विश्व की अधिकांश प्राचीन सभ्यताओं और संस्कृतियों में जीवन के विभिन्न पहलुओं में अनेक समानताएँ पाई जाती हैं। इसी प्रकार भारत और नेटिव अमेरिकन समुदायों के बीच भी दर्शन, आस्था-प्रणाली, विश्व-दृष्टि तथा कुछ हद तक इतिहास में उल्लेखनीय समानताएँ देखी जाती हैं। दोनों ही क्षेत्रों और उनके निवासियों ने उपनिवेशवाद की क्रूरता को झेला है, जिसका प्रभाव नेटिव अमेरिकन लेखकों के साहित्य में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
इसी विषय को बहुत ही प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है डॉ. ओशीन शर्मा और उनके मार्गदर्शक डॉ. एन. राजगोपाल ने अपनी पुस्तकों में। नई दिल्ली में आज आयोजित पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में प्रो. डॉ. यशवंत पाठक ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय और नेटिव अमेरिकन संस्कृति के बीच यह समानता दर्शाती है कि उपनिवेशवाद ने किस प्रकार दोनों को पीड़ा पहुँचाई।
कार्यक्रम में दो पुस्तकों का विमोचन किया गया- पहली पुस्तक प्रो. एन. आर. गोपाल द्वारा लिखित “Sacred Storied Landscapes”, जो नेटिव अमेरिकन लोककथाओं में पर्यावरणीय ज्ञान और सांस्कृतिक धैर्य (resilience) को उजागर करती है, जो पश्चिमी उपभोक्तावादी प्रवृत्तियों के बिलकुल विपरीत है। दूसरी पुस्तक डॉ. ओशीन शर्मा द्वारा लिखित “Acculturation of Amerindians”, जिसमें उन्होंने 19वीं सदी के नेटिव इंडियन लेखकों का मूल्यांकन करते हुए यह बताया है कि यूरोपियाई प्रमुख संस्कृति ने किस तरह अमेरिका की मूल पहचान को मिटाने, विकृत करने, कमजोर करने और गलत ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास किया।
दक्षिण फ्लोरिडा विश्वविद्यालय में फ़ार्मेसी के प्रोफेसर डॉ. पाठक स्वदेशी परंपराओं के भी प्रख्यात विशेषज्ञ हैं। वे 100 से अधिक देशों की यात्राएँ कर चुके हैं और अपने पेशेवर कार्यों के साथ-साथ उन्होंने वहाँ के मूल निवासियों और उनकी परंपराओं पर भी गहन कार्य किया है। इस अवसर पर उन्होंने नेटिव अमेरिकन और अन्य मूल समुदायों की “खोई हुई पीढ़ी” पर प्रकाश डाला, जिन्हें यूरोपीय आक्रमणकारियों द्वारा अमानवीय अत्याचारों का सामना करना पड़ा — और यही दर्द इन पुस्तकों में भी परिलक्षित होता है।
आज 6 दिसंबर 2025 को केशव कुंज, झंडेवाला में इंटरनेशनल सेंटर ऑफ कल्चरल स्टडीज (ICCS), इंडिया द्वारा आयोजित कार्यक्रम में इन दो पुस्तकों का विधिवत विमोचन किया गया।











