पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया ने घुसपैठियों में हड़कंप मचा दिया है। हजारों लोग वर्षों से फर्जी दस्तावेज़ों के सहारे भारत में रह रहे थे, अचानक बांग्लादेश और म्यांमार की ओर भागते दिख रहे हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि SIR तो केवल वोटर लिस्ट की समीक्षा है, नाम कटने से कोई व्यक्ति देश से डिपोर्ट नहीं होता, तो फिर घुसपैठिये इतने बुरी तरह क्यों भाग रहे हैं? वास्तव में वे SIR से नहीं, बल्कि IAF–2025 (Immigration and Foreigners Act 2025) से डर रहे हैं।
एसआईआर एक कानूनी, वैध और लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। यह कोई राजनीतिक हथियार नहीं है। यह भारत के चुनाव आयोग द्वारा संचालित एक कानूनी मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया है। अनुच्छेद 324 , जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 के तहत मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण और इलेक्टोरल पंजीकरण नियम 1960 के तहत घर-घर सत्यापन किया जा सकता है। इसका उद्देश्य बस इतना है मृत व्यक्तियों के नाम, डुप्लिकेट नाम हटें, फर्जी दस्तावेज पकड़े जाएं अर्थात SIR केवल लोकतंत्र की शुचिता का अभियान है। SIR में पकड़ा गया अवैध व्यक्ति सीधे पहुंचता है IAF–2025 की गिरफ्त में।
IAF–2025 मार्च 2025 में संसद द्वारा पारित और सितंबर 2025 से लागू हुआ है। इसने पुराने चारों कानून (Foreigners Act, Passports Act, Registration Act आदि) को बदल दिया। इन कानून की कुछ प्रमुख धाराएं:बिना पासपोर्ट/वीज़ा भारत में प्रवेश करने पर 5 वर्ष का कठोर कारावास और ₹5 लाख दंड , भारत में फर्जी दस्तावेज़ बनवाने पर ₹10 लाख दंड , डिटेंशन एवं डिपोर्टेशन, राज्य सरकार किसी को नहीं बचा सकती क्योंकि नागरिकता केंद्र का विषय है, विदेशी कानून बनाना केंद्र का अधिकार एवं डिपोर्टेशन केंद्र का निर्णय होगा, यही कारण है कि SIR शुरू होने पर घुसपैठियों में भागो या पकड़े जाओ जैसी स्थिति बन गई है।
अंतरराष्ट्रीय अधिकारों के अनुरूप है भारत का कानून
IAF–2025 भारत के उन सभी अंतरराष्ट्रीय अधिकारों के अनुरूप है , जो किसी भी संप्रभु राष्ट्र को अपनी सीमाएं नियंत्रित करने का अधिकार देते हैं। संयुक्त राष्ट्र चार्टर हर देश को यह अधिकार देता है कि वह तय करे कि उसके क्षेत्र में कौन प्रवेश कर सकता है और किसे रोकना है। अंतरराष्ट्रीय नागरिक एवं राजनीतिक अधिकार–संधि 1966 (ICCPR) के अनुसार हर राष्ट्र को यह अधिकार है कि वह तय करे कि उसके क्षेत्र में कौन आएगा और कौन नहीं। भारत इस संधि का हस्ताक्षरकर्ता है, इसलिए IAF–2025 पूर्णतः इस अंतरराष्ट्रीय संधि के अनुरूप है। सार्वभौम मानवाधिकार घोषणा 1948 (UDHR) के अनुच्छेद 21 (3) में कहा गया है कि चुनाव नागरिकों का अधिकार है। इसलिए अवैध प्रवासियों द्वारा मतदान मानवाधिकार का उल्लंघन है। भारत ने शरणार्थी संधि (Refugee Convention) पर हस्ताक्षर नहीं किया है , इसीलिए भारत किसी भी अवैध प्रवासी को शरण देने के लिए बाध्य नहीं है। ऐसे व्यक्तियों को रोकना, पहचानना और वापस भेजना भारत का वैधानिक अधिकार है।

राज्य सरकारों का विदेशी मामलों में हस्तक्षेप नहीं
