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ध्वस्त हो आतंकवाद का इको सिस्टम

दिल्ली के लाल किले के पास कार विस्फोट ने खोला पढ़े-लिखे आतंकियों का राज़। डॉक्टर-प्रोफेसर जैसे बौद्धिकों की भूमिका, ISI की साजिश और छद्म सेक्युलर इकोसिस्टम का पर्दाफाश। आतंकवाद की जड़ें समझें और राष्ट्रप्रथम की पुकार।

Written byअमित त्यागीअमित त्यागी — edited by कुलदीप सिंह
Nov 15, 2025, 11:15 am IST
in विश्लेषण

दिल्ली में लालकिले के पास कार में विस्फोट एक बड़ा सबक है। इसमें विस्फोट करने वाले अनपढ़ नहीं हैं। बेरोजगार नहीं हैं। विकास से दूर लोग नहीं हैं। इसमें पढे़-लिखे, रोजगार पाये हुये और विकास की मुख्यधारा में शामिल लोग शामिल दिख रहे हैं। इस घटना में में डॉक्टर और प्रोफेसर जैसे बौद्धिक शामिल हैं। मेडिकल या इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर चुके या करते हुये आतंकी बनना पसंद करने वालों की मानसिकता को समझने के संदर्भ में एक बात तो स्पष्ट है। ये लोग समाज के प्रताड़ित लोग नहीं हैं।

ये कमजोर या दबे कुचले नहीं हैं। उम्र में युवा भी नहीं है। किसी के बहकावे या लालच के कारण इस राह पर जाने वाली थियरी इन पर लागू नहीं होती है। ये लोग चाहते तो एक बेहतर और सुंदर ज़िंदगी जी सकते थे। समाज में प्रतिष्ठा होने के कारण ये अपने वर्ग में प्रेरणास्रोत रहे होंगे। तो फिर क्यों इन लोगों पर आतंक का मार्ग चुना? जितना महत्वपूर्ण यह प्रश्न है, उतना ही आवश्यक है आतंकवादियों के समर्थन करने वाले इको सिस्टम को समझना।

छद्म सेक्युलर इको सिस्टम को जवाब

इस इको सिस्टम द्वारा अक्सर कहा जाता है कि आतंक का कोई मजहब नहीं होता है। यह कहकर यह इको सिस्टम बड़ी समस्या को हल्का करने का प्रयास करता है। हमें अब अपनी समझ में स्पष्टता लानी होगी। मजहब की आड़ में आतंकवाद को नकारा नहीं जा सकता है। धार्मिक शिक्षाओं के आधार पर जेहाद करना, गजवा ए हिन्द को ज़मीन पर उतारने का ख्वाब देखना, जैसे अनेक तथ्य हैं जो मजहबी शिक्षा से जुड़े हैं। दुनिया में जितने भी आतंकवादी संगठन हैं वह मजहबी मान्यताओं से लैस होकर जेहाद कर रहे हैं। इनमे पढे लिखे लोग शामिल हैं। ओसामा भी इंजीनियर था। दिल्ली ब्लास्ट में शामिल लोग भी उच्च शिक्षित लोग हैं। न ओसामा आर्थिक रूप से अक्षम था, न ही दिल्ली ब्लास्ट के गुनहगार अशिक्षित लोग हैं। पिछले एक दशक में भारत में सीमा पार से आने वाले आतंकवाद पर रोक लगी है। पाकिस्तान के द्वारा भारत के अंदर की जाने वाली घुसपैठ सफल न होने के कारण अब भारत के अंदर रहने वाले इको सिस्टम का मोड्यूल एक्टिव हुआ है। पहले जो लोग स्लीपर सेल की तरह बौद्धिक आतंकवाद को छद्म रूप से सहयोग करते थे वह अब खुल कर सामने आ गए हैं।

आईएसआई की साजिश

लालकिले के पास कार विस्फोट में शामिल दिखने वाले चेहरे तस्वीर का सिर्फ एक पक्ष है। इसमे कई अन्य अदृश्य सहयोगी शामिल हैं। एक बार फिर घटना के तार पाकिस्तान से जुड़ते दिख रहे हैं। आईएसआई लगातार लश्कर ए तैयबा एवं इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रोविन्स जैसे समूहों को एकजुट करने का प्रयास कर रही है। सीमा पर युद्ध में मिली हताशा के बाद आतंकी संगठनों को एकजुट करने का उनका उद्देश्य स्पष्ट है। भारत में आतंकी गतिविधियों को पुनर्जीवित करना। जम्मू कश्मीर में अशांति फैलाना। जम्मू कश्मीर के कुछ असंतुष्ट लोगों के द्वारा भारत में अपने मोड्यूल को मजबूत और स्थापित करना।

