धान की पैदावार व शहरी क्षेत्रों में जल स्रोतों के अत्यधिक दोहन के चलते पानी के संकट का सामना करने वाले पंजाब की आम आदमी पार्टी की सरकार की पानी बचाने में कोई रुचि नहीं है। शायद यही कारण है कि राज्य केंद्र सरकार द्वारा इस दिशा में चलाई गई अमृत योजना में पंजाब पिछड़ता जा रहा है।
केंद्रीय योजनाओं की राज्य में रफ्तार धीमी
केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी अमृत योजना के तहत पंजाब में पेयजल और सीवेज प्रबंधन से जुड़ी परियोजनाओं की गति बेहद धीमी पाई गई है। संसद की स्थायी समिति ने अपनी ताजा समीक्षा रिपोर्ट में कहा है कि राज्य जलशोधन अवसंरचना के निर्धारित लक्ष्यों को हासिल करने में पिछड़ रहा है, खासकर जल संशोधन संयंत्रों के निर्माण और संचालन के मोर्चे पर। केंद्र की रिपोर्ट के मुताबिक, अमृत चरण-2 के तहत पंजाब में करीब 14.8 एमएलडी क्षमता वाले 3 वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट्स को मंजूरी दी गई थी, लेकिन अब तक इनमें से एक भी परियोजना पूरी नहीं हो सकी है। वहीं तुलना करें तो हरियाणा ने स्वीकृत तीन में से एक परियोजना को चालू कर दिया है, जबकि हिमाचल प्रदेश में मंजूर दो परियोजनाएं भी अभी तक धरातल पर नहीं उतर पाई हैं।
योजना और हकीकत में भारी अंतर
संसदीय समिति ने बताया कि पंजाब ने कुल 518.9 एमएलडी क्षमता के नए जल संशोधन संयंत्र लगाने की योजना बनाई थी, लेकिन अब तक महज 113 एमएलडी क्षमता ही चालू हो पाई है। इससे साफ है कि राज्य में लगभग 405.9 एमएलडी क्षमता का बड़ा अंतर बना हुआ है। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि पंजाब में प्रतिदिन करीब 2,111 एमएलडी सीवेज उत्पन्न होता है, जबकि मौजूदा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स की कुल स्थापित क्षमता लगभग 1,628.5 एमएलडी है। इनमें से भी औसतन केवल 80 प्रतिशत क्षमता का उपयोग किया जा रहा है, जिससे लगभग 482.5 एमएलडी सीवेज बिना पर्याप्त ट्रीटमेंट के रह जाता है।
दूसरे राज्यों की तुलना में स्थिति कमजोर
समीक्षा रिपोर्ट में कहा गया है कि हरियाणा, गुजरात, मध्य प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, असम और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों ने अमृत योजना के तहत वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट्स के कमीशनिंग लक्ष्य हासिल कर लिए हैं। इसके विपरीत पंजाब के साथ-साथ महाराष्ट्र, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में भी परियोजनाओं की प्रगति संतोषजनक नहीं पाई गई। समिति का कहना है कि भले ही पंजाब में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स की उपयोग दर कुछ हद तक बेहतर नजर आती हो, लेकिन सीवेज उत्पादन की तुलना में ट्रीटमेंट क्षमता कम होने के कारण कुल अंतर अभी भी चिंताजनक स्तर पर बना हुआ है।













