नई दिल्ली । कुरुक्षेत्र दौरे पर आए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ब्रह्म सरोवर में दर्शन और पूजा की और अंतरराष्ट्रीय गीता जयंती समारोह में भी भाग लिया। वहीं इस दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने महाभारत अनुभव केन्द्र परिसर में भगवान श्री कृष्ण जी के पवित्र शंख पाञ्चजन्य पर आधारित पाञ्चजन्य स्मारक का उद्घाटन किया। साथ ही, प्रधानमंत्री ने अनुभव केन्द्र का अवलोकन भी किया।
पाञ्चजन्य स्मारक न्याय और सत्य की विजय का प्रतीक: पीएम मोदी
इस दौरान पीएम मोदी ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य शंख पंचजन्य के सम्मान में कुरुक्षेत्र में बना पंचजन्य स्मारक न्याय और सत्य की विजय का प्रतीक है। यह आने वाली पीढ़ियों को सद्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता रहेगा।
प्रधानमंत्री ने ब्रह्म सरोवर में अर्घ्य देकर देश की समृद्धि की कामना की
इसके आलावा मंत्रोचारण के साथ प्रधानमंत्री मोदी ने अर्घ्य देते हुए पवित्र ब्रह्म सरोवर में सरोवर में नारियल चढ़ाकर देश की सुख व समृद्धि की कामना की। जिसके बाद प्रधानमंत्री मोदी ब्रह्म सरोवर पर सायंकालीन आरती में शामिल हुए।
2 करोड़ रुपये की लागत से बना ‘पाञ्चजन्य’ स्मारक
कुरूक्षेत्र में ज्योतिसर तीर्थ स्थित अत्याधुनिक महाभारत थीम अनुभव केंद्र के मुख्य द्वार पर स्थापित किया गया 32 फुट ऊंचा ‘पाञ्चजन्य’ स्मारक लगभग 2 करोड़ रुपये की लागत से बना है, जिसका वजन करीब 5300 किलोग्राम है और इसमें 21 फीट ऊंचा अष्टधातु का शंख मुख्य हिस्सा है। शंख के आधार को 11 फीट ऊंचा बनाया गया है, जिसके चारों ओर सुंदर लाइटिंग और पत्थर की विशेष सजावट की गई है। इन पत्थरों पर श्रीमद्भगवद्गीता के चुनिंदा श्लोक उकेरे गए हैं, जो आने वाले श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक संदेश देंगे।
‘पाञ्चजन्य’ का ऐतिहासिक व आध्यात्मिक महत्व
भगवान श्रीकृष्ण का ‘पाञ्चजन्य’ केवल एक पौराणिक वस्तु मात्र नहीं था बल्कि धर्म, साहस, ऊर्जा, संकल्प और दिव्य सत्ता का ऐसा अद्वितीय प्रतीक था, जिसने इतिहास के महानतम युद्ध ‘महाभारत’ के हर दिन अपनी गर्जना से पूरे कुरुक्षेत्र को कंपा दिया था। उसके शंखनाद में केवल ध्वनि नहीं थी बल्कि धर्म की घोषणा, अधर्म के विनाश का संकेत और सत्य की अविचलित विजय का संकल्प समाया था। प्रधानमंत्री ने कुरुक्षेत्र में ‘पाञ्चजन्य’ के सम्मान में निर्मित प्रतीकात्मक स्मारक का उद्घाटन किया तो मानो वह दिव्य स्मृति फिर एक बार जीवंत हो उठी, जिसमें कौरवों के दिल दहल जाते थे, योद्धाओं की देह में बिजली सी भर जाती थी और 18 दिनों तक सम्पूर्ण कुरुक्षेत्र पवित्र कंपन से थर्रा उठता था।

















