निशान्त जैन : प्राकृतिक कृषि से बंजर भूमि में बसाया जीवन और मुनाफा
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निशान्त जैन : प्राकृतिक कृषि से बंजर भूमि में बसाया जीवन और मुनाफा

फिरोजाबाद के निशान्त जैन ने स्वदेशी गोवंश आधारित प्राकृतिक कृषि से बंजर भूमि को हरा-भरा किया और किसानों को रासायनिक खेती से बचाया।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी — edited by Shivam Dixit
Dec 18, 2025, 05:42 pm IST
in भारत, पर्यावरण

एक समय था जब हरित क्रांति के दौर में रसायनों व उर्वरकों ने भारतीय कृषि की अर्थव्यवस्था में चार चांद लगा दिये थे। लेकिन; सीमित भूमि में अधिक उत्पादन के बढ़ते लालच के चलते रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग से मिट्टी, पानी व हवा में गहराती विषाक्तता के रूप में रासायनिक खेती का खमियाजा आज पूरी मानव जाति भोग रही है। इस समस्या का समाधान प्राकृतिक कृषि में निहित है।

यह कहना है उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के एक प्रयोगधर्मी युवा कृषक निशान्त जैन का, जिनके जीवन का मकसद गोवंश आधारित भारत की पुरातन कृषि को बढ़ावा देकर लोगों को रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक करना है।

पिता के निधन से प्रेरित जीवन की दिशा

इस राह के चुनाव का कारण पूछने पर निशान्त बताते हैं कि 2018 में उनके पिता गंभीर रूप से बीमार पड़ गये थे। चिकित्सीय जाँच में कैंसर की पुष्टि से पूरा परिवार हैरान रह गया। कारण कि सामान्य तौर पर जिन वजहों और आदतों से यह भयानक रोग होता है, वैसा कुछ भी उनके पिता से साथ न था।

कैंसर और रासायनिक खेती का संबंध

पिता की चिकित्सा करने वाले राजीव गांधी कैंसर अस्पताल (नयी दिल्ली) के चिकित्सक की बातों से इस तथ्य का खुलासा हुआ कि रासायनिक खेती की अंधाधुंध पैदावार कैंसर जैसी महामारी का एक बड़ा कारक बन कर देश दुनिया में तेजी से उभर रही है। इस जानकारी ने उनको भीतर तक उद्वेलित कर दिया और पिता के निधन से हुई अपूर्णीय क्षति ने उनके जीवन की समूची दिशाधारा बदल कर रख दी।

शैक्षिक पृष्ठभूमि और जीवन में बदलाव

निशान्त बताते हैं कि उनकी शैक्षिक कामर्स में पोस्ट ग्रेजुएट और सीएस (कम्पनी सेक्रेटरी) की है। पिता की मृत्यु से पूर्व वे गुरुग्राम की एक मल्टीनेशनल कंपनी में 65,000 प्रति माह की सैलरी पर कार्यरत थे और सामान्य सुविधाजनक शहरी जीवन व्यतीत कर रहे थे। मगर पिता को खोने के बाद उनका जीवन पूरी तरह बदल गया और उन्होंने तय कर लिया कि अब कृषि क्षेत्र में ही काम करना है।

कृषि के लिए ज्ञान और अनुभव की खोज

कृषि उनके लिए बिल्कुल नया था। इसलिए सबसे पहले उन्होंने इंटरनेट से तमाम जानकारियां खंगालीं। फिर मोटरसाइकिल से उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, गुजरात, उड़ीसा, झारखण्ड, हिमाचल प्रदेश व उत्तराखंड से लेकर सिक्किम तक लगभग 17-18 राज्यों की हजारों किलोमीटर की यात्रा की। उस यात्रा के दौरान सफलतापूर्वक प्राकृतिक कृषि करने वाले सैकड़ों किसानों से मुलाकात की और उनके खेतों का गहराई से निरीक्षण-परीक्षण कर स्वदेशी गोवंश आधारित प्राकृतिक कृषि पद्धति की तमाम बारीकियां सीखी।

