छत्तीसगढ़ में लगभग चार दशक के माओवादी आंदोलन में अब तक आंध्र-तेलंगाना के चेहरे ही बड़े नेता के रूप में सामने आते रहे थे, पर हिडमा ने अपनी हिंसक वारदातों से छत्तीसगढ़ में आतंक का चेहरा बना लिया। 21 मई, 2025 को माओवादी संगठन का महासचिव वसवा राजू के मारे जाने के बावजूद चर्चा हिडमा की ही हुई, क्योंकि वह तेलंगाना से बाहर का ऐसा पहला बड़ा चेहरा था जिसने संगठन से भी बड़ा कद पा लिया था। हिडमा माओवाद की उन आखिरी उम्मीदों में एक था, जिसके साथ ही इस आंदोलन का अध्याय लगभग समाप्त हो गया।
2024 में छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार बनने के बाद से माओवाद के खात्मे की मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखी। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा तय मार्च 2026 की समयसीमा से पहले ही माओवाद मुक्त छत्तीसगढ़ का लक्ष्य लगभग हासिल कर लिया। राज्य के गृह मंत्री विजय शर्मा के मिशन मोड प्रयासों से अबूझमाड़ जैसे माओवादियों के गढ़ पूरी तरह साफ हो गए। अब लड़ाई सीमावर्ती राज्यों की ओर बढ़ गई है। 18 नवंबर की सुबह आंध्र प्रदेश सीमा पर हुई मुठभेड़ में हिडमा अपनी पत्नी राजक्का और छह साथियों के साथ मारा गया। आंध्र प्रदेश की राजक्का संगठन में मोबाइल पॉलिटिकल स्कूल की प्रमुख के रूप में काम कर रही थी।
माओवाद पर मिली सफलता को समझने के लिए हिडमा के बारे में जानना आवश्यक है। सुकमा जिले के पुवर्ती (जगरगुंडा) गांव का 43 वर्षीय हिडमा ऐसे क्षेत्र से था, जो कभी विकसित नगर था, लेकिन माओवादियों के प्रभाव में मुख्यधारा से कटकर ‘माओवाद की उप-राजधानी’ बन गया। इसी माहौल में पला-बढ़ा हिडमा पांचवीं तक पढ़ा था। 1990 के दशक की शुरुआत में माओवादी आंदोलन उभर रहा था और इसी समय 1991 में मात्र नौ-दस वर्ष की उम्र में हिडमा बाल-संघम से जुड़ा। यहीं से उसकी यात्रा शुरू हुई, जो संगठन के शीर्ष स्तर ‘सेंट्रल कमेटी सदस्य’ तक पहुंची और अंततः उसकी मौत के साथ समाप्त हुई।
2000 के आसपास उसे हथियार बनाने वाली शाखा में भेजा गया, जहां उसने नई तकनीकें विकसित कीं। 2001-2002 में वह दक्षिण बस्तर जिला प्लाटून में शामिल हुआ और बाद में पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) का हिस्सा बना। 2004 में कोन्टा एरिया कमेटी सचिव, 2007 में कंपनी नंबर 3 का कमांडर बना। 2009 में हिडमा पीएलजीए बटालियन का उप कमांडर और बाद में बटालियन-1 का प्रमुख हुआ। 2011 से दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी में शामिल रहा और 2023-24 में शीर्ष सेंट्रल कमेटी में पद प्राप्त किया। उसे कई नामों से जाना जाता था और वह कई भाषाएं जानता था। हिडमा रणनीतिकार के रूप में मुठभेड़ों में सक्रिय रहता, बंदूक तभी चलाता था जब आवश्यक होता था। उसकी पदोन्नतियां उसकी संगठन क्षमता का प्रमाण थीं।
वसवा राजू के मारे जाने के बाद चर्चित खबरों में गणेश को पोलित ब्यूरो का सदस्य, देवजी को सेंट्रल कमेटी का प्रमुख, हिडमा को मिलिट्री कमीशन का प्रमुख, देवा को बटालियन कमांडर और दामोगर को दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी का इंजार्च बनाए जाने की चर्चा थी। हिडमा का सेंट्रल कमेटी में होना आदिवासी होने के कारण अपवाद था। उसकी नेतृत्व वाली वारदातों में मारे गए लोगों की संख्या पुलिस के आंकड़ों के अनुसार कम से कम 367 है, जबकि वह 500 से अधिक हत्याओं के लिए जिम्मेदार था, जिनमें सुरक्षाकर्मी और आम आदिवासी शामिल थे। हिडमा ने दंडकारण्य क्षेत्र में कम से कम 26 बड़े सशस्त्र हमलों का मास्टरमाइंड था, जिसमें 200 से अधिक सुरक्षाबलों की मौत हुई। उसकी सैन्य भूमिका और वारदातों ने उसे माओवादी संगठन में महत्वपूर्ण स्थान दिलाया था।
