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व्हाइट टेरर मॉड्यूल और कैंपस के डी-रेडिकलाइजेशन की जरूरत

मेडिकल रेडिकल्स’ का उभरता खतरा और व्हाइट-कॉलर टेरर नेटवर्क का बढ़ना एक खतरनाक अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र है जिसे शुरूआत में ही खत्म कर देना चाहिए।

बिनय कुमार सिंहडैनियल जैकबWritten byबिनय कुमार सिंहandडैनियल जैकब — edited by Shivam Dixit
Nov 26, 2025, 06:22 pm IST
in भारत, विश्लेषण

‘मेडिकल रेडिकल्स’ का उभरता खतरा और व्हाइट-कॉलर टेरर नेटवर्क का बढ़ना एक खतरनाक अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र है जिसे शुरूआत में ही खत्म कर देना चाहिए….

गाजा के अल-शिफा अस्पताल और फरीदाबाद की अल-फलाह यूनिवर्सिटी की समानताएं

गाजा के अल-शिफा अस्पताल और फरीदाबाद की अल-फलाह यूनिवर्सिटी के बीच की समानताएं आतंकवादी संगठनों द्वारा विश्वसनीय नागरिक संस्थानों का आतंक गतिविधियों के लिए व्यवस्थित शोषण करने वाले चिंताजनक पैटर्न को उजागर करती हैं। नवंबर 2023 में, खुफिया सूत्रों ने पुष्टि की कि गाजा-आधारित इस्लामिक आतंकी संगठन हमास ने अल-शिफा अस्पताल गाजा की सबसे बड़ी चिकित्सीय सुविधा-को कमांड-ए-कंट्रोल नोड के रूप में इस्तेमाल किया, जहां भूमिगत सुरंगों में हथियार जमा किए गए और इसराइली बंधकों को रखा गया, जिससे अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत संरक्षित नागरिक स्थल को प्रभावी रूप से हथियारबंद कर दिया गया।

ठीक दो वर्ष बाद, यही ब्लूप्रिंट भारत में तब सामने आया जब 10 नवंबर 2025 को दिल्ली के लाल किला विस्फोट के लिए जिम्मेदार जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी तंत्र का मुख्य-केंद्र के रूप में फरीदाबाद की अल-फलाह यूनिवर्सिटी सामने आई। जांचकर्ताओं ने पाया कि 70 एकड़ में फैला यह परिसर, जिसकी स्थापना 1997 में हुई और 2014 में विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया, वह ‘रेडिकलाइज्ड प्रोफेशनल्स अर्थात ‘उग्रवादी पेशेवरों’ का ‘ग्राउंड जीरो’ बन गई थी, खासकर उन डॉक्टरों के लिए जो एमबीबीएस छात्रों को पढ़ाते हुए समानांतर रूप से 350-360 किलोग्राम विस्फोटक, असॉल्ट राइफलें और बम बनाने की सामग्री एकत्रित कर रहे थे।

शिक्षित पेशेवरों का महत्व

जैश-ए-मोहम्मद और आईएसआईएस/आईएसकेपी जैसे संगठनों के लिए इन ‘मेडिकल-रेडिकल्स’ का तीन स्तरों पर महत्व है। प्रथम, उनके पास सामाजिक छद्मावरण होता है। सफेद कोट में कोई डॉक्टर, विश्वविद्यालय का कोई प्रोफेसर या उच्च वेतन वाला आईटी इंजीनियर समाज में भरोसे और सम्मान के साथ विचरण करता है, जो उनकी दहशतपूर्ण गतिविधियों के लिए आदर्श आवरण का कार्य करता है। द्वितीय, वे तकनीकी तथा आत्मनिर्भर कौशल लेकर आते हैं, जैसे किसी डॉक्टर को रसायनों की समझ, इंजीनियर परिपथ-विज्ञान में कुशल या किसी आईटी पेशेवर की एन्क्रिप्टेड संचार और क्रिप्टोकरेंसी संचालित करने की क्षमता होती है। तृतीय, वे प्रायः स्व-वित्तपोषित होते हैं और अपनी आमदनी का उपयोग अभियानों को चलाने में सक्षम होते हैं, जिससे उनके सांगठनिक आकाओं पर वित्तीय बोझ कम हो जाता है।

