कन्वर्जन करने वाले को एस.सी., एस.टी. का लाभ नहीं, इलाहाबाद उच्च न्यायालय का स्पष्ट आदेश
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कन्वर्जन करने वाले को एस.सी., एस.टी. का लाभ नहीं, इलाहाबाद उच्च न्यायालय का स्पष्ट आदेश

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि हिंदू से ईसाई बनने के बाद भी अनुसूचित जाति (एस.सी.) के नाम पर लाभ लेना 'संविधान के साथ धोखा' है। न्यायालय ने यह भी कहा कि ईसाई बनने के बाद व्यक्ति अपनी मूल जाति का दर्जा खो देता है और वह अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति (एस.टी.) के नाते मिल रहे अधिकार नहीं ले सकता।

Written byअरुण कुमार सिंहअरुण कुमार सिंह
Dec 3, 2025, 02:26 pm IST
inभारत, उत्तर प्रदेश
इलाहाबाद उच्च न्यायालय

इलाहाबाद उच्च न्यायालय

गत 2 दिसंबर को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि ईसाई मत अपनाने के बाद भी अनुसूचित जाति के आरक्षण और सरकारी लाभ लेते रहने वाले लोगों के विरुद्ध कार्रवाई की जाए। न्यायालय ने यह आदेश जितेंद्र साहनी की याचिका पर सुनवाई करने के बाद दिया। जितेंद्र ने 2024 में यह याचिका दायर की थी। इसमें उसने 11 मार्च, 2024 के आरोपपत्र और 24 जुलाई, 2024 के संज्ञान/समन आदेश को रद्द करने की मांग की थी। यह आदेश अतिरिक्त मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी, महाराजगंज द्वारा दिया गया था। यह मामला भारतीय दंड संहिता (आई.पी.सी.) की धारा 153-ए (विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देना) और 295-ए (धार्मिक भावनाओं को भड़काने के इरादे से जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण कार्य) के अंतर्गत दर्ज केस क्राइम नंबर 320/2023 से संबंधित है। इस पर लंबी बहस चली। एक गवाह ने अदालत में बताया कि आवेदक, जो मूल रूप से केवट जाति का हिंदू था, अब ईसाई समुदाय का ‘पादरी’ बन गया है।
न्यायालय ने इस बात पर भी संज्ञान लिया कि जहां आवेदक ने अपने आवेदन के समर्थन में दायर शपथपत्र में स्वयं को ‘हिंदू’ बताया है, वहीं साक्ष्य इसके विपरीत संकेत देते हैं। गवाह लक्ष्मण विश्वकर्मा के बयान से संकेत मिलता है कि आवेदक ने ईसाई मत स्वीकार कर लिया है और वह एक पुजारी के रूप में कार्य कर रहा है।
न्यायमूर्ति गिरी ने संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के पैरा 3 का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया है— ”पैरा 2 में निहित किसी भी बात के होते हुए भी, कोई भी व्यक्ति जो हिंदू, सिख या बौद्ध मत से अलग पंथ को मानता है, उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा।”
न्यायालय के इस निर्णय के बाद देश में एक नई बहस छिड़ गई है। उल्लेखनीय है कि देश में बड़ी मात्रा में ईसाई मिशनरियां और तब्लीगी जमात के लोग जनजातियों का लोभ—लालच से कन्वर्जन करा रहे हैं। इसका असर जनजातियों की जनसंख्या और रोजगार पर भी पड़ रहा है। एक अनुमान के अनुसार कन्वर्ट हुए लोग ही जनजातियों को मिलने वाले आरक्षण का 80 प्रतिशत लाभ उठा रहे हैं।
