। इसी तरह, अन्य क्षेत्रों में भी किराया बेतहाशा बढ़ने लगा। इसकी शिकायतें बार-बार होती रहीं, लेकिन न सरकार और न ही नियामक संस्थान (नागरिक उड्डयन महानिदेशक) ने कोई उपाय किया।

हाल ही में विमानन कंपनियों में एकाधिकार का मुद्दा तेजी से उभरा, जब पायलटों के काम के घंटे निश्चित करने वाला पुराना नियम सख्ती से लागू हुआ। इससे इंडिगो एयरलाइंस को हजारों उड़ानें रद्द करनी पड़ीं। यात्रियों को असुविधा हुई, साथ ही सरकार व नियामक पर सवाल उठे कि इन कंपनियों को बाजार हिस्सा इतना बढ़ाने की अनुमति कैसे मिली? कुछ मार्गों पर एकाधिकार कैसे बढ़ा? अपनी गलती से रद्द उड़ानों के बाद महंगी दरों पर टिकट बेचकर मुनाफा कमाने की कोशिश कैसे हुई?

ऐसे में देश के सामने अवसर है कि विमानन क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ाई जाए, ताकि यात्रियों को लाभ मिले। कंपनियां लाभ के उद्देश्य से बिना वजह किराया न बढ़ाएं और नियमों का पालन करें, जिससे यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित हो। आज आवश्यकता है कि नए खिलाड़ियों को लाइसेंस दिए जाएं और उन्हें कारोबार बढ़ाने की सुविधा मिले।

सरकार नागरिक उड्डयन क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए संरचनात्मक सुधारों पर ध्यान केंद्रित कर सकती है-

भारत का विमानन बाजार प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार है, जिसमें दो नई एयरलाइंस-अल हिंद एयर और फ्लाईएक्सप्रेस-को केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्रालय से अनापत्ति प्रमाण-पत्र (एनओसी) मिल गया है। एक और कैरियर, उत्तर प्रदेश की शंख एयर, जिसे पहले ही एनओसी मिल चुका है, के 2026 में उड़ान शुरू करने की उम्मीद है। निस्संदेह, नई एयरलाइंस के आने से आने वाले समय में विमानन क्षेत्र में कुछ बड़ी कंपनियों का दबदबा टूटेगा।

Topics: निजीकरणकिफायती एयरलाइनDirectorate General of Civil Aviationविमानन टरबाइन ईंधनभारत का विमानन क्षेत्रसकल घरेलू उत्पादपाञ्चजन्य विशेष
डॉ. अश्वनी महाजन
डॉ. अश्वनी महाजन
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