व्हाइट-कॉलर आतंकवाद का प्रारंभिक मॉडल

यह रणनीति नई नहीं है, बल्कि अधिक विकसित और सुदृढ़ हो चुका मॉडल है। इसका प्रारंभिक रूप इंडियन मुजाहिदीन था, जो भारत में श्रृंखलाबद्ध विस्फोटों के लिए जिम्मेदार रहा। वहीँ से आईएम के नेतृत्व ने ‘व्हाइट-कॉलर आतंकवाद’ का ब्लूप्रिंट तैयार किया। इसके सह-संस्थापकों में सॉफ्टवेयर इंजीनियर और बम-निर्माण विशेषज्ञ अब्दुल सुब्हान कुरैशी, प्रोग्राम इंजीनियर सादिक इसरार शेख और यूनानी डॉक्टर डॉ. शाहनवाज शामिल था। ये लोग न अशिक्षित थे, न ही निराश्रित या दरिद्र, वे शिक्षित, शहरी, मध्यवर्गीय पेशेवर थे, जिन्हें भारत के विरुद्ध युद्ध छेड़ने के लिए पाकिस्तान स्थित हैंडलरों ने सुनियोजित ढंग से भर्ती करके तैनात किया था।

मेहदी मसूर बिस्वास का उदाहरण

2014 में मेहदी मसूर बिस्वास की गिरफ्तारी भारत के लिए सबसे गंभीर उदाहरण के रूप में सामने आती है कि शिक्षित पेशेवर अब जटिल डिजिटल अभियानों के माध्यम से वैश्विक जिहादी आंदोलनों के ‘फोर्स मल्टीप्लायर’ बनकर सामने आएं हैं। पश्चिम बंगाल का रहने वाला 24 वर्षीय बिस्वास पेशे से इलेक्ट्रिकल इंजीनियर था, जो बेंगलुरु में आईटीसी फूड्स में 5.3 लाख रुपये के वार्षिक पैकेज पर मैन्युफैक्चरिंग एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत था। वह @ShamiWitness के नाम से एक्स (ट्विटर) हैंडल संचालित करता था, यह दुनिया भर में ISIS के समर्थन में सबसे प्रभावशाली अकाउंट था, जिसके 17,700 से ज़्यादा फॉलोअर्स और हर महीने 2 मिलियन बार ट्वीट देखे जाते थे। बिस्वास अपनी कॉर्पोरेट की नौकरी जारी रखते हुए रात में ISIS/ISIL नियंत्रित इलाकों से आने वाली सूचनाएं इकठ्ठा करता था और वह ‘ISIS में शामिल होने की कोशिश कर रहे नए लड़कों को भड़काने और जानकारी देने के स्रोत’ के रूप में ‘अंग्रेजी बोलने वाले ISIS आतंकवादियों का खास करीबी’ हो गया था।

पाकिस्तान के उच्च शिक्षा संस्थानों में कट्टरता

यह समझने के लिए कि इन शिक्षित पेशेवरों को कैसे हथियार के रूप में प्रयोग किया जाता है, सबसे पहले उस वैचारिक इंजन का विश्लेषण करना होगा जो उन्हें तैयार करता है। हैरानी की बात है कि पाकिस्तान के विश्वविद्यालयों के भीतर कट्टरपंथ पर दो महत्वपूर्ण शोध-पत्र, जो पाकिस्तानी शोधकर्ताओं द्वारा लिखे गए हैं और दोनों पत्र बहुप्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जार्नल रूटलेज द्वारा प्रकाशित किया गया है जिनमें उनकी आतंकी तैयारी की प्रक्रिया के साक्ष्य मिलते हैं।

प्रथम शोध-पत्र: Drivers of violent extremism in higher education institutions of Pakistan (2020)

इसमें कहा गया है कि 9/11 के बाद मदरसों को कट्टरपंथ के एकमात्र स्रोत के रूप में देखना एक बड़ी गलती है। लेखक ने कहा है कि “पाकिस्तान में विश्विद्यालयों के बच्चों के साथ हिंसा की घटनाएं एक पुरानी बात है, लेकिन हिंसक झड़पों और विश्विद्यालयों के बच्चों के हिंसक कट्टरपंथ में शामिल होने की घटनाएँ बढ़ रही हैं।” कट्टरपंथ के नए केंद्र आधुनिक, सार्वजनिक विश्वविद्यालय हैं।

