पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) ने घुसपैठ, अवैध प्रवास और जनसांख्यिक बदलाव की गंभीर वास्तविकताएं उजागर की हैं। महज दस्तावेज सत्यापन और बायोमेट्रिक जांच की घोषणा से ही उन इलाकों में हड़कंप मचा हुआ है, जहां बड़ी संख्या में रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठिये रह रहे हैं। लेकिन पकड़े जाने के डर से वे वापस बांग्लादेश भाग रहे हैं। सैकड़ों बस्तियां खाली होने लगी हैं। बड़ी संख्या में रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठिये सीमा पर लौटने के लिए कतार लगाए खड़े हैं। मुख्यमंत्री के आश्वासनों का भी उन पर कोई असर नहीं हो रहा है। यहां तक कि तृणमूल कांग्रेस ने मतदाता सूची में उनके नाम शामिल कराने के लिए फॉर्म भी वितरित किए हैं। घुसपैठियों में मची भगदड़ को देखते हुए सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा बढ़ा दी गई है। एसआईआर से प्रशासनिक और राजनीतिक तनाव भी बढ़ा है।
राज्यपाल ने लिया जायजा
घुसपैठियों की भगदड़ की खबरों के बीच राज्यपाल सीवी आनंद बोस ने उत्तर 24 परगना जिले के हाकिमपुर सीमा क्षेत्र का दौरा किया और स्थानीय प्रशासन, बीएसएफ, खुफिया एजेंसियों और अन्य अधिकारियों से विस्तृत जानकारी ली। इसके बाद वे मुर्शिदाबाद गए और सीमावर्ती इलाकों की जमीनी सच्चाई का जायजा लिया। महत्वपूर्ण बात यह है कि राज्यपाल ने सामान्य यात्री की तरह हजारद्वारी एक्सप्रेस ट्रेन से रानाघाट से मुर्शिदाबाद तक की यात्रा की। राजभवन के एक अधिकारी ने बताया कि राज्यपाल नदिया भी गए। उनका कहना है कि मुर्शिदाबाद राजनीतिक हलचल और संवेदनशील गतिविधियों का केन्द्र बन गया है, खासकर अप्रैल-मई 2025 में हुए दंगे के बाद कट्टरपंथ और आतंकवाद की बढ़ती आशंकाओं के मद्देनजर। मुर्शिदाबाद में अधिकारियों के साथ बैठक में कहा कि सीमा प्रबंधन को और मजबूत और चौकस बनाए रखने की आवश्यकता है। सीमा पर हो रहे बदलावों और बढ़ती हलचल पर लगातार नजर
रखनी जरूरी है, ताकि सुरक्षा तंत्र किसी भी स्थिति से निपटने के लिए तैयार रहे।
इधर, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एसआईआर मुद्दे पर लगातार केंद्र सरकार, भाजपा और चुनाव आयोग पर बेबुनियाद आरोप लगा रही हैं। भाजपा का कहना है कि एसआईआर से वे इतनी घबरा गई हैं कि पिछले दिनों उन्होंने उत्तर 24 परगना जिले के बनगांव में मतुआ समुदाय के गढ़ में आयोजित रैली में भाजपा और केंद्र सरकार को चेतावनी तक दे दी। उन्होंने कहा, ‘‘एसआईआर के नाम पर राज्य के लोगों डराया जा रहा है। पूरी कवायद राजनीतिक मकसद से की जा रही है। भाजपा मेरे खेल में मुझसे लड़ नहीं सकती, मुझे हरा नहीं सकती।’’ उन्होंने केंद्र और भाजपा को चेतावनी देते हुए कहा, ‘‘अगर बंगाल में भाजपा वालों ने मुझ पर हमला करने की कोशिश की, तो मैं पूरे भारत में उसकी नींव हिला दूंगी।’’ ममता ने मतुआ समुदाय की ओर इशारा करते हुए आरोप लगाया कि भाजपा नागरिकता दिलाने के नाम पर सीएए कार्ड खेल रही है और पैसे इकट्ठा कर रही है। उन्होंने चुनाव आयोग पर भी हमला बोला और उसे ‘भाजपा आयोग’ बताया। उन्होंने मतुआ शरणार्थियों को आश्वस्त करते हुए घुसपैठियों तक यह संदेश पहुंचाने की कोशिश की कि ‘‘जब तक मैं यहां हूं, आपका नाम मतदाता सूची बाहर नहीं निकालने दूंगी। अगर समस्या बांग्लादेशी घुसपैठियों की है, तो आप मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में एसआईआर क्यों कर रहे हैं?’’

