वंदे मातरम्@150 स्मरणोत्सव : ‘मातृभूमि की प्रकृति-समृद्धि-शक्ति की आराधना है वंदे मातरम्’
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वंदे मातरम्@150 स्मरणोत्सव : ‘मातृभूमि की प्रकृति-समृद्धि-शक्ति की आराधना है वंदे मातरम्’

नई दिल्ली के इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूर्ण होने पर संपन्न हुआ भव्य कार्यक्रम-स्मरणोत्सव। वहां उपस्थित प्रत्येक जन में राष्ट्रीय भाव का अद्भुत संचार हुआ।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Nov 19, 2025, 10:17 pm IST
inभारत, विश्लेषण, दिल्ली
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी

नई दिल्ली के इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूर्ण होने पर संपन्न हुआ भव्य कार्यक्रम-स्मरणोत्सव। वहां उपस्थित प्रत्येक जन में राष्ट्रीय भाव का अद्भुत संचार हुआ। बंकिम बाबू के उपन्यास आनंदमठ से उपजा यह गीत कांग्रेस की तुष्टिकरण वाली राजनीति का शिकार हुआ, फिर भी स्वतंत्रता संग्राम में यह क्रांतिकारियों का राष्ट्र मंत्र बन गया। मातृभूमि की प्राकृतिक सुन्दरता, प्रचुरता, शक्ति और समृद्धि का जयगान करती इसकी पंक्तियां भावविभोर करती हैं

गत 7 नवंबर, 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली के इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूर्ण होने पर ‘स्मरणोत्सव’ का उद्घाटन किया। खचाखच भरे सभागार में हर ओर देशभक्ति का भाव जगाते तिरंगे ध्वज थे, प्रतीक चिह्न थे, ‘वंदे मातरम्’ के उद्घोष थे। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ केवल गीत नहीं, यह एक मंत्र, एक ऊर्जा, एक स्वप्न और एक पवित्र संकल्प है। यह मां भारती के प्रति भक्ति, आत्मबल और राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना का प्रतीक है। यह शब्द हमें हमारे गौरवशाली इतिहास से जोड़ता है, वर्तमान को आत्मविश्वास से भरता है और भविष्य के प्रति विश्वास पैदा करता है कि भारत के लिए कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं है।

उन्होंने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ का सामूहिक गायन केवल सांस्कृतिक अभिव्यक्ति नहीं, सामूहिक चेतना व आत्मिक का अनुभव है, जहां असंख्य स्वरों के बीच साझा लय और आत्मिक एकता की प्रतिध्वनि सुनाई देती है। यह अवसर देशवासियों के लिए नई प्रेरणा व नई ऊर्जा लेकर आया है। देश के स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उन्होंने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ का सार भारत की उस शाश्वत अवधारणा में निहित है जो मानव सभ्यता के आरंभ से विकसित होती रही है। भारत ने विश्व इतिहास के उत्थान-पतन को देखा है और उससे सीखा है। अपने अनुभवों से भारत ने शक्ति, नैतिकता और आध्यात्मिकता के संतुलन को साधते हुए एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान बनाई है। भारत ने अतीत की चुनौतियों के बावजूद स्वयं को पुनर्जीवित किया है, उसकी आत्मा सदैव अमर रही है।

सभ्यता की चेतना

स्वातंत्र्य समर को याद करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत की आत्मा किसी राजनीतिक सीमाओं में नहीं, बल्कि हजारों वर्षों पुरानी सभ्यता की चेतना में बसती है और ‘वंदे मातरम्’ उसका काव्यात्मक रूप है। औपनिवेशिक काल में यह गीत स्वतंत्रता का उद्घोष बना, जिसने करोड़ों भारतीयों को प्रेरित किया। उन्होंने रवींद्रनाथ ठाकुर के शब्दों को याद करते हुए कहा कि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की रचना ‘आनंदमठ’ केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत का स्वप्न थी। ‘वंदे मातरम्’ में मातृभूमि की प्रकृति, समृद्धि और शक्ति की आराधना है, जो इसे कालातीत बनाती है। जब बंकिमचंद्र ने यह गीत लिखा, तब देश औपनिवेशिक शोषण से त्रस्त था। इसके बावजूद उन्होंने समृद्ध भारत के दृष्टिकोण का आह्वान किया और ‘वंदे मातरम्’ के माध्यम से राष्ट्र को जाग्रत किया। यह गीत न केवल स्वतंत्रता का प्रतीक बना, बल्कि भारत की आत्मनिर्भरता, समृद्धि और गर्व का उद्घो ष बना। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि जब अंग्रेज भारत को पिछड़ा और हीन बताने की कोशिश कर रहे थे, तब ‘वंदे मातरम्’ की पहली पंक्ति ही उस झूठे प्रचार को ध्वस्त कर देती थी।
प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि 1896 में रवींद्रनाथ ठाकुर ने कांग्रेस अधिवेशन में ‘वंदे मातरम्’ गाया था और 1905 में यह बंगाल विभाजन विरोध का प्रतीक बना। अनेक क्रांतिकारियों ने इसे गाते हुए बलिदान दिया। वीर सावरकर विदेश में इसे अभिवादन के रूप में प्रयोग करते थे। गांधीजी ने इसे अविभाजित भारत की छवि बताया, जबकि श्री अरबिंदो ने इसे आत्मशक्ति का मंत्र कहा।