बता दें कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16(4) तथा 335 में अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है। इसके अंतर्गत भारत की सभी जनजातियों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण मिलता है। इसके साथ ही उन्हें सरकार द्वारा चलाई जा रही है अनेक विकास योजनाओं में भी आरक्षण दिया जाता है। यही नहीं, जनजातियों के लिए लोकसभा और विधानसभाओं में सीटें आरक्षित हैं। इन सीटों से इसी वर्ग का कोई व्यक्ति चुनाव लड़ सकता है। लेकिन पिछले अनेक वर्ष से यह देखा जा रहा है कि इन सुविधाओं और आरक्षण का लाभ वे लोग उठा रहे हैं, जो लोभ—लालच से ईसाई या मुसलमान बन गए हैं। ये लोग समय और अवसर के हिसाब से अपने को कभी जनजाति बताते हैं, तो कभी ईसाई अथवा मुसलमान। ‘जनजाति सुरक्षा मंच’ के राष्ट्रीय सह संयोजक डॉ. राजकिशोर हांसदा कहते हैं, ”यह देखा जा रहा है कि जब ये लोग किसी शिक्षण संस्थान में पढ़ते हैं, तो अल्पसंख्यक के नाम पर मिलने वाली सुविधाएं लेते हैं। पढ़कर जब नौकरी के लिए आवेदन करते हैं, तो अपने को जनजाति बताते हैं। इस तरह ये लोग दोहरा लाभ ले रहे हैं। इससे उन जनजातियों का नुकसान हो रहा है, जो वास्तव में अभी भी अपनी प्राचीन परंपरा का पालन करते हैं यानी जो लोग सनातन संस्कृति के उपासक हैं।”
एक शोध के अनुसार आई.ए.एस., आई.पी.एस., आई.एफ.एस. और भारतीय वन्य सेवा में जितने भी ईसाई जा रहे हैं, उनमें से अधकितर वे लोग हैं, जो पहले जनजाति थे। इन लोगों ने जनजातियों के अधिकारों पर कब्जा कर रखा है। इसी शोध के अनुसार ऐसे लोग जनजातियों के लिए आरक्षित आई.ए.एस. के कोटे में से 61.54 प्रतिशत पर कब्जा कर लेते हैं और वास्तव में जो इनके हकदार हैं, उनके हिस्से में केवल 38.46 प्रतिशत भाग आता है। इसी तरह ये लोग आई.पी.एस. की 52 प्रतिशत सीटों पर कब्जा करते हैं और शेष 48 प्रतिशत पर जनजाति युवा चयनित होते हैं। आई.एफ.एस. में दोनों की भागीदारी 50—50 प्रतिशत है। भारतीय वन्य सेवा के 62.30 प्रतिशत पर मतांतरित लोग कब्जा करते हैं, जबकि शेष 37.70 प्रतिशत वास्तविक हकदारों को मौका मिलता है। अन्य सेवाओं में मतांतरित लोगों का प्रतिशत 79.43 है और वास्तविक लोगों का प्रतिशत 20.57 है।
जनजाति से ईसाई या मुसलमान बने लोग संविधान के अनुच्छेद 342 का लाभ उठाते हैं। इस अनुच्छेद में जनजातियों के लिए किसी मत या पंथ की चर्चा नहीं की गई है। कहा गया है कि ये लोग एक संस्कृति के उपासक हैं। यही संस्कृति शब्द कन्वर्ट हुए लोगों के लिए कवच बना हुआ है। वहीं दूसरी ओर अनुच्छेद 341 में कहा गया है कि यदि अनुसूचित जाति का कोई व्यक्ति ईसाई या मुसलमान बनता है, तो उसे अनुसूचित जाति के रूप में मिल रही सुविधाएं नहीं मिलेंगी। यानी संविधान निर्माताओं ने अनुसूचित जाति के लोगों के लिए स्पष्ट रूप से तय कर दिया है कि वे यदि ईसाई या मुसलमान बने तो उन्हें अनुसूचित जाति का लाभ नहीं मिलेगा। लेकिन अनुसूचित जनजातियों के लिए ऐसा कुछ नहीं लिखा गया है। इसलिए ‘जनजाति सुरक्षा मंच’ अनुच्छेद 342 में संशोधन की मांग कर रहा है। डॉ. राजकिशोर हांसदा कहते हैं, ”अनुसूचित जातियों के लिए जिस तरह का प्रावधान अनुच्छेद 341 में किया गया है, ठीक वैसा ही प्रावधान अनुच्छेद 342 में अनुसूचित जनजातियों के लिए किया जाना चाहिए। इसके लिए केंद्र सरकार को आवश्यक कदम उठाने चाहिएं।”
अनुच्छेद 342 में संशोधन की मांग कोई नई नहीं है। इस तरह की पहली मांग 1967 में लोहरदगा से कांग्रेस के तत्कालीन सांसद डॉ. कार्तिक उरांव ने की थी। वे इस बात से बहुत दु:खी रहते थे कि जनजातियों के अधिकारों पर ईसाई बन चुके लोग कब्जा कर रहे हैं। इसलिए उन्होंने उस समय सांसदों से संपर्क कर उन्हें इस मामले की जानकारी दी। उनकी इस बात से 235 सांसद सहमत हुए। इसके बाद इन सांसदों ने एक मांगपत्र पर हस्ताक्षर कर सरकार के पास भेजा। इसका असर यह हुआ कि इस मामले पर एक संयुक्त संसदीय