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शांति बिल 2025 क्या है?

SHANTI Bill 2025 लोकसभा में पेश: निजी सेक्टर को न्यूक्लियर पावर प्लांट बनाने की अनुमति, 1962 एक्ट repeals, 100 GW लक्ष्य। सुरक्षा और FDI प्रावधानों की पूरी जानकारी।

Published by
कुलदीप सिंह

केंद्र सरकार लोकसभा में एक नया बिल लेकर आई है। जिसका पूरा नाम है सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया बिल-2025। शांति बिल कहा जा रहा है। ये भारत के न्यूक्लियर एनर्जी सेक्टर में अब तक का सबसे बड़ा बदलाव लाने वाला बिल माना जा रहा है, क्योंकि 1962 के बाद पहली बार इतने बड़े सुधार हो रहे हैं। 16 दिसंबर 2025 को केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने इसे लोकसभा में पेश किया। सरकार का कहना है कि ये बिल न्यूक्लियर एनर्जी को सुरक्षित और तेजी से बढ़ाने में मदद करेगा।

बिल का मुख्य मकसद

इस बिल का सबसे बड़ा उद्देश्य न्यूक्लियर एनर्जी को बिजली बनाने के साथ-साथ हेल्थकेयर, कृषि, पानी साफ करने, इंडस्ट्री और पर्यावरण जैसे क्षेत्रों में इस्तेमाल बढ़ाना है। सरकार चाहती है कि न्यूक्लियर एनर्जी एक साफ और स्थिर ऊर्जा स्रोत बने, जिससे फॉसिल फ्यूल पर निर्भरता कम हो और क्लाइमेट चेंज से लड़ने में मदद मिले। खास तौर पर 2047 तक 100 गीगावाट न्यूक्लियर पावर कैपेसिटी बनाने का टारगेट है, जिसमें छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMR) पर जोर होगा। ये विकसित भारत 2047 और 2070 तक नेट-जीरो एमिशन के लक्ष्य से जुड़ा है।

निजी सेक्टर की एंट्री

अब तक न्यूक्लियर पावर प्लांट सिर्फ सरकारी कंपनियां जैसे NPCIL चलाती थीं। शांति बिल से प्राइवेट कंपनियां, भारतीय और जॉइंट वेंचर्स, न्यूक्लियर प्लांट बनाने, चलाने, ऑपरेट करने और बंद करने में हिस्सा ले सकेंगी। हालांकि, कुछ संवेदनशील काम जैसे यूरेनियम माइनिंग, फ्यूल एनरिचमेंट, स्पेंट फ्यूल रीप्रोसेसिंग और हेवी वाटर प्रोडक्शन सिर्फ सरकार के पास रहेंगे। विदेशी कंपनियां अगर भारतीय कंट्रोल वाली हों तो हिस्सा ले सकती हैं, लेकिन पूरी तरह विदेशी कंट्रोल वाली नहीं। कुछ रिपोर्ट्स में 49% FDI की बात भी आई है। इससे निवेश बढ़ेगा और टेक्नोलॉजी आएगी।

पुराने कानूनों में बदलाव

ये बिल 1962 का एटॉमिक एनर्जी एक्ट और 2010 का सिविल लायबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज एक्ट को पूरी तरह खत्म करके एक नया एकीकृत कानून ला रहा है। पुराने लायबिलिटी रूल्स में सप्लायर पर ज्यादा जिम्मेदारी थी, जो निवेश रोक रही थी। अब लायबिलिटी ज्यादा प्रैक्टिकल बनाई गई है – ऑपरेटर की लायबिलिटी 300 मिलियन SDR (करीब 3000 करोड़ रुपये) तक कैप की गई है। राइट ऑफ रिकोर्स सिर्फ लिखित कॉन्ट्रैक्ट में या जानबूझकर नुकसान पहुंचाने पर होगा। ज्यादा डैमेज होने पर सरकार अतिरिक्त मदद करेगी।

सुरक्षा और रेगुलेशन के प्रावधान

सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए एक स्वतंत्र न्यूक्लियर सेफ्टी रेगुलेटर बनाया जाएगा, जो अभी एटॉमिक एनर्जी रेगुलेटरी बोर्ड को कानूनी स्टेटस देगा। ये ग्लोबल स्टैंडर्ड्स पर काम करेगा। किसी न्यूक्लियर इंसिडेंट में डिस्प्यूट सॉल्व करने के लिए स्पेशल ट्रिब्यूनल बनेगा, जहां डैमेज क्लेम फाइल किए जा सकेंगे। रिसर्च और इनोवेशन में भी प्राइवेट लोग हिस्सा ले सकेंगे, लेकिन संवेदनशील कामों को छोड़कर।

बिल पेश होने पर क्या हुआ

बिल पेश होते ही कांग्रेस और कुछ अन्य विपक्षी पार्टियों ने विरोध किया। कांग्रेस ने कहा कि ये संविधान की भावना के खिलाफ है और सुरक्षा मानकों को कमजोर करेगा। लेकिन सरकार का कहना है कि ये सिर्फ गुण-दोष की चर्चा है, जो आगे बहस में सुलझ जाएगी।

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