गत 24 नवंबर को रामजस कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में महान अहोम सेनापति लचित बड़फूकन की 403वीं जयंती पर एक कार्यक्रम आयोजित हुआ। इसे संबोधित करते राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रचार टोली के सदस्य श्री मुकुल कानिटकर ने कहा कि मुगलों को असम में प्रवेश नहीं करने देने वाले वीर लचित बड़फूकन सारे भारत के युवाओं के लिए आदर्श हैं।
उन्होंने बड़फूकन की वीरता के सम्मान के संदर्भ में बताया कि पुणे की नेशनल डिफेंस एकेडमी में छात्रों को जो स्वर्ण पदक दिया जाता है, उसका नाम लचित बड़फूकन पदक है। भारत की सेना के लिए लचित बड़फूकन आदर्श हैं। उनका जीवन कार्यकर्ता निर्माण का एक अनुपम उदाहरण है।
लचित बड़फूकन के नेतृत्व कौशल पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि लचित बड़फूकन ने निडरता और साहस से देश की परिस्थितियों का लाभ लेते हुए छापामार युद्ध कौशल से दुश्मनों को परास्त किया। उनसे हम नेतृत्व के गुण और समर्पण के साथ राष्ट्र सेवा की प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं। मुख्य अतिथि और पर्यटन मंत्रालय के पूर्व सचिव श्री मदन प्रसाद बेजबरुआ ने कहा कि उनका अमर कथन, ‘मेरे चाचा मेरे देश से बड़े नहीं हैं’, देशभक्ति का आदर्श वाक्य होना चाहिए।
विशिष्ट अतिथि और बीकानेरवाला फूड प्राइवेट लिमिटेड के सी.एम.डी. नवरत्न अग्रवाल ने कहा कि लचित बड़फूकन ने 1671 के ऐतिहासिक सराईघाट युद्ध में मुगल सेना के विस्तार को रोकते हुए अहोम साम्राज्य की रक्षा की। कार्यक्रम का आयोजन ‘युवा’ (यूथ यूनाइटेड फॉर विज़न एण्ड एक्शन) द्वारा किया गया था।
















