Guru Tegh Bahadur Shaheedi Diwas 2025: धर्म-रक्षा, राष्ट्रवाद और बलिदान के शाश्वत प्रतीक हैं गुरु तेग बहादुर 
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Guru Tegh Bahadur Shaheedi Diwas 2025: धर्म-रक्षा, राष्ट्रवाद और बलिदान के शाश्वत प्रतीक हैं गुरु तेग बहादुर 

गुरु तेग़ बहादुर केवल सिखों के गुरु नहीं थे; वे सम्पूर्ण भारत की आध्यात्मिक चेतना के प्रतिनिधि थे। 24 नवम्बर 1675 को दिल्ली के चांदनी चौक में उनका शीश कलम किया गया, परन्तु भारत का मस्तक ऊंचा हो गया।

Written byडॉ. जगमोहन सिंह राजूडॉ. जगमोहन सिंह राजू
Nov 21, 2025, 10:39 am IST
in मत अभिमत

Guru Tegh Bahadur Shaheedi Diwas 2025: सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारत की आत्मा पर गहरा संकट मंडरा रहा था। औरंगज़ेब के राज्यकाल में हिन्दुओं की धार्मिक स्वतंत्रताओं पर कठोर प्रहार शुरू हुए—मंदिरों का विध्वंस, जज़िया का थोपना, परंपरागत संस्कारों पर रोक, और कश्मीरी पंडितों पर धर्म परिवर्तन का निर्मम दबाव। ऐसे समय राष्ट्र को एक ऐसे महापुरुष की आवश्यकता थी जो अन्याय के सामने निर्भय खड़ा हो सके। वही भूमिका गुरु तेग बहादुर जी ने निभाई—यह दिखाते हुए कि भारत का राष्ट्रवाद भूमि या सत्ता से नहीं, बल्कि धर्म, संस्कृति और अंतरात्मा के आदर्शों से बनता है।

सम्पूर्ण भारत की आध्यात्मिक चेतना के प्रतिनिधि थे गुरु तेग बहादुर
गुरु तेग़ बहादुर केवल सिखों के गुरु नहीं थे; वे सम्पूर्ण भारत की आध्यात्मिक चेतना के प्रतिनिधि थे। कश्मीरी पंडित जब आनन्दपुर पहुंचे और अपनी पीड़ा सुनाई, तब गुरु जी ने किसी एक संप्रदाय के मुखी की तरह नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता के नैतिक प्रहरी की तरह उनकी पुकार सुनी। उन्होंने निश्चय किया कि यदि एक व्यक्ति का बलिदान लाखों की आस्था बचा सकता है, तो वह बलिदान वे स्वयं देंगे।

24 नवम्बर 1675 को दिल्ली के चाँदनी चौक में उनका शीश कलम किया गया, परन्तु भारत का मस्तक ऊंचा हो गया। इसी अद्वितीय बलिदान ने उन्हें “हिन्द-की-चादर”—भारत की आत्मा की ढाल—बना दिया।

गुरु तेग़ बहादुर का बलिदान भारतीय राष्ट्रवाद का सर्वोच्च स्वरूप था
गुरु जी का बलिदान केवल धार्मिक सहिष्णुता की रक्षा नहीं था; यह भारतीय राष्ट्रवाद का सर्वोच्च स्वरूप था—वह राष्ट्रवाद जो सत्ता-विरोधी नहीं, बल्कि अन्याय-विरोधी है; जो मानवता की रक्षा को ही राष्ट्र-धर्म मानता है। उनकी शहादत अहिंसक प्रतिरोध का भी अद्वितीय उदाहरण है।

वे तलवार के धनी थे, पर इस प्रसंग में उन्होंने शक्ति नहीं, सत्य को चुना। अत्याचार के सामने झुकने से इनकार किया, यातना स्वीकार की, पर अन्याय का आदेश नहीं माना। यह वही आत्म-बलिदानी प्रतिरोध था जिसे तीन शताब्दियों बाद महात्मा गांधी ने “सत्याग्रह” के रूप में अपनाया; अंतर केवल इतना है कि गुरु जी का सत्याग्रह आध्यात्मिक और नैतिक दोनों स्तरों पर एक साथ खड़ा था—सत्य के लिए प्राण देना, पर किसी के प्रति द्वेष न रखना।

शिष्यों ने भी सर्वोच्च निष्ठा से निभाई गुरु परंपरा
गुरु जी के शिष्यों ने भी गुरु परंपरा को सर्वोच्च निष्ठा से निभाया। भाई मती दास, भाई सती दास और भाई दयाला जी —तीनों ने अमानवीय यातनाएं सहकर भी धर्म नहीं छोड़ा। किसी को आरी से चीरा गया, किसी को अग्नि में जलाया गया, किसी को उबलते तेल में उतारा गया—पर उनकी नहीं डगमगाई।

गुरु जी की दर्दनाक हत्या के बाद भाई जैता (बाद में भाई जीवन सिंह) ने गुरु जी का पावन शीश आनन्दपुर पहुंचाया, और लख्खी शाह लुबाना ने अपने घर को अग्नि देकर उनका दाह-संस्कार किया। वे सब अलग जातियों से आए थे, परंतु गुरु के चरणों में सभी भेद मिट गए। यही सिख धर्म का सार है: सेवा, समर्पण और साहस—जाती से परे, मानवता के लिए।

राष्ट्र निर्माण की निरंतर धारा है सिख इतिहास
गुरु तेग़ बहादुर जी की शहादत ने भारत की धार्मिक और राजनीतिक चेतना को नया मार्ग दिखाया। यही प्रकाश आगे चलकर गुरु गोबिन्द सिंह जी के माध्यम से खालसा में प्रकट हुई । छोटे साहिबज़ादों की शहादत ने इस परंपरा को चिरस्थायी बना दिया— बाल्यावस्था में दीवारों में चिनवाये जाना स्वीकार कर उन्होंने धर्म नहीं छोड़ा। यह वह गौरव है जिस पर पूरा राष्ट्र गर्व करता है।

सिख इतिहास केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण की निरंतर धारा है | बाबा बन्दा सिंह बहादुर से लेकर महाराजा रणजीत सिंह तक, और फिर करतार सिंह सराभा, शहीद उधम सिंह और अनेक वीर— सभी ने धर्म-रक्षा और राष्ट्र-रक्षा को एक ही तपस्या माना। । आज भी भारतीय सेना में सिख सैनिकों का अनुशासन और पराक्रम इसी परंपरा की प्रतिध्वनि है। तीन सौ पचास वर्षों के बाद भी गुरु तेग़ बहादुर जी की ज्योति हमारे मार्ग को आलोकित करती है। उनका बलिदान हमें याद दिलाता है कि भारत का राष्ट्रवाद केवल शक्ति में नहीं—सत्य, धर्म, करुणा और त्याग में बसता है। यही संदेश आने वाली पीढ़ियों का पथ-प्रदर्शक रहेगा।

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डॉ. जगमोहन सिंह राजू
डॉ. जगमोहन सिंह राजू
Dr Jagmohan Singh Raju is an author and former IAS officer who has served in senior administrative roles. He holds a doctorate in public policy and has been a Fellow at the University of Cambridge, UK. He writes on governance, social issues and politics. [Read more]
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