मध्य प्रदेश के सागर जिले से सनातन धर्म में घर वापसी का मामला प्रकाश में आया है। जहां, जिले के एक युवक असद खान ने इस्लाम छोड़कर सनातन धर्म अपना लिया है। इसके साथ ही उन्होंने अपना नाम बदलकर अथर्व त्यागी रख लिया है। यह सब 29 दिसंबर 2025 को वाराणसी (काशी) में हुआ, जहां गंगा के बीच नाव पर बैठकर उन्होंने सनातन धर्म में प्रवेश किया।
बचपन से ही हिंदू देवताओं की भक्ति
असद, यानी अब अथर्व, बचपन से ही महादेव, श्री राम और बजरंगबली के मंदिर जाते रहे हैं। वे हिंदू रीति-रिवाज अच्छे से जानते हैं और हनुमान चालीसा भी पूरी याद है। उनका कहना है कि दिल से वे हमेशा सनातन धर्म के प्रति आकर्षित रहे, लेकिन नाम और आईडी कार्ड की वजह से सिर्फ औपचारिक रूप से मुस्लिम थे।
मंदिर जाने में आती थी दिक्कत
असद ने बताया कि मुस्लिम नाम होने की वजह से मंदिरों में दर्शन करने जाते समय लोग उन्हें शक की नजर से देखते थे। कई बार असहज स्थिति बन जाती थी, सुरक्षा को लेकर भी चिंता होती थी। इस मानसिक द्वंद्व को खत्म करने के लिए उन्होंने सोचा कि काशी आकर औपचारिक रूप से हिंदू बन जाना चाहिए। कुछ रिपोर्टों में यह भी जिक्र है कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों से वे काफी आहत थे, जिसने उनके मन में यह फैसला और मजबूत किया।
काशी में गंगा के बीच हुआ समारोह
सोमवार को अस्सी घाट पर सबसे पहले उनका मुंडन कराया गया। फिर हनुमान सेना के सदस्यों और पंडितों के साथ नाव पर सवार होकर गंगा के बीच पहुंचे। वहां वैदिक मंत्रों के बीच शुद्धिकरण हुआ। जनेऊ पहनाया गया, तिलक लगाया गया, शिखा छोड़ी गई और सनातन धर्म में दीक्षित किया गया। 11 या 21 ब्राह्मणों की मौजूदगी में पूरा अनुष्ठान हुआ। अंत में पंडितों ने उनका नया नाम अथर्व त्यागी रखा।
किसकी मदद से हुआ यह सब
अथर्व ने बाबा बागेश्वर धाम के पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के शिष्य अलोक सनातन से संपर्क किया था। अलोक सनातन और हनुमान सेना के अध्यक्ष सुधीर सिंह ने काशी में पूरा इंतजाम किया। अथर्व ने कहा कि वे अब महाकाल के दर्शन करने महाकालेश्वर मंदिर जाएंगे।
अपनी आंतरिक आवाज की सुनी
अथर्व त्यागी अब सागर वापस जाएंगे। वहां नाम बदलने की कानूनी प्रक्रिया पूरी करेंगे – गजट नोटिफिकेशन करवाकर आधार, पैन कार्ड आदि दस्तावेज अपडेट कराएंगे। उनका परिवार अभी भी इस्लाम को मानता है, लेकिन इस फैसले में उनका कोई जिक्र नहीं आया। अथर्व का कहना है कि यह कदम किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि अपनी आंतरिक आवाज सुनकर उठाया है। वे सनातन के मूल विचारों – अहिंसा, करुणा और मानवता – से गहराई से जुड़े महसूस करते हैं। अब वे अपने विश्वास के अनुसार जीवन जीना चाहते हैं।

















