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अटल जी पद से नहीं, कद से जाने जाते थे

पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी राष्ट्र को सर्वोपरि मानते थे। उनका कहना था ‘पार्टियां बनेगी-बिगड़ेंगी, सरकारें आएंगी-जाएंगी, पर यह देश रहना चाहिए। देश का लोकतंत्र अमर रहना चाहिए। राष्ट्रधर्म और राजधर्म ही सर्वोच्च है।‘ उनके ये शब्द भारतीय धरा पर हमेशा गूंजते रहेंगे।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Dec 27, 2025, 10:16 am IST
in भारत, दिल्ली

गत 24 दिसंबर को पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी जी की 101वीं जयंती के अवसर पर इंडिया फाउंडेशन की ओर से आठवें अटल बिहारी स्मृति व्याख्यान का आयोजन किया गया। इंडिया हैबिटैट सेंटर में आयोजित इस स्मृति व्याख्यान के मुख्य वक्ता मालदीव के पूर्व उपराष्ट्रपति फैसल नसीम थे।

अपने वक्तव्य में श्री फैसल नसीम ने कहा कि हमारे देश ने भारत के सान्निध्य में लोकतंत्र की यात्रा की शुरु की थी। हमारा लोकतंत्र भारत की अपेक्षा अभी भी बहुत युवा है। हम भारत के पड़ोसी देश हैं। हम दोनों का स्वप्न है कि दक्षिण एशिया में शांति और समृद्धि आए। हमारे लिए संवाद और लोकतंत्र का सम्मान ही सर्वोपरि है।

कार्यक्रम के मंच पर अशाेक मित्तल मालदीव के पूर्व उपराष्ट्रपति फैसल नसीम को सम्मानित करते हुए। साथ में हैं, श्री राम माधव एवं श्री विजय गोयल

उन्होंने कहा कि वाजपेयी जी ने ध्रुवीकरण के दौर में भी दृढ़ता दिखाई और कड़े निर्णय लिए। वाजपेयी जी अच्छे कवि थे। उनकी कविताएं आशा और संयम का संदेश देती हैं। वह मानते थे कि शक्ति मानवता के विकास के लिए होनी चाहिए। लोकतंत्र आम जनता के विश्वास से संचालित होता है। अटल जी लंबे समय तक विपक्ष में रहे, लेकिन हमेशा लोकतंत्र की मर्यादा और आदर्श को उच्च स्थान प्रदान किया। श्री वाजपेयी ने समावेशी भावना को प्रोत्साहित किया। मालदीव को जब भी जरूरत पड़ी है, भारत सहयोग के लिए तत्पर रहा है।
इससे पूर्व अपने स्वागत भाषण में इंडिया फाउंडेशन के संस्थापक राम माधव ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की स्मृति में इस व्याख्यान की शुरुआत 2018 में हुई थी। इस आयोजन के माध्यम से हम उनकी स्मृतियोें को जीवित रखना चाहते हैं। वाजपेयी जी का युग पीढ़ियों तक कायम रहेगा, उनकी आभा हमेशा युवा पीढी के मानस पर अंकित रहेगी। गठबंधन सरकार में उन्होंने गठबंधन धर्म निभाया। उन्होंने राष्ट्र को सर्वोपरि रखा। उनका कहना था-‘पार्टियां बनेगी-बिगड़ेंगी, सरकारें आएंगी-जाएंगी। पर यह देश रहना चाहिए। देश का लोकतंत्र अमर रहना चाहिए।‘

इस अवसर पर गांधी स्मृति के उपाध्यक्ष विजय गोयल ने कहा कि अटल जी के साथ उनका संपर्क लगभग पांच दशक का रहा। छात्र जीवन से ही उनके साथ काम करने का अवसर मिला। वह महान राजनेता नहीं थे, बल्कि शांति, लोकतंत्र और संवाद के पक्षधर थे।
श्री गोयल ने आगे कहा कि वाजपेयी जी राजनीति में आना नहीं चाहते थे। वह स्वदेश, पांचजन्य, वीर अर्जुन, राष्ट्रधर्म से जुड़े थे, किंतु जब डाॅक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी जम्मू काश्मीर में ‘एक देश एक निशान‘ का मुद्दा लेकर आंदोलन कर रहे थे और वहां उनको गिरफ्तार कर लिया गया। बाद में वहीं उनकी मृत्यु हो गई। उससे पहले उन्होंने वाजपेयी जी को कहा था-मेरे अधूरे काम को पूरा करना। इसलिए वह राजनीति में आए। वह लगातार पंडित दीन दयाल उपाध्याय और डाॅक्टर मुखर्जी के साथ काम करते हुए एक कार्यकर्ता के रूप में आगे बढ़े।