समिति बनी। इसमें लोकसभा के 22 और राज्यसभा के 11 सदस्य शामिल थे। समिति ने 1970 में अपनी रपट देते हुए अनुशंसा की थी कि अनुच्छेद 342 में संशोधन किया जाए। इस अनुशंसा का विरोध केवल समिति के एक सदस्य इमोन सिंह संगमा ने किया था। वे मेघालय के ईसाई परिवार से थे। ऐसा कहा जाता है कि ईसाई संगठनों के कहने पर समिति की अनुशंसा पर संसद में जिस दिन चर्चा होती उससे दो दिन पहले नागालैंड और मेघालय के मुख्यमंत्रियों ने नई दिल्ली में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के आवास के बाहर धरना दिया। उन्होंने सरकार से कहा कि यदि इस समिति की अनुशंसा पर कार्रवाई हुई तो वे लोग नागालैंड और मेघालय को भारत से अलग करने का प्रयास करेंगे।
इसके बाद केंद्र सरकार ने इस पर कोई कार्रवाई करने से मना कर दिया। इससे डॉ. कार्तिक उरांव बहुत निराश हुए। इसके बावजूद उन्होंने अपना प्रयास नहीं छोड़ा। एक बार फिर से उन्होंने लोकसभा के 322 और राज्यसभा के 26 सांसदों से हस्ताक्षर करवाकर 17 जून, 1970 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को एक ज्ञापन सौंपा। इसके बाद उन्होंने इसे लोकसभा में भी उठाया। बहस में उन्होंने कहा कि यदि सरकार मूल जनजातियों को न्याय नहीं दे सकती है, तो उनकी जान ले ले। इसके बाद केंद्र सरकार ने कहा कि इस मामले पर कुछ निर्णय लेने से पहले गृह मंत्रालय, कल्याण मंत्रालय और विदेश मंत्रालय से सलाह ली जाएगी। उस समय डॉ. कार्तिक उरांव और कुछ अन्य नेताओं ने कहा था कि गृह मंत्रालय और कल्याण मंत्रालय से सलाह लेने की बात तो समझ में आती है, लेकिन विदेश मंत्रालय से सलाह लेने की बात समझ से परे है। आखिर विदेश मंत्रालय से सलाह लेने की क्या जरूरत थी! इसका उत्तर जनजाति सुरक्षा मंच, झारखंड प्रदेश के सह संयोजक सुलेमान शंकर मुर्मू से मिला। उन्होंने बताया, ”उन दिनों देश में अकाल पड़ा था। अमेरिका और इंग्लैंड से अनाज आता था और बहुत जगह चर्च के माध्यम से इनका वितरण किया जाता था। इसकी आड़ में चर्च बड़ी संख्या में जनजातियों और अन्य गरीबों को कन्वर्ट कर रहा था। ऐसे में यदि कुछ किया जाता तो ये लोग कन्वर्जन का काम नहीं कर पाते। इसलिए भारत के ईसाई संगठनों ने विदेशी ईसाई संगठनों के माध्यम से भारत सरकार पर दबाव बनाया और अनुच्छेद 342 में संशोधन नहीं होने दिया।”
इस तरह डॉ. कार्तिक उरांव के प्रयासों को विफल कर दिया गया। इससे डॉ. उरांव और अधिक निराश हुए। इस निराशा के अंधेरे में उन्होंने ‘बीस वर्ष काली रात’ शीर्षक से एक पुस्तक लिखी। इसमें उन्होंने बताया है कि कन्वर्ट हुए लोगों ने 1950 से 1970 तक में जनजाति समाज के अधिकारों पर किस तरह डाका डाला। आज भी यह पुस्तक चर्चा में रहती है और इस कारण यह मुद्दा भी जिंदा है।
डॉ. कार्तिक उरांव के अधूरे कार्य को पूरा करने के लिए ही 2006 में रायपुर में ‘जनजाति सुरक्षा मंच’ की स्थापना की गई है। इसके बाद से यह मंच लगातार इस मामले को लेकर संघर्ष कर रहा है। 2009 में ‘जनजाति सुरक्षा मंच’ के तत्कालीन संयोजक मोरेन सिंह पूर्ति के नेतृत्व में देशभर में हस्ताक्षर अभियान चलाया गया। कुछ ही दिनों में 28,00,000 लोगों ने हस्ताक्षर कर जिलाधिकारियों के माध्यम से इसे राष्ट्रपति तक पहुंचाया। इसके बाद 2010 में वनवासी कल्याण आश्रम के तत्कालीन अध्यक्ष जगदेवराम उरांव के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा सिंह पाटिल से भेंट की। फिर 2014 में मंच के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने दिल्ली में सभी राजनीतिक दलों के अध्यक्षों से भेंट कर निवेदन किया कि चुनाव में वे उन जनजातियों को टिकट न दें, जो ईसाई या मुसलमान बन गए हैं। इस निवेदन का कई दलों पर असर भी हुआ और उन्होंने ऐसे लोगों को टिकट नहीं दिया।
