बाघा जतिन : वो शेर जिसने अकेले ब्रिटिश साम्राज्य की नींद उड़ा दी
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बाघा जतिन : वो शेर जिसने अकेले ब्रिटिश साम्राज्य की नींद उड़ा दी

बाघा जतिन (जतींद्र नाथ मुखर्जी) का जन्म जैसोर जिले में 7 दिसम्बर सन् 1879 में हुआ था। पाँच वर्ष की अल्पायु में ही उनके पिता का देहावसान हो गया।

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा — edited by Mahak Singh
Dec 7, 2025, 12:59 pm IST
in भारत
Bagha Jatin

Bagha Jatin

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दुर्दम्य महारथी जतिन बाघा सदैव कहते थे कि,”आमरा मोरबो,जगत जागबे”-जब हम मरेंगे,तभी देश जागेगा।भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे विलक्षण महारथी श्रीयुत “बाघा जतिन” (जतीन्द्रनाथ मुखर्जी /यतींद्रनाथ मुखर्जी) थे,यह कहना अतिशयोक्ति न होगी। कहां से प्रारंभ करुं? क्योंकि इतिहास के पन्नों से तो पाश्चात्य इतिहासकारों, एक दल विशेष के समर्थक परजीवी इतिहासकारों, पथभ्रष्ट वामपंथी इतिहासकारों ने, महा महारथी के अवदान को लगभग गायब ही कर दिया है।

ब्रिटिश साम्राज्य को हिला देने वाले क्रांतिकारी: बाघा जतिन

जबकि सन् 1911 में बरतानिया सरकार ने प्रमुख रुप से बाघा जतिन और युगान्तर (जुगान्तर) पार्टी की क्रान्तिकारी गतिविधियों के कारण कलकत्ता से दिल्ली राजधानी स्थानांतरित करने का निर्णय लिया था। यद्यपि अन्य कारण भी थे, परन्तु वे गौण थे।बाघा जतिन की “हिन्दू- जर्मन योजना” सफल हो जाती तो देश सन् 1915 में ही स्वतंत्र हो गया होता। बाघा जतिन (जतींद्र नाथ मुखर्जी) का जन्म जैसोर जिले में 7 दिसम्बर सन् 1879 में हुआ था। पाँच वर्ष की अल्पायु में ही उनके पिता का देहावसान हो गया। माँ ने बड़ी कठिनाई से उनका लालन-पालन किया। 18 वर्ष की आयु में उन्होंने मैट्रिक पास कर ली और परिवार के जीविकोपार्जन हेतु स्टेनोग्राफी सीखकर कलकत्ता विश्वविद्यालय से जुड़ गए। वे बचपन से ही बड़े बलिष्ठ थे।

बाघा जतिन का अदम्य साहस

यह सत्यकथा है कि 27 वर्ष की आयु में एक बार जंगल से गुजरते हुए उनकी मुठभेड़ एक बाघ से हो गयी। उन्होंने बाघ को अपने हंसिये से मार गिराया था। इस घटना के बाद यतीन्द्रनाथ “बाघा जतीन” नाम से विख्यात हो गए थे। “भारतीय इतिहास में अंग्रेजों की हाथों और पैरों से जितनी धुनाई बाघा जतिन ने की है उतनी किसी ने नहीं की है।” जिन दिनों अंग्रेजों ने बंग-भंग की योजना बनायी। बंगालियों ने इसका विरोध खुल कर किया। यतींद्र नाथ मुखर्जी का युवा खून उबलने लगा। उन्होंने बरतानिया सरकार की नौकरी को लात मार कर, आन्दोलन की राह पकड़ी।