यह शोध पत्र इस्लामाबाद के दो सार्वजनिक विश्वविद्यालयों : कायदे-ए-आजम यूनिवर्सिटी (QAU) और इंटरनेशनल इस्लामिक यूनिवर्सिटी इस्लामाबाद (IIUI) का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें पाया गया है कि जहाँ QAU में राजनीतिक रूप से प्रेरित एथनिक ग्रुप्स का दबदबा है , वहीं IIUI मूलतः भिन्न है। IIUI में, छात्रों को ‘धार्मिक रूप से प्रेरित सामग्री, हिंसा और भर्ती’ के संपर्क में लाया जाता है।

सआद अजीज : कराची के एलीट इंस्टिट्यूट ऑफ़ बिज़नेस एडमिनिस्ट्रेशन (IBA) का ग्रेजुएट, जो अल-कायदा का स्लीपर सेल चलाता था और टारगेटेड किलिंग में शामिल था।

 नौरीन लेघारी : लियाकत यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल साइंस की एक मेडिकल छात्रा, जो इस्लामिक स्टेट (IS) से जुड़ी हुई थी और हमले की योजना  बनाने के आरोप में गिरफ्तार की गई।

तशफीन मलिक : दक्षिण पंजाब के एक सार्वजनिक क्षेत्र के विश्वविद्यालय से ग्रेजुएट, जिसने अपने पति के साथ मिलकर संयुक्त राज्य अमेरिका में 2015 का सैन बर्नार्डिनो हमला किया।

ऐसे उदाहरण दिखाते हैं कि यह लोग रूढ़िवादी मदरसों से नहीं बल्कि आधुनिक विश्वविद्यालयों के चमकदार क्लासरूम से आते हैं। इस बात ने काउंटर-टेररिज्म नीतियों के सम्मुख चुनौती पैदा की है, क्योंकि आधुनिक धर्मनिरपेक्ष यूनिवर्सिटी कैंपस जो पहले से सरकार की अधिक निगरानी में हैं उनकी गतिविधियों को नियंत्रित करना मदरसों की तुलना में अधिक कठिन हो गया है।

इस्लामी जमीयत-ए-तलाबा (IJT), कोई निष्क्रिय छात्र संगठन न होकर कट्टरपंथी राजनीतिक दल जमात-ए-इस्लामी का छात्र संगठन है। यही शोध-पत्र में लिखा गया है “IJT विश्विद्यालयों में एक खास कट्टरपंथी राजनीतिक विचारधारा को फैलाने की कोशिश करता है।” जो इस व्यवस्थित कट्टरपंथी विचारधारा को फैलाने की प्रक्रिया में मौलिक रूप से जिम्मेदार है। आईजेटी और उसकी मूल पार्टी का ‘अफगानिस्तान में जिहाद के लिए विश्वविद्यालय के छात्रों के उग्रीकरण और भर्ती’ में संलग्नता का पुराना इतिहास है। यह वातावरण एक शक्तिशाली तंत्रिका तंत्र के रूप में कार्य करता है। यह परिसर के भीतर विचारधारात्मक प्रशिक्षण, तकनीकी रूप से दक्ष और वैचारिक रूप से संवेदनशील व्यक्तियों का एक ‘नेटवर्क पूल’ तैयार करता है।

दूसरा शोध-पत्र : Emerging trends of on-campus radicalization in Pakistan (2021)

इस शोध-पत्र में इस्लामाबाद के छह प्रमुख सार्वजनिक विश्वविद्यालयों के 440 छात्रों के सर्वेक्षण के निष्कर्ष प्रस्तुत किए गए हैं। अध्ययन में पाया गया कि केवल शिक्षा कट्टरपंथ को नहीं रोकती, यह इस तथ्य से साबित होता है कि सिंध में सुरक्षा अधिकारियों द्वारा हिरासत में लिए गए लगभग 500 संदिग्धों में से 70 स्नातक डिग्रीधारी थे, और 64 स्नातकोत्तर डिग्रीधारी थे।