‘जनजाति सुरक्षा मंच’ के अभियान के साथ विश्व हिंदू परिषद भी है। उसने भी अनुच्छेद 342 में संशोधन की मांग की है। 2022 में गुजरात के जूनागढ़ में आयोजित विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय प्रन्यासी मंडल एवं प्रबंध समिति की संयुक्त बैठक में इस पर एक प्रस्ताव पारित किया गया था। इसमें कहा गया है, ”भारत में सनातन समाज के लोग हमेशा से अपनी सुविधा,आवश्यकता और परंपरा के अनुसार नगरों, ग्रामों, वनों, पहाड़ों में रहते रहे हैं। जनजातियों के संबंध में भारतीय संविधान में स्पष्ट है कि ईसाई अथवा मुस्लिम बनने के बाद अनुसूचित जातियों को दिए गए आरक्षण एवं अन्य लाभ वे प्राप्त नहीं कर सकेंगे। यह एक प्रकार का संवैधानिक संरक्षण है। दुर्भाग्य से यह संरक्षण जनजातियों को अभी तक प्राप्त नहीं हो सका है। इसके कारण मतांतरित ईसाई एवं मुस्लिम मूल अनुसूचित जनजाति और अल्पसंख्यक दोनों प्रावधानों का लाभ उठा रहे हैं।” विहिप का यह भी कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय ने केरल सरकार बनाम मोहनन के मामले में निर्णय देते हुए स्पष्ट कर दिया है कि यदि जनजाति समाज का कोई व्यक्ति अपने मूल धर्म को त्याग कर दूसरा पंथ अपना लेता है और अपनी रूढ़ीवादी परंपरा, रीति-रिवाज, पूजा—पद्धति एवं संस्कार को छोड़ देता है, तो वह जनजाति नहीं माना जाएगा। इसलिए केंद्र सरकार जल्दी इस पर निर्णय ले।
भाजपा नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुदर्शन भगत भी मानते हैं कि जोे लोग अपने मूल धर्म को छोड़कर और किसी मजहब की मान्यताओं को मान रहे हैं, वे दोहरा लाभ रहे हैं। जब उन्हें संस्थागत लाभ लेना होता है, तो वे अल्पसंख्यक बन जाते हैं और जब व्यक्तिगत लाभ लेना होता है, तो जनजाति हो जाते हैं। ऐसे लोग मूल जनजाति समाज के लोगों का अधिकार हड़प रहे हैं। इन्हें आरक्षण का लाभ बिल्कुल नहीं मिलना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसा करने से पूरे देश में कन्वर्जन की घटनाएं भी रुक जाएंगी।
इस मामले में जनजाति सुरक्षा मंच के राष्ट्रीय संरक्षक और लोकसभा के पूर्व उपाध्यक्ष कड़िया मुंडा की बात गौर करने वाली है। वे कहते हैं, ”जब संविधान सभी के लिए समानता की बात करता है, तो फिर कुछ लोगों को दोहरा लाभ और कुछ लोगों को एक लाभ क्यों मिले! सबको एक जैसी सुविधाएं मिलनी चाहिए।” उन्होंने यह भी कहा कि मिशनरी मतलब ईसाई। और ईसाई कोई शिक्षण संस्थान चलाने के लिए विदेश से भी चंदा लेते हैं और अल्पसंख्यक के नाम पर सरकार से भी मदद लेते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जब मजहब के नाम पर पैसा लेना होता है, तो ये लोग ईसाई बन जाते हैं और जब गरीब के नाम पर मदद की बारी आती है, तो जनजाति बन जाते हैं। इस दोहरे रवैए पर रोक लगनी चाहिए।
उम्मीद है कि देश के इन मूल जनजातियों की आवाज केंद्र सरकार तक पहुंचेगी और वह इस दिशा में उचित कदम उठाएगी।

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अरुण कुमार सिंह
अरुण कुमार सिंह
समाचार संपादक, पाञ्चजन्य | अरुण कुमार सिंह लगभग 25 वर्ष से पत्रकारिता में हैं। वर्तमान में साप्ताहिक पाञ्चजन्य के समाचार संपादक हैं। [Read more]
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