कान सिंह निर्वाण और कनेरी मठ का मार्गदर्शन

इस दिशा में मुझे कान सिंह निर्वाण (ज़ोर की ढाणी, सीकर, राजस्थान) का काफी महत्वपूर्ण सहयोग मिला। उनकी भूमि को देखकर जाना कि वे किस तरह रेगिस्तान में जंगल बनाने का अद्भुत कार्य कर रहे हैं।

कान सिंह जी ने मुझे कनेरी मठ, कोल्हापुर (महाराष्ट्र) जाने का सुझाव दिया। वहाँ जाकर मेरा विश्वास और भी दृढ़ हो गया। वे कहते हैं कि वाकई कनेरी मठ भारत की परम्परागत कृषि परंपरा और संस्कृति का अनूठा केंद्र है।

ढोलपुरा गाँव में सेवा फार्म की स्थापना

देशव्यापी भ्रमण से लौटकर वर्ष 2020 में उन्होंने अपने गृह जनपद फिरोजाबाद के ढोलपुरा गाँव में एक हेक्टेयर भूमि लीज ली और उस पर लगभग 22 लाख की लागत से कृषि वानिकी एवं प्राकृतिक जीवन शैली का एक मॉडल विकसित करने की कार्ययोजना बनाई।

भूमि सुधार और गोवंश आधारित प्राकृतिक कृषि

जो भूमि लीज पर ली थी वह बंजर और कंकरीली थी। दो साल तक सतत उपचार के बाद यह भूमि पूरी तरह से जीवाश्मयुक्त हो गयी। भूमि को उर्वर बनाने का पूरा श्रेय लक्ष्मी स्वरूपा गोमाता को जाता है, जिनके गोबर और गौमूत्र के उपचार ने मिट्टी को नवजीवन दिया।

सेवा फार्म और प्रशिक्षण केंद्र

आज उनका यह कृषि वानिकी एवं प्राकृतिक जीवन शैली का मॉडल ‘’सेवा फार्म्स’’ के नाम से पूरे जिले में विख्यात है। निशान्त यहाँ किसानों को प्राकृतिक कृषि, कृषि वानिकी, प्राकृतिक जीवन शैली एवं स्वदेशी गायों के महत्व एवं उपयोगिता पर प्रशिक्षण देते हैं। साथ ही प्राकृतिक कृषि से जुड़े किसानों को उचित बाजार उपलब्ध कराते हैं।

देशी बीज बैंक और स्वदेशी कृषि का संवर्धन

निशान्त का कहना है कि पारंपरिक प्राकृतिक कृषि के लिए सबसे पहली आवश्यकता देशी बीजों की होती है। इसलिए उन्होंने अपने केंद्र पर स्वदेशी बीजों के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु समृद्ध बीज बैंक बनाया है।

सेवा फार्म की आर्थिक सफलता

22 लाख की पूंजी से इस सेवा फार्म की शुरुआत करने वाले निशान्त तीन वर्षों में मूल पूंजी निकालकर प्रति माह एक से सवा लाख की आय अर्जित कर रहे हैं। खर्चे निकाल कर उनकी मासिक बचत 70-75 हजार की है।

युवाओं के लिए संदेश

निशान्त का देश के युवाओं से कहना है कि प्राकृतिक खेती घाटे का नहीं, बल्कि मुनाफे का सौदा है; बशर्ते मेहनत करने का जज्बा हो। प्राकृतिक खेती धरती और मिट्टी से प्रेम करना सिखाती है और श्रम से सींचे गये रसायन मुक्त खेत की सोंधी माटी की सुगंध दिल-दिमाग को सुकून और ताजगी देती है।