2025 दिल्ली ब्लास्ट और जैश-ए-मोहम्मद

दिल्ली को निशाना बनाने वाले 2025 जैश-ए-मोहम्मद (जेएम) मॉड्यूल ने एक आधुनिक ऑपरेशन का खुलासा किया जिसके अंतर्गत पारंपरिक कमांड के साथ आधुनिक भर्ती माडल को जोड़ा गया है। इस योजना का उद्देश्य 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद के विध्वंस की वर्षगांठ पर 26/11 जैसा बहु-लक्ष्यी हमला करना था, ताकि सांप्रदायिक तनाव को बढ़ावा दिया जा सके। इस मॉड्यूल की संरचना से पता चलता है कि ऑपरेटिव इरफान अहमद वागे जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर के साथ सीधे एन्क्रिप्टेड संपर्क में था, जिसे तुर्की में  बैठे अंतरराष्ट्रीय हैंडलरों द्वारा सहायता प्राप्त थी। समानान्तर रूप से, जेएम ने अपनी महिला ब्रिगेड की भर्ती के लिए एक डिजिटल पहल के तहत ‘तुफात अल-मुमिनात”‘ नाम का ऑनलाइन कोर्स शुरू किया जिसकी कक्षाओं को मसूद अजहर की बहन द्वारा संचालित किया जा रहा है।

ऐसी साजिशों में शिक्षित पेशेवरों की संलग्नता कोई नई घटना नहीं है, बल्कि भारत में स्थापित ऐतिहासिक मिसालों का अनुसरण करती है। व्हाइट-कॉलर आतंकवाद की पहली व्यवस्थित लहर इंडियन मुजाहिदीन (आईएम) से आई, जो सिमी की एक शाखा थी, जिसकी स्थापना 2003 में हुई और 2005-2007 के बीच उभरकर सामने आई। आईएम का नेतृत्व शिक्षित, शहरी, मध्यवर्गीय पेशेवरों से मिलकर बना था, जिन्होंने अपने तकनीकी कौशल को हथियार के रूप में रूपांतरित किया। प्रमुख व्यक्तियों में सॉफ्टवेयर इंजीनियर अब्दुल सुब्हान कुरैशी शामिल था, जो बम निर्माण विशेषज्ञ था, इंजीनियर सादिक इसरार शेख, जो सह-संस्थापक और भर्तीकर्ता और डॉ. शाहनवाज, जो एक यूनानी डॉक्टर था। जिसमें भटकल समेत आजमगढ़ के ‘समृद्ध परन्तु सामाजिक रूप से रूढ़िवादी’ परिवारों से भर्ती की गई। परन्तु 2008 के बाटला हाउस एनकाउंटर और 2013 में यासीन भटकल की गिरफ्तारी से इंडियन मुजाहिदीन की ऑपरेशनल कैपेसिटी पूरी तरह से टूट गई थी।

पेशेवरों की भर्ती की एक दूसरी, पद्धतिगत रूप से भिन्न लहर ISIS और इसकी क्षेत्रीय अनुषंगी, इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत (ISKP, जनवरी 2015 में औपचारिक रूप से स्थापित) द्वारा 2014 और 2019 के बीच शुरू की गई थी। JeM या IM के फिजिकल हैंडलर नेटवर्क के विपरीत, ISIS और ISKP ने टेलीग्राम और सिग्नल जैसे एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म और दाबिक (2014-2016 में प्रकाशित) जैसी प्रचार पत्रिकाओं के माध्यम से दूरस्थ, डिजिटल कट्टरवाद में उत्कृष्ट थे, ताकि इसकी अंतरराष्ट्रीय ‘खिलाफत’ परियोजना के लिए भर्तीकर्ताओं को आकर्षित किया जा सके।  यह तरीका केरल में सबसे सफल रहा, जो इस समय के दौरान भारत का मुख्य ISIS/ISKP भर्ती ग्राउंड था, जहाँ 100-120 लोग शामिल हुए या शामिल होने की कोशिश कर रहे थे। केरल मॉड्यूल को इंजीनियर अब्दुल राशिद और इंजीनियरिंग ग्रेजुएट शजीर मंगलासेरी जैसे पेशेवरों द्वारा नेतृत्व किए गया, जिन्होंने गुप्त चैट समूहों के माध्यम से अफगानिस्तान से संचालन को निर्देशित कर रहे थें। यह डिजिटल-फर्स्ट रिक्रूटमेंट मॉडल एक निरंतर खतरा बना हुआ है, जैसा कि 2025 में डॉ. अहमद मोहियुद्दीन सैयद (रिसिन आतंक षड्यंत्र का प्रमुख संदिग्ध, जिसे गुजरात ATS ने गिरफ्तार किया) के सोशल मीडिया के जरिये कट्टरवाद से पता चलता है।