हावड़ा षडयंत्र केस

सन् 1910 में एक क्रांतिकारी संगठन में काम करते वक्त यतींद्र नाथ ‘हावड़ा षडयंत्र केस’ में गिरफ्तार कर लिए गए और उन्हें साल भर की जेल काटनी पड़ी। वायसराय लॉर्ड मिंटो ने उस वक्त कहा था, “A spirit hitherto unknown to India has come into existence , a spirit of anarchy and lawlessness which seeks to subvert not only British rule but the Governments of Indian chiefs.” (भारत में अब एक ऐसी भावना आ गई है जो पहले कभी नहीं थी, अराजकता और अव्यवस्था की भावना जो न केवल ब्रिटिश शासन को बल्कि भारतीय शासकों की सरकारों को भी उखाड़ फेंकना चाहती है) इसी स्प्रिट को बाद में इतिहासकारों ने ‘जतिन स्प्रिट’ का नाम दिया।

वैश्विक सहयोग से ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती

जेल मुक्त होने पर वह ‘अनुशीलन समिति’ के सक्रिय सदस्य बन गए और ‘युगान्तर’ का कार्य संभालने लगे। उन्होंने अपने एक लेख में उन्हीं दिनों लिखा था-‘ पूंजीवाद समाप्त कर श्रेणीहीन समाज की स्थापना क्रांतिकारियों का लक्ष्य है। देशी -विदेशी शोषण से मुक्त कराना और आत्मनिर्णय द्वारा जीवन यापन का अवसर देना हमारी मांग है।’ हिन्दू-जर्मन योजना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक विस्मृत अध्याय है, जिसे स्वाधीनता के अमृत काल में पाठ्यक्रमों में सम्मिलित होना अपेक्षित है। जिसे बरतानिया सरकार ने हिंदू -जर्मन षड्यंत्र कहा है।यह प्रथम विश्वयुद्ध दौरान 1914 से 1918 के बीच ब्रिटिश राज के विरुद्ध एक अखिल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम आरम्भ करने के लिये बनाई योजनाओं और प्रयत्नों के लिये अंग्रेज सरकार द्वारा दिया गया नाम है।

इस महान् प्रयत्न में भारतीय राष्ट्वादी संगठन तथा भारत, अमेरिका और जर्मनी के सदस्य सम्मिलित थे। आयरलैण्ड के रिपब्लिकन तथा जर्मन विदेश विभाग ने इसमें भारतीयो का सहयोग किया था। अमेरिका स्थित गदर पार्टी, जर्मनी स्थित बर्लिन कमिटी, भारत स्थित गुप्त क्रांतिकारी संगठन और सान फ़्रांसिस्को स्थित दूतावास के द्वारा जर्मन विदेश विभाग ने साथ मिलकर इसकी योजना बनायी थी। सबसे महत्वपूर्ण योजना पंजाब से लेकर सिंगापुर तक सम्पूर्ण भारत में ब्रिटिश भारतीय सेना के अन्दर असंतोष फैलाकर स्वतंत्रता संग्राम लड़ने की थी। यह योजना फरवरी 1915 मे क्रियान्वित करके, हिन्दुस्तान से ब्रिटिश साम्राज्य को ध्वस्त करने के उद्देश्य लेकर बनाई गयी थी।

प्रथम विश्व युद्ध जिसके लिए गांधीजी अंग्रेजी सेना के लिए भर्ती अभियान चला रहे थे, उनको भर्ती करने वाला सार्जेन्ट भी कहा गया था। उस विश्व युद्ध को क्रांतिकारियों ने अपने लिए सुनहरा मौका माना। वीरेन्द्र चट्टोपाध्याय के नेतृत्व में ज्यूरिख में बर्लिन कमेटी बनाई गई, तो लाला हरदयाल, सोहन सिंह भाखना ने अमेरिका और कनाडा के सिख क्रांतिकारियों को लेकर गदर पार्टी शुरू की और भारत में इसकी कमान युगांतर पार्टी के नेता बाघा जतिन के हवाले थी। अब तैयार हुआ हिन्दू -जर्मन प्लॉट, जर्मनी से हथियार आना था, और पैसा चुकाने के लिए जतिन के साथियों ने धन हस्तगत करने के लिए कई अनुष्ठान किये,
जिन्हें प्रकारांतर से पूर्ववर्ती इतिहासकारों ने पूर्वाग्रह से डकैती कहा है।