मुस्लिम बहुल हुए सीमाई इलाके
ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री बनने के बाद पश्चिम बंगाल में तुष्टिकरण की राजनीति हावी है। तृणमूल के संरक्षण में देखते-देखते राज्य के सीमावर्ती इलाके मुस्लिम बहुल हो गए। यहां घुसपैठियों के गांव के गांव ही नहीं बसाए गए, बल्कि वोट बैंक खड़ा करने के लिए उन्हें हर तरह की राजकीय सुविधा भी दी गई। सीमावर्ती जिलों में जिस तरह से ‘मतदाताओं’ की संख्या बढ़ी है, उससे साफ है कि राज्य में बड़ी संख्या में घुसपैठ हुई है। लेकिन एसआईआर प्रक्रिया शुरू होने के बाद ममता बनर्जी चुनाव आयोग को खुली चुनौती देते हुए कह रही हैं कि वे किसी को भी घर छोड़कर जाने नहीं देंगी। लेकिन घुसपैठियों में मची भगदड़ को देखते हुए अब उनके माथे पर चिंता की लकीरें गहरी होती दिख रही हैं। उनकी चिंता इसलिए भी बढ़ी है, क्योंकि राज्य में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं और उनकी आंखों के सामने उनका ‘वोटर’ बोरिया-बिस्तर बांधकर वहीं भाग रहा है, जहां से आया था। राज्य के गांवों-कस्बों और सीमांत इलाकों में मची इस ‘भगदड़’ को तमाम प्रयासों के बावजूद भी वे रोक नहीं पा रही हैं। रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों वाली बस्तियों और गांवों में सन्नाटा पसरा हुआ है। घरों पर ताले लटके हुए हैं। हाकिमपुर सीमा पर बांग्लादेश जाने वालों की लंबी-लंबी कतारें हैं।
भारत-बांग्लादेश सीमा पर ऐसा दृश्य पहले कभी नहीं दिखा। सुबह लगभग 7.30 बजे हाकिमपुर सीमा की जीरो लाइन पर झोला और गठरी सिर पर लादे घुसपैठियों की भीड़ दिखी। 24 परगना के हाकिमपुर पोस्ट पर हल्की धुंध के बीच 400-500 प्लास्टिक के थैलों में सामान भरकर नंगे पांव कतार में खड़े घुसपैठिये, कंबल में लिपटे उनके छोटे बच्चे दिखे। सीमा सुरक्षा बल के जवानों ने रेलिंग के पास बैरिकेडिंग लगा रखी है। वे रह-रह कर कह रहे हैं-‘लाइन बनाओ, धक्का मत दो।’ सीमा पर घुसपैठियों की भीड़ देखकर स्थानीय लोग भी अपनी आंखों पर विश्वास नहीं कर पा रहे हैं। दो साल के बच्चे को गोद में लिए एक बांग्लादेशी महिला ने रोते हुए कहा, ‘‘घर-घर जांच होगी। लोग पकड़े जाएंगे। केस होगा, इसलिए हम वापस अपने देश जा रहे हैं।’’ बीएसएफ के एक अधिकारी ने बताया कि एसआईआर प्रक्रिया शुरू होने के बाद बीते एक पखवाड़े में पलायन तेज हुआ है। ऐसा दृश्य वर्षों बाद दिख रहा है।’’
घरों पर लटके ताले
बशीरहाट के टेंटीवा गांव, बोंगांव के गोसाईपुर, दत्तापुकुर, घोला और कोलकाता की गुलशन कॉलोनी तक जगह-जगह खाली घर और दरवाजों पर ताले लटके दिखे। पूछने पर एक स्थानीय निवासी ने बताया, ‘कुछ दिन पहले तक यहां कई लोग काम करते थे। आज सुबह उठा तो आधे घर बंद मिले। लगता है ये सब उसी तरफ (बांग्लादेश) के थे, जो एसआईआर के डर से वापस लौट गए।’ यही हाल बोंगांव का भी है। या तो वे भाग कर सीमापार चले गए हैं या कहीं और। एक शिक्षक कहते हैं, ‘जिन घरों में ताले लगे हैं, उसमें काफी समय से लोग रह रहे थे। पिछले दिनों अचानक रात के अंधरे में सामान बांध कर कहीं चले गए।’ गुलशन कॉलोनी स्थित राजारहाट श्रमिक बस्ती में हमेशा लोगों की भीड़ दिखती थी, लेकिन अब सड़कें सूनी हैं। स्थानीय ऑटो चालक ने बताया कि जब से घुसपैठियों ने एसआईआर का नाम सुना है, वे घबराए हुए हैं। उनके पास वैध दस्तावेज तो थे नहीं, इसलिए पकड़े जाने के डर से भाग रहे हैं।