वीरों को नमन

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ और ‘भारत माता की जय’ जैसे उद्घोष भारतवासियों के हृदय में सदियों से बसे हैं। यह गीत उन वीरों को श्रद्धांजलि है, जिन्होंने इसके साथ अपने प्राण न्योछावर किए। आज 140 करोड़ भारतीय इस गीत के माध्यम से सभी वीरों को नमन कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि भारत में भूमि को ‘मां’ मानने की परंपरा वैदिक काल से है, जिसने ‘वंदे मातरम्’ को आध्यात्मिक शक्ति दी। जो लोग राष्ट्र को केवल राजनीतिक दृष्टि से देखते हैं, वे भारत की मातृभूमि-संकल्पना को नहीं समझ सकते। भारत में ‘मां’ पालन-पोषण करने वाली और संकट में रक्षा करने वाली शक्ति की प्रतीक है। यही भावना वंदे मातरम् की पंक्तियों में झलकती है, जहां मां भारती को सरस्वती, लक्ष्मी और दुर्गा के रूप में पूजा गया है।

स्मरणोत्सव में विशेष डाक टिकट जारी करते हुए प्रधानमंत्री मोदी, साथ में हैं (बाएं से) रेखा गुप्ता, गजेन्द्र सिंह शेखावत और वी.के. सक्सेना

प्रधानमंत्री ने कहा कि यह गीत स्वतंत्रता के साथ उसकी रक्षा की प्रेरणा भी देता है। हमारा राष्ट्रीय दृष्टिकोण ज्ञान, विज्ञान और प्रौद्योगिकी में अग्रणी राष्ट्र बनने का है। आज भारत विज्ञान, अंतरिक्ष और अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में सबसे आगे आने की दिशा में बढ़ रहा है। यह वही भारत है जो मानवीय करुणा का प्रतीक होने के साथ-साथ, दुर्गा की तरह आतंक का विनाश करना भी जानता है। उन्होंने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ एकता का प्रतीक है, विभाजन का नहीं। 1937 में इसके अंश अलग करने से विभाजन की मानसिकता जन्मी, जिसे युवा पीढ़ी को समझना चाहिए।

21वीं सदी भारत की

प्रधानमंत्री ने कहा कि 21वीं सदी भारत की सदी बन सकती है और इसे साकार करने की शक्ति भारत के युवाओं में है। भारत माता के 140 करोड़ बच्चों में प्रत्येक हाथ राष्ट्रनिर्माण की क्षमता रखता है। जब देश ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ जैसे अभियानों के साथ आगे बढ़ रहा है, तब हर नई उपलब्धि में ‘वंदे मातरम्’ का मंत्र गूंजता है। जब भारत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचने वाला पहला देश बना, जब बेटियां विज्ञान, प्रौद्योगिकी और खेलों में शिखर पर पहुंचीं, जब सैनिक आतंकवाद और नक्सलवाद को पराजित करते हैं, तब हर भारतीय के हृदय से स्वाभाविक रूप से ‘वंदे मातरम्’ प्रस्फुटित होता है। मां भारती के प्रति श्रद्धा की यह भावना हमें विकसित भारत के लक्ष्य की ओर ले जाएगी। यह अमर मंत्र इस अमृत काल में हर भारतीय को प्रेरित करता रहेगा। समारोह के अंत में उन्होंने सभी देशवासियों को इस ऐतिहासिक अवसर पर शुभकामनाएं दीं।

केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि यह गीत केवल एक राष्ट्रीय गीत नहीं, बल्कि भारत माता के प्रति देशवासियों के समर्पण और उत्साह का परिचायक है। उन्होंने सभी से अपील की कि ‘वंदे मातरम्’ की भावना को अपने हृदय में जीवित रखें और हर क्षेत्र में राष्ट्रप्रेम के साथ कार्य करें। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ देश के हर नागरिक के मन में राष्ट्रप्रेम का दीप जलाने वाला एक प्रतीक है।

कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने विशेष डाक टिकट और सिक्का जारी किया। उल्लेखनीय है कि यह स्मरणोत्सव 7 नवंबर, 2025 से 7 नवंबर, 2026 तक चलेगा। कार्यक्रम में वंदेमातरम् के पूर्ण संस्करण का सामूहिक गायन हुआ।

अमित शाह ने लिखा विशेष लेख

केंद्रीय मंत्री श्री अमित शाह

वंदेमातरम् के स्मरणोत्सव के उपलक्ष्य में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने एक लेख साझा किया जिसमें बताया गया है कि कैसे राष्ट्रगीत वंदेमातरम् एक आत्मविश्वासी, आत्मनिर्भर और पुनरुत्थानशील विकसित भारत 2047 के हमारे दृष्टिकोण को प्रेरित करता रहा है। यह लेख केंद्रीय मंत्री श्री अमित शाह द्वारा लिखा गया है। इस संबंध में प्रधानमंत्री ने एक्स पर लिखा: “वंदेमातरम् की 150वीं वर्षगांठ पर केंद्रीय मंत्री श्री @AmitShah बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित भारत के राष्ट्रगीत, जो भारत की स्वतंत्रता का शाश्वत गीत है, के बारे में लिखते हैं। वे याद दिलाते हैं कि कैसे औपनिवेशिक शासन के अंधकारमय दिनों में लिखा गया यह गीत, सांस्कृतिक गौरव और सभ्यतागत राष्ट्रवाद का सम्मिश्रण करते हुए, जागृति का प्रभात गीत बन गया। वंदेमातरम् एक आत्मविश्वासी, आत्मनिर्भर और पुनरुत्थानशील विकसित भारत 2047 के हमारे दृष्टिकोण को प्रेरित करता रहा है। इस लेख को अवश्य पढ़ें।”

 

Topics: गांधीजीइंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियमरवींद्रनाथ ठाकुरपाञ्चजन्य विशेषविकसित भारत 2047बंकिमचंद्र चट्टोपाध्यायराष्ट्रगीत वंदे मातरम्श्री अरबिंदोप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीवंदे मातरम्@150अमृत कालबंकिम बाबूवीर सावरकर
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