भविष्य की पीढ़ियों और पुरातन कृषि का प्रसार

निशान्त की इच्छा है कि देश के युवा आगे आयें और इस तरह के प्राकृतिक कृषि केंद्र भारत के प्रत्येक राज्य के हर जिले एवं तहसील में बनाएं, ताकि भावी पीढ़ी अपनी पुरातन कृषि संस्कृति के बारे में अधिक से अधिक जान सके।

निशांत का कृषि वानिकी मॉडल

कृषि + वन; यह भारत की वैदिककालीन कृषि पद्धति का आधारभूत तरीका है। निशांत ने इसी तरीके को अपनाया है। उनका मानना है कि इस पारम्परिक प्राकृतिक प्रक्रिया के तहत कृषि एक निरंतर किया जाने वाला कार्य है और वर्ष में कम से कम 300 दिन खेत में काम करना होता है।

वैदिक कृषि पंचांग का पालन

इस कृषि में वे वैदिक कृषि पंचांग का अनुसरण करते हैं जो कि श्रावण मास से शुरू हो कर आषाढ़ माह तक चलता है। इस पद्धति में मिश्रित सफसली कृषि के माध्यम से हम इंच-इंच भूमि का उपयोग करते हैं। इसके अंतर्गत प्रत्येक माह कुछ न कुछ बोने और काटने की प्रक्रिया चलती रहती है। खेत 15 दिन से अधिक कभी खाली नहीं रहते।

वृक्ष और किसानों की पूँजी

निशांत की मानें तो कृषि यदि किसान की नियमित आय का जरिया है तो वृक्ष कृषक की पूँजी या सम्पत्ति। इसीलिए उन्होंने अपने सेवा फार्म परिसर में लगभग एक हजार पेड़ लगाये हैं। इनमें चार सौ केले के पेड़ बाउंड्री पर लगे हैं।

फलदार और औषधीय पेड़

इसके अलावा आम, चीकू, संतरा, मौसमी, पपीता, अमरूद, शहतूत, शरीफा, अनार, नींबू, बेल और कीनू आदि फलदार पेड़ों के अलावा पाकड़, सागौन, सिरिस, कैथ, अर्जुन, नीम, बकाइन, बहेड़ा, इमली, शीशम, बालमखीरा आदि औषधीय पेड़ भी लगाये हैं।

फूलदार पौधे और अन्य वनस्पतियाँ

इसके अलावा उनके फार्म पर गुड़हल, कचनार, कनेर, गुलाब, गेंदा, चमेली आदि के पौधे भी लगाये गये हैं।

स्वदेशी बीजों का संरक्षण और संवर्धन

निशांत कहते हैं कि भारत की परम्परागत प्राकृतिक कृषि की प्रथम आवश्यकता है-स्वदेशी बीज। परंतु उन्नत हाइब्रिड बीजों ने देशी बीजों को लगभग विलुप्त होने की कगार पर ला दिया है। अतः देशी बीजों का संरक्षण एवं संवर्धन हमारी प्राथमिकता है।

संरक्षित और संवर्धित बीज प्रजातियाँ

इसके लिए उन्होंने लगभग 55 प्रजाति के बीजों का संरक्षण एवं संवर्धन किया है। इनमें अनाज (गेहूँ, जौ, जई, मक्का, बाजरा, ज्वार आदि), दालें (अरहर, मूँग, मसूर, उरद, चना, राजमा, आदि), तिलहन (तिल, मूँगफली, सूरजमुखी, अलसी आदि), सब्ज़ी (लौकी, तोरई, कद्दू, करेला, बैगन, टमाटर, प्याज़, ग्वार आदि), मसाले (हल्दी, मिर्च, धनिया, जीरा, सोया, मेथी आदि) के स्वदेशी बीज शामिल हैं।

Topics: Indian AgricultureVedic FarmingOrganic farmingNatural FarmingNishant JainPrakritik KrishiGo-based AgricultureDesi SeedsSeva Farms
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