10 नवंबर, 2025 के दिल्ली लाल किला विस्फोट के लिए जिम्मेदार व्हाइट टेरर मॉड्यूल, जिसमें 15 लोगों की मौत हो गई, इस अंतरराष्ट्रीय पाइपलाइन  के काम करने की सबसे  बड़ी केस स्टडी है। यह पाकिस्तान से वैचारिक आपूर्ति और भारत को तोड़ने की ऑपरेशनल मांग का एक दुखद मेल दर्शाती है।

जांच में फरीदाबाद की अल-फलाह यूनिवर्सिटी के ‘केंद्र’ से संचालित व्हाइट-कॉलर आतंक के पारिस्थितिकी तंत्र का पता लगता है। इस मॉड्यूल की ‘कमांड पोस्ट’ छात्रावास के बिल्डिंग 17 में कमरा नंबर 13 के रूप में चिन्हित की गई।

अल-फलाह यूनिवर्सिटी से जुड़े प्रमुख व्यक्ति

➢  आत्मघाती बमवर्षक : डॉ. मुहम्मद उमर (उमर उन नबी), अल-फलाह यूनिवर्सिटी के मेडिकल कॉलेज में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर कार्यरत थे, जो भर्ती और कट्टरपंथी गतिविधियों में भी शामिल थे।

➢  लॉजिस्टिक्स प्रमुख : 35 वर्षीय डॉ. मुजम्मिल अहमद गनई, अल-फलाह मेडिकल कॉलेज के इमरजेंसी विंग में एक जूनियर रेजिडेंट डॉक्टर थे, जिन्हें 30 अक्टूबर को गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने फरीदाबाद में उनके किराए के घर से 350-360 kg एक्सप्लोसिव, एक क्रिंकोव असॉल्ट राइफल, टाइमर, रिमोट कंट्रोल और बम बनाने का दूसरा सामान बरामद किया था।

➢  भर्तीकर्ता और वित्तपोषक : डॉ. शाहीन सईद, कानपुर के गणेश शंकर विद्यार्थी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर, जिन्हें आतंकवादी ग्रुप जैश-ए-मोहम्मद की महिला विंग, जमात-उल-मोमिनीन को स्थापित करने का काम सौंपा गया था।

➢  आंतरिक व्यक्ति : डॉ. निसार-उल-हसन, अल-फलाह यूनिवर्सिटी के चिकित्सा विभाग में प्रोफेसर हैं। संस्थागत विफलता या सांठगांठ का एक अद्भुत उदाहरण देखने को मिलता है जब डॉ. निसार को  21 नवंबर 2023 को जम्मू और कश्मीर के लेफ्टिनेंट गवर्नर द्वारा संविधान के अनुच्छेद 311(2)(c) के तहत अलगाववादी प्रचार को बढ़ावा देने और राज्य की सुरक्षा के लिए खतरा पेश करने के लिए बर्खास्त किए जाने के बावजूद अल-फलाह यूनिवर्सिटी द्वारा प्रोफेसर नियुक्त किया गया।

भारत में विश्वविद्यालयों की गतिविधियों पर निगरानी और डी-रेडिकलाइजेशन

इस पूरे प्रकरण का भारत के लिए तात्पर्य स्पष्ट है कि हमें आंतरिक सुरक्षा का एक नया और अधिक सजग तरीका अपनाना होगा। विश्वविद्यालय परिसरों में, अत्यंत आपात स्थिति को छोड़कर, पुलिस की उपस्थिति से कतराने की जो प्रचलित प्रवृत्ति है उसे अब छोड़ना होगा। विशेषकर तब, जब व्हाइट-कॉलर टेरर मॉड्यूल ने यह उजागर कर दिया है कि किस प्रकार पढ़े लिखे शिक्षित तत्व अकादमिक स्थलों का उपयोग कट्टरपंथ को बढ़ावा देने और लामबंदी के लिए करते हैं।

सरकार को सभी ‘उत्तेजक स्थलों’ की सक्रियता से पहचान और निगरानी करनी चाहिए। विश्वविद्यालयों को प्रभावी डी-रेडिकलाइजेशन कार्यक्रम अपनाने चाहिए, जो जोखिमग्रस्त छात्रों की समय रहते पहचान करें, उन्हें परामर्श और मार्गदर्शन प्रदान करें और संवाद के ऐसे मंच विकसित करें जो दुष्प्रचार और कट्टरपंथी आख्यानों का तार्किक प्रत्युत्तर दे सकें।

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