IAF–2025 भारत के सभी पुराने विदेशी–कानूनों को आधुनिक स्वरूप देकर उन्हें अधिक प्रभावी बनाता है। इससे पहले जिन भारतीय कानूनों में अवैध प्रवास अपराध था विदेशी अधिनियम 1946 (Foreigners Act 1946), पासपोर्ट अधिनियम 1920 (Passport Act 1920), विदेशियों का पंजीकरण अधिनियम 1939 (Foreigners Registration Act 1939), नागरिकता अधिनियम 1955 (Citizenship Act 1955) में पहले से स्पष्ट था कि अवैध प्रवेश अपराध है। बिना दस्तावेज सीमा पार करना अपराध है , फर्जी दस्तावेज बनाना अपराध है , विदेशी को देश से हटाया जा सकता है। IAF–2025 इन सभी प्रावधानों को कठोर , तेज़, आधुनिक और प्रभावी बना देता है। संविधान के अनुसार केंद्र सूची (Union List), प्रविष्टि 17 कहता है ,“नागरिकता, प्राकृतिककरण, विदेशी, निर्वासन केंद्र का विषय है , इसलिए राज्य सरकारें विदेशी मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं। वही राज्य सरकारें IAF–2025 को नहीं रोक सकती हैं क्योंकि यह पूर्णतः केंद्र का अधिकार–क्षेत्र है। राज्य पुलिस को भी केंद्र के विदेशी कानून लागू करने होते हैं ,वह मना नहीं कर सकती। संविधान के अनुच्छेद 256–257 केंद्र राज्य को निर्देश दे सकता है, और राज्य बाध्य है कि वह उन निर्देशों का पालन करे। यदि विदेशी घुसपैठ बढ़े तो केंद्र अनुच्छेद 355 लागू कर सकता है , यह केंद्र को राज्य में कानून–व्यवस्था पर सीधा नियंत्रण देता है। इसलिए कोई भी राज्य IAF–2025 को रोक ही नहीं सकता। राजनीतिक दल वोट बैंक राजनीति के कारण अवैध प्रवासियों को संरक्षण देते है, अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक विज्ञान में इसे कहते हैं ग्राहक–राजनीति (Clientelism)।
घुसपैठियों को संरक्षण देने वालों पर भी होगा एक्शन
अर्थात हम तुम्हें संरक्षण देंगे तुम हमें वोट दोगे। लेकिन IAF–2025 में घुसपैठियों को संरक्षण देने वाले नेताओं/व्यक्तियों पर भी सज़ा का प्रावधान है , IAF–2025 में विशेष धारा है अवैध विदेशी को सहायता देने पर रोक लगाती है। यदि कोई व्यक्ति अवैध प्रवासी को छिपाता है ,फर्जी दस्तावेज़ बनवाता है ,उसे नकली वोटर या आधार कार्ड दिलवाता है ,कानून से बचाने की कोशिश करता है तो उसे 5 वर्ष तक की जेल ,10 लाख रुपये तक दंड मिलेगा। यह प्रावधान पहली बार राजनीतिक संरक्षण को भी अपराध बनाता है। चुनाव आयोग भी किसी राजनैतिक दल जो अवैध मतदाताओं का उपयोग करता है, फर्जी वोटर जोड़ता है तो चुनाव आयोग उसकी मान्यता निलंबित कर सकता है।
जिम्मेदारी का प्रमाण पत्र होगी नागरिकता
SIR फर्जी मतदाता हटाना, नागरिक–गैर-नागरिक की पहचान करेगा और IAF–2025 गैर-नागरिकों पर जेल, दंड, डिटेंशन, डिपोर्ट करेगा यह संयोजन भारत में पहली बार नागरिकता आधारित लोकतंत्र को वास्तविक रूप दे रहा है और बंगाल जैसे राज्यों में इसकी शुरुआत सबसे पहले दिखाई दे रही है। भारत अब उस मोड़ पर खड़ा है, जहां नागरिक और घुसपैठियों के बीच की रेखा सिर्फ खिंच नहीं रही बल्कि लोहे की पटरी की तरह गाड़ दी जा रही है। SIR प्रक्रिया ने वह काम शुरू किया है जिसे राजनीति ने वर्षों दबाकर रखा था। मतदाता सूची की सफाई और IAF–2025 ने साफ संदेश दे दिया है कि फर्जी पहचान, अवैध प्रवेश और राजनीतिक संरक्षण तीनों का युग अब खत्म होगा, जो लोग वर्षों से भारत की कानून–व्यवस्था को अपनी जेब में समझकर चलते थे, वे अब पहली बार डरे हुए हैं क्योंकि यह लड़ाई वोट बैंक की नहीं, राष्ट्र की संप्रभुता की है। अब कोई राज्य सरकार, कोई दल, कोई नेता बीच में ढाल बनकर खड़ा नहीं हो सकता। केंद्र का कानून सीधे कहता है भारतीय नहीं हो? तो फिर भारत में रहने का अधिकार भी नहीं। र यह केवल वर्तमान की लड़ाई नहीं है। आने वाला भारत उस दिशा में बढ़ रहा है जहां नागरिकता जन्म–पत्र नहीं, जिम्मेदारी और वैधता का प्रमाण होगी। जहां लोकतंत्र की बागडोर उन्हीं के हाथ में होगी जो भारत के प्रति निष्ठावान हैं, न कि उन हाथों में जो भारत की सीमाएं तोड़कर आए हैं। SIR और IAF–2025 सिर्फ कानून नहीं, भारत के भविष्य की सुरक्षा–रेखा हैं जिसके भीतर भारत होगा, और बाहर वही होगा जिसे निकल जाना चाहिए।