लालकिले की घटना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि खतरा बाहर से कम अब अंदर से ज़्यादा है। हमारी आंतरिक कमजोरियों का लाभ उठाकर यह इको सिस्टम विभाजन का प्रयास कर रहा है। यह लड़ाई सिर्फ सुरक्षा बलों, पुलिस, इंटेलिजेंस तक सीमित नहीं है। इसके लिए हर नागरिक को अपना योगदान देना होगा। राष्ट्रप्रथम को धर्म से आगे रखने वाले लोग समाधान दे सकते हैं। कट्टरपंथी विचारधारा छोटे स्तर पर सिर्फ मदरसों तक सीमित नहीं है, कट्टरपंथ अब विश्वविद्यालयों, अस्पतालों जैसे प्रमुख स्थानों तक अपनी गहरी पैठ बना चुका है। सेकुलर शब्द और संविधान की आड़ लेकर यह इको सिस्टम कट्टरपंथ का जेहादी मोड्यूल चला रहा है।

टेरर मॉड्यूल को बढ़ावा देने वालों का इकोसिस्टम

इस मोड्यूल को ऐसे समझिए। एक वर्ग घटना करता है। दूसरा, इसे भटके हुये लोगों का समूह बताता है। तीसरा, आतंक का कोई मजहब नहीं होता है, कहकर विषय से ध्यान भटकाने का प्रयास करता है। चौथा, सेकुलर शब्द की आड़ में पीड़ितों के लिए केंडल मार्च निकालता है। पांचवा, अमन और शांति के लिए व्याख्यान शुरू कर देता है। छठा, सरकार की गुप्तचर एजेंसियों की असफलता बताकर सरकार के असंतुष्टों को खाद पानी देता है। सातवाँ, मीडिया को सबका जिम्मेदार बताना शुरू कर देता है। आंठवा, इन हादसों को कहीं हो रहे चुनाव से जोड़कर दिखाता है। नवां, आरएसएस को कोसने लगता है। इसी तरह जोड़कर देखें तो दस, ग्यारह, बारह, यह फ़ेहरिस्त लंबी होती जाएगी। खास बात यह है कि कोई भी मजहबी कट्टरता की मूल वजह पर बात नहीं करता। ऐसे लोगों को फ्लिस्तीन की चिंता रहती है किन्तु भारत के बहुसंख्यक इन्हे यहूदी जैसे दिखते हैं। बांग्लादेश का तख़्तापलट इन्हे अपने मुफीद लगता है किन्तु भारत का लोकतन्त्र खतरे में दिखता है। इस इको सिस्टम के समर्थक नेपाल की तरह आगजनी और हिंसा को भारत में चाहते रहे हैं।

किसान आंदोलन में सक्रिय था यह इकोसिस्टम

किसान आंदोलन की आड़ में इस इकोसिस्टम ने बहुत खेल किया। 26 जनवरी 2021 को किसानों के समर्थन के नाम पर यह लोग लालकिले तक घुस गए थे। संसद इनका अगला निशाना था। पूर्व में भारत की संसद पर आतंकवादियों ने हमला किया था। इस इको सिस्टम से जुड़े लोगों ने अफजल गुरु के समर्थन में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। रात में उच्चतम न्यायालय में सुनवाई हुयी थी। भारत की संसद पर हमला करना इस बात का सबूत है कि ऐसा करने वाले और उनका समर्थन करने वालों का भारत के लोकतन्त्र के प्रति सम्मान भाव नहीं है। 26 जनवरी 21 को लालकिला निशाने पर था। इस बार भी लालकिले के आसपास विस्फोट संयोग है या प्रयोग है, इस पर अभी स्पष्ट नहीं कह सकते हैं।

कार विस्फोट को दिल्ली तक सीमित करके देखने की आवश्यकता नहीं है। इसके लिए कड़ी सतर्कता एवं सुरक्षा की आवश्यकता है। एक गहन छानबीन अभियान चलाने की आवश्यकता है। देश के अंदर विरोध के नाम पर देश को कमजोर करने वाले लोगों को चिन्हित करना होगा। उनकी जड़ों पर प्रहार करना होगा। कूटनीतिक स्तर पर अपना पक्ष वैश्विक स्तर पर और मजबूती से रखना होगा। दायित्व समूहिक है। इसलिए समाधान भी सामूहिकता से निकलेगा। इन सबके साथ ही हमें यह बात समझनी होगी कि एव्री पुलिसमैन इज़ ह्यूमन इन यूनिफ़ोर्म, एंड एव्री ह्यूमन इज़ पुलिसमैन विदाउट यूनिफ़ोर्म।

( लेखक वरिष्ठ स्तंभकार एवं राष्ट्रवादी विचारक हैं। )

Topics: लश्कर-ए-तैयबादिल्ली कार ब्लास्टLashkar-e-Taibaपढ़े-लिखे आतंकीगजवा-ए-हिंदछद्म सेक्युलर इकोसिस्टमजिहाद मानसिकताeducated terroristsGhazwa-e-Hindpseudo-secular ecosystemISI ConspiracyJihad mindsetइस्लामिक स्टेट खुरासानIslamic State KhorasanISI साजिशलाल किला विस्फोटRed Fort BlastDelhi car blast
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