दरअसल, राज्य में एसआईआर प्रक्रिया शुरू होने के बाद सबसे पहले सीमावर्ती गांवों से घुसपैठियों का पलायन शुरू हुआ। उत्तर 24 परगना से सबसे अधिक पलायन हुआ है। जिले के हाकिमपुर, बशीरहाट, दत्तापुकुर, बनगांव और टेंटीवा के अलावा दक्षिण 24 परगना के कैनिंग, बासंती और हरिंगहाटा से भी घुसपैठिए वापस बांग्लादेश जा रहे हैं। कोलकाता की गुलशन कॉलोनी, राजारहाट मजदूर लाइन और न्यूटाउन सेक्टर-1, नदिया और मुर्शिदाबाद के सीमावर्ती ब्लॉक करीमपुर, जलंगी और तेहट्टा में 10-15 वर्ष से रह रहे घुसपैठिये भाग खड़े हुए हैं।
सीमावर्ती गांव हाकिमपुर के एक बुजुर्ग निताई कहते हैं, ‘‘हम कई साल से परेशान थे। कौन कहां से आ रहा था, पता ही नहीं चलता था। लेकिन पिछले कुछ दिनों से अचानक वे रातोंरात सामान बांध कर भाग रहे हैं। कुछ तो बरसों से रह रहे थे। अब दूध का दूध और पानी का पानी होगा, जो वैध नागरिक हैं, वही बचेंगे। एसआईआर का इतना तो फायदा हुआ कि असली लोग पहचाने जाने लगे, नकली भाग रहे हैं।’’
बनगांव के स्थानीय दुकानदार कहते हैं, ‘‘एसआईआर शुरू होते ही हलचल तो शुरू हो गई थी, लेकिन जब से फॉर्म बंटने लगे हैं, घुसपैठियों में घबराहट ज्यादा दिख रही है।’’
घोला निवासी रूपक कहते हैं, ‘‘हमारे मोहल्ले की दो बस्तियां खाली हो गई हैं। पहले दिन-रात हलचल रहती थी, अब अजीब सन्नाटा है। हम तो समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर एसआईआर का विरोध क्यों हो रहा है। इतना तो साफ पता चल रहा है कि घुसपैठिए अब भाग रहे हैं।’’
पलायन का बढ़ता ग्राफ
एसआईआर प्रक्रिया शुरू होने के बाद 12-15 दिनों में लगभग 2,500 घुसपैठियों ने पलायन करने की कोशिश की। लगभग 500 घुसपैठिये हाकिमपुर की जीरो लाइन पर फंसे हुए थे। पुलिस और बीएसएफ ने दस्तावेजों की जांच के लिए 300 से अधिक घुसपैठियों को हिरासत में लिया है। खासतौर से पश्चिम बंगाल के शहरों की बस्तियां 20-30 प्रतिशत खाली हो गई हैं। बीएसएफ के वरिष्ठ अधिकारियों की मानें तो एसआईआर शुरू होते ही सीमा पर जांच 3 गुना बढ़ा दी गई है। बायोमेट्रिक सत्यापन, फर्जी दस्तावेजों की बरामदगी और दलालों की गतिविधियां लगभग ठप होने से घबराहट में ‘रिवर्स माइग्रेशन’ शुरू हो गया।
घुसपैठियों को डर है कि घर-घर दस्तावेजों की जांच होगी तो उनके पास जो आधार कार्ड और मतदाता पहचान पत्र है, उसका फर्जीवाड़ा पकड़ा जाएगा। घुसपैठियों के फर्जी दस्तावेज बनवाने वाले दलाल भी फरार हैं और उनके फोन भी बंद हैं।
‘तीन दिन में एक करोड़ से अधिक नाम जोड़े गए’
नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी ने गत 2 दिसंबर को दावा किया कि राज्य में मात्र तीन दिन (26, 27 और 28 नवंबर) में एक करोड़ 25 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची में दर्ज किए गए। इतने कम समय में इतनी बड़ी संख्या में प्रविष्टि संदेह उत्पन्न करती है। चुनाव आयोग को इसकी गहनता से जांच करनी चाहिए। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि कई जिलों में भू-राजस्व अधिकारियों को निर्वाचक निबंधक अधिकारी (ईआरओ) बना दिया गया है, जबकि नियमानुसार उपमंडलाधिकारी या उसके समकक्ष अधिकारी को ही यह दायित्व दिया जाना चाहिए। उनका कहना है कि एईआरओ और कुछ ईआरओ के साथ आईपैक के सदस्य भी एसआईआर प्रक्रिया में शामिल हैं। डेटा एंट्री में गड़बड़ी कर घुसपैठियों और मृत लोगों के नाम मतदाता सूची में जोड़े गए हैं। पूरे ‘खेल’ को सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया है, इसलिए इसकी गहन जांच जरूरी है।
राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज कुमार अग्रवाल ने बताया कि पश्चिम बंगाल में एसआईआर के तहत अब तक लगभग 5 करोड़ मतदाता फार्मों का संग्रह और डिजिटाईजेशन पूरा हो चुका है। इनमें से 10.33 लाख फॉर्म जमा नहीं हुए हैं जिनमें अधिकतर अनुपस्थित, फर्जी, मृत या स्थानांतरित मतदाता हैं। राज्य में कुल 7.64 करोड़ फॉर्म बांटे गए, जिनमें नहीं जमा होने वाले फॉर्म 1.35 प्रतिशत हैं।
उन्होंने कहा कि 4 नवंबर से शुरू हुए इस अभियान में 20 दिनों के भीतर 7 करोड़ से अधिक मतदाताओं तक पहुंचना आसान काम नहीं था। एसआईआर प्रक्रिया में 80,600 से अधिक बीएलओ, लगभग 8,000 सुपरवाइजर, 3,000 सहायक इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर और 294 इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर तैनात किए गए हैं।

70 प्रतिशत मतदाता बढ़े
राज्य में बांग्लादेश से लगते सीमावर्ती जिलों में मतदाताओं की संख्या में जबरदस्त वृद्धि देखी गई है। चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के आंकड़े बताते हैं कि 2002 से 2025 के दौरान इन जिलों में मतदाता सूची में असाधारण वृद्धि हुई है। एक रिपोर्ट के अनुसार, मतदाताओं की संख्या में भी 66 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। पहले जहां सीमावर्ती जिलों में 4.58 करोड़ मतदाता थे, अब वे बढ़कर 7.63 करोड़ हो गए हैं। जिन दस जिलों में मतदाताओं की संख्या बढ़ी है, उनमें से 9 जिले बांग्लादेश से सटे हुए हैं। चुनाव आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक इन जिलों में मतदाताओं की संख्या लगभग 70 प्रतिशत बढ़ी है। कुछ जिलों में तो यह वृद्धि 100 प्रतिशत से भी अधिक है। उदाहरण के लिए, उत्तर दिनाजपुर में आश्चर्यजनक रूप से मतदाताओं की संख्या 105.49 प्रतिशत पाई गई। मालदा में लगभग 94.58 प्रतिशत, मुर्शिदाबाद 87.65 प्रतिशत, दक्षिण 24 परगना 83.30 प्रतिशत, जलपाइगुड़ी 82.30 प्रतिशत, कूच बिहार 76.52 प्रतिशत, उत्तर 24 परगना 72.18 प्रतिशत, नदिया 71.46 प्रतिशत और दक्षिण दिनाजपुर में मतदाताओं की संख्या में 70.94 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। कहना न होगा, एस.आई.आर. प्रक्रिया ने देश के वास्तविक नागरिकों को सच में राहत दिलाई है। घुसपैठियों से बेहाल बंगाल अब बदलने की राह पर है।

















