दीप के निर्णय से महाभियोग तक : धर्मनिरपेक्षता के नाम पर किसकी स्वतंत्रता?
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दीप के निर्णय से महाभियोग तक : धर्मनिरपेक्षता के नाम पर किसकी स्वतंत्रता?

भारत में धर्म कोई संकीर्ण अवधारणा नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न अंग है। इसे संविधान ने नकारा नहीं, बल्कि संरक्षण दिया है। इसी पृष्ठभूमि में तमिलनाडु के तिरुप्परंकुंद्रम मंदिर दरगाह विवाद में आए उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद एक न्यायाधीश के विरुद्ध महाभियोग प्रस्ताव ने कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

Written byदीपक द्विवेदीदीपक द्विवेदी
Dec 15, 2025, 08:15 pm IST
inभारत

भारत में धर्म कोई संकीर्ण अवधारणा नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न अंग है। इसे संविधान ने नकारा नहीं, बल्कि संरक्षण दिया है। इसी पृष्ठभूमि में तमिलनाडु के तिरुप्परंकुंद्रम मंदिर दरगाह विवाद में आए उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद एक न्यायाधीश के विरुद्ध महाभियोग प्रस्ताव ने कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। प्रश्न केवल दीप जलाने का नहीं है, बल्कि यह समझने का है कि धर्मनिरपेक्षता का वास्तविक अर्थ क्या है? असहमति की संवैधानिक प्रक्रिया क्या होनी चाहिए? और क्या न्यायपालिका पर दबाव बनाना संविधान की रक्षा कहलाता है?

तिरुप्परंकुंद्रम पहाड़ी पर स्थित सुब्रमण्यम स्वामी (मुरुगन) मंदिर तमिल सभ्यता का अत्यंत प्राचीन धार्मिक केंद्र है। संगम कालीन साहित्य और लोक परंपराओं में इसका उल्लेख मिलता है। जहां कार्तिक माह के दौरान दीप (दीपथून) पारंपरिक रूप से जलाने की परंपरा रही है। इसी पहाड़ी पर बाद के काल में एक सूफी दरगाह का निर्माण हुआ। लंबे समय तक यह स्थल संघर्ष का नहीं, सहअस्तित्व का प्रतीक रहा। कुछ दशकों से स्थानीय सांप्रदायिक तनाव बढ़ा। जब यह मामला न्यायालय तक पहुंचा , तब मद्रास हाईकोर्ट के जज जी.आर. स्वामीनाथन ने दीप जलाने के पक्ष में आदेश दिया। उन्होंने कहा कि यह प्राचीन परंपरा है और किसी समुदाय की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाएगी। दीप जलाना न तो पूजा में बाधा डालता है, न किसी समुदाय के अधिकारों का हनन करता है और न ही सार्वजनिक व्यवस्था को अस्थिर करता है। यह आक्रामक धार्मिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि आंतरिक साधना, प्रतीकात्मक श्रद्धा और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का रूप है।

जज पर महाभियोग नोटिस क्यों?

विपक्षी सांसदों डीएमके , कांग्रेस, समाजवादी सहित लगभग 107–120 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को महाभियोग नोटिस सौंपा ताकि जस्टिस स्वामीनाथन को पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू हो सके। विपक्ष का पक्ष का जज हटाने के समर्थन में आरोप है कि फैसला धर्मनिरपेक्ष राज्य नीति के विपरीत है। महाभियोग प्रस्तावक मानते हैं कि यह भेदभावपूर्ण निर्णय है। इसी मुद्दे पर 56 पूर्व जजों ने समर्थन जताया और कहा कि महाभियोग न्यायपालिका पर राजनीतिक दबाव दिखाने जैसा है। इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता कमजोर हो सकती है। भारत का संविधान राज्य को किसी धर्म विशेष के पक्ष में नहीं होने का निर्देश देता है। क्या महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने वाले यह नहीं जानते कि महाभियोग क्या है? न्यायिक असहमति का मार्ग क्या है? इसके दीर्घकालिक परिणाम क्या होंगे? या फिर वही तुष्टीकरण की राजनीति है जो दशकों से परंपराओं को दबाने और समाज को बाँटने का कार्य करती आई है? यदि ऐसा है, तो यह केवल एक निर्णय का विरोध नहीं, बल्कि भारतीय सामाजिक संतुलन के विरुद्ध एक चेतावनी संकेत है

धार्मिक आचरण और समानता का प्रश्न

दरगाह पर नियमित रूप से नमाज़, अज़ान और कई अवसरों पर लाउडस्पीकर का प्रयोग होता रहा है। इन गतिविधियों को अब तक धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध नहीं माना गया। सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता, केवल उसे नियमित किया जा सकता है। तो प्रश्न स्वाभाविक है , जब एक समुदाय की धार्मिक अभिव्यक्ति स्वीकार्य है, तो दूसरे समुदाय की ऐतिहासिक परंपरा पर आपत्ति क्यों? यह प्रश्न किसी धर्म-विशेष के पक्ष में नहीं, बल्कि संवैधानिक समानता के पक्ष में है।

दीप प्रज्वलन: आस्था, आक्रामकता या प्रतीक?