बाघा जतिन का अद्वितीय बलिदान

दुलरिया नामक स्थान पर धन हस्तगत करने हेतु भीषण आक्रमण के दौरान अपने ही दल के एक सहयोगी की गोली से क्रांतिकारी अमृत सरकार घायल हो गए। विकट समस्या यह खड़ी हो गयी कि धन लेकर भागें या साथी के प्राणों की रक्षा करें! अमृत सरकार ने जतींद्र नाथ से कहा कि धन लेकर भागो। जतींद्र नाथ इसके लिए तैयार न हुए तो अमृत सरकार ने आदेश दिया- ‘मेरा सिर काट कर ले जाओ ताकि अंग्रेज पहचान न सकें।’ इन अनुष्ठानों में ‘गार्डन रीच’ का अनुष्ठान बड़ा मशहूर माना जाता है । इसके नेता जतींद्र नाथ मुखर्जी थे। विश्व युद्ध प्रारंभ हो चुका था।

कलकत्ता में उन दिनों राडा कम्पनी बंदूक-कारतूस का व्यापार करती थी। इस कम्पनी की एक गाड़ी रास्ते से गायब कर दी गयी थी जिसमें क्रांतिकारियों को 52 माऊजर पिस्तौलें और 50 हजार गोलियाँ प्राप्त हुई थीं। दुर्भाग्य से ब्रिटिश गुप्तचर सेवा ने गदर आंदोलन में सेंध मारी करके हिंदू- जर्मन गठजोड़ का पता लगा लिया और गिरफ्तारियां शुरू हो गयीं वहीँ भारत में ब्रिटिश सरकार हो ज्ञात हो चुका था कि ‘बलिया घाट’ तथा ‘गार्डन रीच’ के धन हस्तगत करने हेतु अनुष्ठानों में जतींद्र नाथ का हाथ था। 9 सितंबर 1915 को पुलिस ने जतींद्र नाथ का गुप्त अड्डा ‘काली पोक्ष’ (कप्तिपोद) ढूंढ़ निकाला। जतींद्र बाबू साथियों के साथ वह जगह छोड़ने ही वाले थे,कि राज महन्ती नामक अफसर ने गाँव के लोगों की मदद से उन्हें पकड़ने की प्रयास किया। बढ़ती भीड़ को तितर – बितर करने के लिए जतींद्र नाथ ने गोली चला दी। राज महन्ती वहीं ढेर हो गया। यह समाचार बालासोर के जिला मजिस्ट्रेट किल्वी तक पहुंचा दिया गया। किल्वी दल बल सहित वहाँ आ पहुंचा। यतीश नामक एक क्रांतिकारी बीमार था। जतींद्र उसे अकेला छोड़कर जाने को तैयार नहीं थे। चित्तप्रिय नामक क्रांतिकारी उनके साथ थे। दोनों तरफ़ से गोलियाँ चली। चित्तप्रिय का बलिदान हो गया।

वीरेन्द्र तथा मनोरंजन नामक अन्य क्रांतिकारी मोर्चा संभाले हुए थे। इसी बीच यतींद्र नाथ का शरीर गोलियों से छलनी हो चुका था। वे जमीन पर गिर कर ‘पानी-पानी’ चिल्ला रहे थे। मनोरंजन उन्हें उठा कर नदी की और ले जाने लगे। तभी अंग्रेज अफसर किल्वी ने गोलीबारी बंद करने का आदेश दे दिया। गिरफ्तारी देते वक्त जतींद्र नाथ ने किल्वी से कहा- ‘गोली मैं और चित्तप्रिय ही चला रहे थे। बाकी के तीनों साथी बिल्कुल निर्दोष हैं। 10 सितंबर 1915 में भारत के स्वाधीनता संग्राम के इस महान् सेनानी ने अस्पताल में सदा के लिए आँखें बंद कर लीं,और हिंदू- जर्मन योजना का भी पटाक्षेप हो गया, परंतु इससे भी दुखद यह रहा कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास लेखन में हिंदू- जर्मन योजना का उल्लेख तक ना हुआ।

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डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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