श्री वाजपेयी के जन्म शताब्दी वर्ष के निमित्त आयोजित एक अन्य कार्यक्रम प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय के सभागार में सम्पन्न हुआ। इसमें अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चैधरी ने प्रकाश डाला। व्याख्यान का आयोजन समकालीन अध्ययन केंद्र की ओर से किया गया था। नीरजा चैधरी ने भारतरत्न अटल बिहारी वाजपेयी की लोकप्रियता की चर्चा करते हुए कहा कि नब्बे के दशक में जब वे गांवों में लोगों से राजनेताओं के बारे में जानने की कोशिश करतीं तो सबकी जबान पर अटल जी का नाम होता था। उन्हें सभी जानते थे।

यह महत्वपूर्ण है कि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1960 में ही अटल जी को भारत का भावी प्रधानमंत्री माना था। वह 1957 में जनसंघ की ओर से पहली बार सांसद चुने गए थे। उनकी हिंदी से नेहरू जी बहुत प्रभावित थे। उनके हिंदी भाषण से प्रभावित होकर नेहरू जी ने उनके प्रश्नों का उत्तर अंग्रेजी के बजाय हिंदी में दिया। 1957 के चुनाव के समय उत्तर प्रदेश में एक रैली को युवा अटल बिहारी वाजपेयी संबोधित कर रहे थे। उनके भाषण से प्रभावित होकर, कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि बहुत अच्छा बोलता है, उसे बोलने दो। चुनाव में जनता किसे चुनती है, यह अलग बात है।

वाजपेयी जी एक उत्कृष्ट वक्ता, कवि और राजनीतिज्ञ थे। वह कश्मीर के मुद्दे को लेकर बहुत चिंतित रहते थे। उनका कश्मीर की सांस्कृृतिक सुरक्षा के बारे में एक ही नारा था-हमें कश्मीर की कश्मीरियत, इंसानियत और जम्हूरियत को बचाना है।

सुश्री चौधरी ने कहा कि अटल जी का व्यक्तित्व बहुत सौम्य, हंसमुख, उदार और शांत था। लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी समकालीन थे। अटल जी की हिंदी तो अच्छी थी, पर अंग्रेजी में आडवाणी ज्यादा दक्ष थे। दोनों ही दीनदयाल जी के बहुत नजदीक थे। भारतीय राजनीति में यह जोड़ी अनोखी और ऐतिहासिक मित्रता की मिसाल बनी। 1995 में मुंबई में एक रैली के दौरान आडवाणी जी ने अटल जी को पार्टी का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया था। उन्होंने आगे बताया कि पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव के साथ भी अटल जी की बहुत अच्छी मित्रता थी। वह उन्हें अपना राजनीतिक गुरु मानते थे। अटल जी के काव्य संग्रह ‘मेरी 51 कविताएं’ का लोकार्पण नरसिंह राव ने ही किया था। राजीव गांधी जी से भी उनकी अच्छी मित्रता थी। अस्सी के दशक में अटल जी कुछ अस्वस्थ चल रहे थे। राजीव गांधी को पता चला तो उन्होंने न्यूयार्क में उनके ठहरने और स्वास्थ्य जांच की व्यवस्था करवाई। परमाणु परीक्षण के बाद, भारत पर विश्व का दबाव बढ़ा और आर्थिक प्रतिबंध लगे, उस स्थिति को भी अटल जी ने बहुत सूझ-बूझ केे साथ संभाला। इस कार्यक्रम में अनेक गणमान्यजन उपस्थित थे।

Topics: विपक्ष की मर्यादासमावेशी भावनाइंसानियत और जम्हूरियतलोकतंत्र की यात्राउत्कृष्ट वक्ताध्रुवीकरण का दौरराष्ट्र सर्वोपरिपरमाणु परीक्षण आर्थिक प्रतिबंधकश्मीरियतर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी जीराजनीतिक प्रतिशोधजन्मशती वर्षगठबंधन धर्म
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