कांग्रेस की ‘दोस्ताना संघर्ष’ रणनीति: सहयोगियों को कमजोर कर खुद मजबूत होने का खेल?
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कांग्रेस की ‘दोस्ताना संघर्ष’ रणनीति: सहयोगियों को कमजोर कर खुद मजबूत होने का खेल?

कांग्रेस लोकसभा में सहयोगियों को सीट छोड़ती है, विधानसभा में उनके खिलाफ लड़ती है। जम्मू-कश्मीर व बिहार में NC-RJD के गढ़ में बुरी हार। क्या यह रणनीति अब उलटी पड़ रही?

Written byअभय कुमारअभय कुमार — edited by कुलदीप सिंह
Nov 19, 2025, 11:21 am IST
inविश्लेषण
Congress friendly fight politics

प्रतीकात्मक तस्वीर

कांग्रेस पार्टी की लोकसभा और विधानसभा के चुनावों में अलग प्रकार की रणनीति होती है। लोकसभा का चुनाव कांग्रेस पार्टी आधारित होता हैं अतएव कांग्रेस पार्टी लोकसभा चुनाव में अपने सहयागियों के खिलाफ दोस्ताना संघर्ष नहीं करती है, जबकि विधानसभा का चुनाव स्थानीय दलों पर आधारित होता है। इस कारण कांग्रेस पार्टी अपने सहयागियों को कमजोर या नज़रअंदाज करते हुए दोस्ताना संघर्ष करते नज़र आती है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी अपने सहयोगियों के खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारती है, मगर विधानसभा के चुनाव में ऐसा नहीं होता है।

विगत वर्ष संपन्न हुए केंद्रशासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर में कांग्रेस पार्टी ने जम्मू कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस के साथ चुनाव गठबंधन किया था। मगर कांग्रेस पार्टी ने नेशनल कांफ्रेंस के साथ गठबंधन के बावजूद भी सात सीटों पर उसके खिलाफ उम्मीदवार उतार दिए। आश्चर्यजनक तथ्य हैं कि कांग्रेस पार्टी का इन सात सीटों पर बेहद खराब प्रदर्शन रहा और सिर्फ एक सीट पर अपना जमानत बचाने में कामयाब हो सकी। कांग्रेस पार्टी ने नेशनल कांफ्रेंस के खिलाफ सोपोर, बारामुला, देवसर,भद्रवाह, डोडा, बनिहाल और नगरोटा विधानसभा की सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। सिर्फ बनिहाल सीट पर ही कांग्रेस पार्टी अपना जमानत बचाने में कामयाब हो सकी। दोस्ताना संघर्ष के बावजूद भी नेशनल कांफ्रेंस इन सात में चार सीटों पर अपने उम्मीदवार जिताने में कामयाब रही।

इसे भी पढ़ें: Red Fort Blast: आतंकी डॉक्टर शाहीन का तब्लीगी जमात से लिंक, जकात के नाम पर टेरर फंडिंग का खुलासा

विधानसभा सीट NC वोट प्रतिशत कांग्रेस वोट प्रतिशत विजेता

बिहार में कांग्रेस पार्टी नीत महागठबंधन में कुल 12 सीटों पर दोस्ताना संघर्ष हुआ। जिसमें 10 सीटों पर कांग्रेस पार्टी शामिल थी। वैशाली, कहलगांव, सुल्तानगंज, नरकटीकगंज, सिकंदरा(सु) सीटों पर कांग्रेस पार्टी ने अपने मजबूत और विश्वस्त सहयोगी राष्ट्रीय जनता दल के खिलाफ उम्मीदवार उतारे थे। वही करगहर, राजापाकर, बछवाड़ा, बिहार शरीफ विधानसभा की सीटों पर कांग्रेस पार्टी ने अपने सहयोगी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के खिलाफ उम्मीदवार उतारे थे। इनमें राजद के खिलाफ वाले सीटों पर कांग्रेस पार्टी का जमानत तक जब्त हो गया था। कांग्रेस पार्टी का राजद के खिलाफ जमानत जब्त होना यह स्पष्ट सन्देश देता है कि कांग्रेस पार्टी को इन सीटों पर खुद के बजाय अपने सहयोगी राजद को सीट देना चाहिए था। इसमें राजद के खिलाफ लड़ने वाले सिकंदरा और सुल्तानगंज विधानसभा सीटों पर कांग्रेस नोटा से भी पिछड़ गई थी।

RJD के खिलाफ दोस्ताना संघर्ष वाली सीटों पर कांग्रेस पार्टी का सापेक्ष प्रदर्शन

नेशनल कांफ्रेंस और राजद के खिलाफ लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने अपने उम्मीदवार नहीं उतारे जबकि, विधानसभा के चुनाव में उम्मीदवार उतरना यह स्पष्ट करता है कि कांग्रेस पार्टी इन दलों को कमजोर करना चाहती हैं जिससे कि इन दलों की कांग्रेस पार्टी पर निर्भरता बनी रहे। कांग्रेस पार्टी विधानसभा के चुनावों में हमेशा अपने सहयोगियों को हाशिए पर रखती है। बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने राजद से अपनी ताकत से लगभग दोगुनी सीटें जबरन लड़ने के लिए हासिल कर लिया। कांग्रेस पार्टी की यही रणनीति जम्मू कश्मीर में भी रही, जहाँ कांग्रेस पार्टी ने अपनी ताकत से लगभग दुगुनी 38 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। कांग्रेस पार्टी का प्रयास अपने सहयोगियों के बल पर अपने प्रदर्शन को सुधारने का होता है।

कांग्रेस का दोगलापन

कांग्रेस पार्टी गठबंधन में सहयोगियों से अधिक सीट झटकने के बाद चुनाव प्रचार में भी आनाकानी करती है। जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव के मध्य फ़ारुक़ अब्दुल्ला ने राहुल गाँधी और कांग्रेस पार्टी पर अपने मजबूत गढ़ जम्मू संभाग जहाँ से पार्टी के अधिक उम्मीदवार चुनावी मैदान में थे वहां चुनाव प्रचार करने के बदले नेशनल कांफ्रेंस के मजबूत गढ़ कश्मीर घाटी में चुनाव प्रचार करने का आरोप लगाया था। बिहार में भी कांग्रेस पार्टी का प्रचार कमजोर दिखा और कांग्रेस पार्टी प्रचार में भी राजद के वैशाखी के सहारे दिखी।

अब कांग्रेस पार्टी के सहयोगियों में अब कांग्रेस पार्टी की इस रणनीति के खिलाफ अब रोष दिखना शुरू हो गया है। जम्मू कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस अब कांग्रेस पार्टी के बदले भाजपा के ज्यादा करीब दिख रही हैं वही बिहार में राजद ने चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस पार्टी का नाम लेना बंद कर दिया है। राजद के कई नेताओं का स्पष्ट मानना है कि अगर पार्टी कांग्रेस पार्टी को किनारे करके अन्य छोटे सहयागियों के साथ चुनाव लड़ती तो पार्टी ज्यादा मजबूत स्थिति में होती। बिहार चुनाव परिणाम के बाद उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने भी कांग्रेस पार्टी से किनारा करना शुरू कर दिया है। आने वाले समय में कांग्रेस पार्टी के लिए राह और भी कठिन होने की संभावना हैं।

 

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अभय कुमार
अभय कुमार
अभय कुमार, सीएसडीएस (CSDS ), इप्सोस (IPSOS) सहित कई रिसर्च और मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं। भारतीय राजनीति सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय मामलो से जुड़े मुद्दों पर खास दिलचस्पी है और इसके लिए लिखते रहते हैं। [Read more]
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