दीप जलाना किसी अन्य पूजा को रोकता नहीं, किसी समुदाय के अधिकारों का हनन नहीं करता, और न ही सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित करता है। यह कोई आक्रामक धार्मिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक और शांत सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है। यदि दीप को धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध माना जाए, तो तार्किक रूप से अज़ान, गिरजाघर की घंटी, गुरुद्वारे के कीर्तन पर भी लागू होने चाहिए। लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं होता। यहीं से चयनात्मक धर्मनिरपेक्षता का प्रश्न उठता है।

पूर्व न्यायिक निर्णय: जब धार्मिक स्वतंत्रता को मान्यता मिली

भारतीय न्यायपालिका ने समय-समय पर धार्मिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाया है। ध्वनि प्रदूषण मामला (2005) सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा किसी को लाउडस्पीकर का मौलिक अधिकार नहीं है, लेकिन धार्मिक गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध भी नहीं लगाया जा सकता। इस निर्णय के बाद अज़ान पर पूर्ण रोक नहीं लगी, कीर्तन, भजन या अन्य धार्मिक गतिविधियां भी जारी रहीं। प्रश्न यह है कि जब ऐसे निर्णय आए, जिनसे किसी न किसी वर्ग की भावनाएँ प्रभावित हुईं, तो उस समय किसी न्यायाधीश पर महाभियोग क्यों नहीं लाया गया? असहमति का मार्ग अपील और विमर्श रहा, न कि न्यायाधीश को हटाने की कोशिश।

महाभियोग: संवैधानिक प्रक्रिया या राजनीतिक औज़ार?

भारतीय संविधान में महाभियोग (अनुच्छेद 124(4) और 124(5) के तहत, सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालय अनुच्छेद 217 ) एक अत्यंत दुर्लभ और अंतिम उपाय है, जिसका प्रयोग केवल गंभीर दुराचार या भ्रष्ट आचरण की स्थिति में किया जाना चाहिए। यहां न भ्रष्टाचार का आरोप है, न नैतिक पतन का। केवल एक न्यायिक निर्णय से असहमति है। संविधान असहमति का स्पष्ट मार्ग देता है। उच्चतम न्यायालय में अपील (अनुच्छेद 132 से 136 ) का प्रावधान है तो फिर प्रश्न उठता है, जब संवैधानिक उपाय उपलब्ध है, तो सीधे महाभियोग क्यों? न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर प्रश्न यदि प्रत्येक संवेदनशील निर्णय पर महाभियोग की तलवार लटकने लगे, तो यह न्यायपालिका को निर्भीक नहीं, बल्कि भयभीत बना देगा। इस प्रकार की पहल न्यायपालिका की स्वतंत्रता और शक्ति के पृथक्करण के सिद्धांत को कमजोर कर सकती है।

भारत का धार्मिक खंडों में संभावित विभाजन: एक खतरनाक रास्ता

यदि यह तर्क स्वीकार कर लिया जाए कि किसी क्षेत्र की धार्मिक पहचान के आधार पर अन्य परंपराओं को सीमित किया जा सकता है, तो भविष्य में यह मजहब के आधार पर क्षेत्र का विभाजन हो जाएगा। यह न संविधान की भावना है, न भारत की सभ्यता की। यहाँ मूल प्रश्न यह है क्या धर्मनिरपेक्षता का अर्थ बहुसंख्यक समाज की धार्मिक-सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को दबाना है? यदि बहुसंख्यक परंपराओं को संवेदनशील कहकर रोका जाए, और अन्य परंपराओं को सामान्य माना जाए, तो यह समानता नहीं, बल्कि असमान संरक्षण होगा—जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 25 की भावना के विपरीत है। जब संविधान की रक्षा का दावा करते हुए न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर प्रहार हो, और असहमति के संवैधानिक मार्गों को दरकिनार किया जाए, तो यह आशंका स्वाभाविक है कि कहीं

संविधान की मूल भावना का उल्लंघन तो नहीं हो रहा?

यह किसी एक धर्म, एक निर्णय या एक न्यायाधीश के पक्ष में नहीं, बल्कि संवैधानिक संतुलन और न्यायिक स्वतंत्रता के पक्ष में है। तथ्य स्पष्ट हैं न्यायपालिका पहले भी धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े निर्णय देती रही है, उन पर महाभियोग नहीं लाया गया, दीप प्रज्वलन किसी के अधिकारों का हनन नहीं करता, असहमति का संवैधानिक मार्ग अपील है, महाभियोग नहीं। यदि धर्मनिरपेक्षता का अर्थ बहुसंख्यक परंपराओं का दमन बना दिया गया और संविधान की रक्षा के नाम पर न्यायपालिका को डराया गया, तो संकट किसी एक मामले का नहीं, पूरे संवैधानिक ढाँचे का होगा। भारत की शक्ति संतुलन में है, सहअस्तित्व में है , और स्वतंत्र न्यायपालिका में है। भारत की आत्मा डर में नहीं, संवाद में बसती है। और संविधान की रक्षा तभी होगी, जब न्यायपालिका निडर रहे, राजनीति संयमित रहे और समाज विवेकशील बना रहे।

Topics: धार्मिक विभाजनसुप्रीम कोर्टन्यायपालिकाधर्मनिरपेक्षतापाञ्चजन्य विशेषन्यायिक स्वतंत्रतातिरुप्परंकुंद्रम विवाद का मूलतिरुप्परंकुंद्रम पहाड़ीसुब्रमण्यम स्वामी (मुरुगन)महाभियोग नोटिससंवैधानिक प्रक्रिया
दीपक द्विवेदी
दीपक द्विवेदी
सिविल सेवा विशेषज्ञ , इतिहास संकलन समिति, जनजाति कल्याण केंद्र। इतिहास , भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विभिन्न विमर्श पर वैचारिक लेखन और उद्बोधन। [Read more]
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