माओवाद से निर्धारित की गई सीमा के भीतर लड़ने में लगे रणनीतिकार यह जानते थे कि हिडमा को समाप्त करने का अर्थ है सशस्त्र गुरिल्ला नक्सलियों के मनोबल को पूरी तरह से तोड़ देना। इसी कारण लगभग उसकी तलाश के लिए 125 से अधिक गांवों की टेक्निकल मैपिंग की जा रही थी। सुरक्षा बल छत्तीसगढ़, ओडिशा और आंध्र प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्रों में थर्मल इमेजिंग तकनीक का उपयोग कर रहे थे, जिसमें एनटीआरओ (नेशनल टेक्निकल रिसर्च ऑर्गेनाईजेशन) का सहयोग लिया जा रहा था। अंततः उसे आंध्र-छत्तीसगढ़ की सीमा पर घेर लिया गया और मुठभेड़ में मार दिया गया। सुकमा जिला, जहां से हिडमा का संबंध था, वहां उसकी मौत पर पटाखे चलाए गए, जो यह दर्शाता है कि वह रावण हो, वीरप्पन हो या हिडमा, हर आततायी का भयावह अंत सुनिश्चित है। यह इतनी बड़ी सफलता है कि अब तक ‘हम लड़ेंगे साथी’ वाली दबी-घुटी आवाजें भी खामोश हो जाएंगी।
छत्तीसगढ़ में माओवाद से लड़ने की रणनीति में हर पांच किलोमीटर पर कैम्प बनाकर क्षेत्रीय नियंत्रण किया गया। अबूझमाड़ को नक्सलमुक्त करना माओवाद के लिए अंतिम झटका था, क्योंकि यह उनका मुख्य आधार था। 1967 में पश्चिम बंगाल से शुरू हुई नक्सलबाड़ी अराजकता के बाद लगभग छह दशक बीत गए। इस बीच, संघर्ष में कई क्षेत्रों में माओवादियों ने पनाहगाह बनाने की कोशिश की, जैसे झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, तेलांगाना-आंध्र, लेकिन सफल नहीं हुए। दंडकारण्य क्षेत्र को लिब्रेटेड जोन बनाने का उनका सपना भी पूरा नहीं हुआ। अबूझमाड़ ही उनका आखिरी सुरक्षित गढ़ था, जिसे खत्म करने का मतलब है उनके सशस्त्र संगठन को पूरी तरह ध्वस्त करना। वसवा राजू की मौत के बाद माओवादी बड़े पैमाने पर तेलंगाना-आंध्र की ओर भाग रहे हैं, जहां बड़ी लड़ाइयां उन्हें रोकने के लिए हो रही हैं।
हिडमा की मौत के बाद शहरी नक्सलियों ने दावा किया कि मारा गया व्यक्ति हिडमा नहीं है ताकि बाकी कैडर आत्मसमर्पण न करें। हालांकि, अगले दिन पचास से अधिक कैडर आंध्र-तेलंगाना में गिरफ्तार हुए और बड़ी संख्या में नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया। बस्तर में माओवादी संगठन ध्वस्त हो चुका है, अब कठपुतलियां तोड़ दी गई हैं, लेकिन सच यह है कि उन्हें नियंत्रित करने वाले ताकतवर संगठन अभी भी चिंता का विषय हैं।
प्रधानमंत्री का कड़ा संदेश
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 17 नवंबर, 2025 को रामनाथ गोयनका व्याख्यान में कहा कि देश सहित छत्तीसगढ़ से माओवादी-नक्सलवादी आतंक तेजी से खत्म हो रहा है। इसके पीछे केंद्र सरकार और छत्तीसगढ़ की साय सरकार की कड़ी प्रतिबद्धता है, जो समर्पण करने वाले नक्सलियों का स्वागत और पुनर्वास भी सुनिश्चित कर रही है। उन्होंने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि कांग्रेस ने माओवादी आतंक को वर्षों तक संरक्षण दिया, शहरों में अर्बन नक्सलियों को बढ़ावा दिया और देश के विकास में बाधा डाली। माओवाद का दायरा तेजी से सिमट रहा है, लेकिन कांग्रेस अब भी उसका समर्थन करती है।
उन्होंने कहा, ‘‘10-15 साल पहले कांग्रेस में जो अर्बन नक्सली, माओवादी पैर जमा चुके थे, वे अब कांग्रेस को मुस्लिम लीगी- माओवादी कांग्रेस (एमएमसी) बना चुके हैं।’’ उन्होंने आरोप लगाया कि यह पार्टी अपने स्वार्थ में देशहित को तिलांजलि दे चुकी है और वर्तमान समय में देश की एकता के लिए बड़ी खतरा बनती जा रही है। जिस अंदाज में प्रधानमंत्री ने यह बात कही, उससे स्पष्ट है कि नक्सलवाद-माओवाद का पूरा खात्मा मार्च 2026 तक सुनिश्चित है। साथ ही, नक्सलवाद और माओवाद को पालने-पोसने वालों और समर्थन देने वालों के लिए कड़ी चेतावनी भी है। छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री विजयशर्मा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हिडमा के गांव जाना और उसके अंतिम समय में उसके साथ विशेष शिष्टाचार दिखाना भी सरकार की प्रतिबद्धता को दिखाता है।

















