राजा बहादुर सिंह के तीन पुत्र थे। राजा ने तीनों पुत्रों की परीक्षा लेनी चाही। एक दिन राजा ने सभी पुत्रों को अपने पास बुलाया और उन सबको एक-एक बोरी गेहूं देते हुए कहा, ’मैं और तुम्हारी माता तीर्थ यात्रा पर जा रहे हैं। तुम तीनों की यह जिम्मेदारी है कि अपने हिस्से के गेहूं को संभाल कर रखना। हमारे वापस आने पर तुमको ये गेहूं की बोरी लौटानी होगी।’ ऐसा कहकर राजा अपनी रानी के साथ तीर्थ यात्रा पर चले गये।

सबसे बड़े बेटे ने सोचा कि यह गेहूं की बोरी पिताजी को वापस लौटानी है इसलिए गेहूं की बोरी तिजोरी में रखवा देता हूं। दूसरे बेटे ने सोचा कि इन गेहूं के दानों को खेत में डलवाना उचित होगा जिससे गेहूं की अच्छी फसल होगी। लेकिन उसने ऐसे ही एक पथरीली जमीन पर गेहूं के दाने डलवा दिये। वह कभी उनकी देखभाल करने भी नहीं गया। उसने सोचा कि अब अपने आप ही फसल आ जायेगी। तीसरा बेटा बुद्धिमान था। उसने एक अच्छा खेत देखा जो बहुत उपजाऊ था। वहां उसने अच्छे से गेहूं के दाने बो दिये। वह प्रतिदिन पूरी लगन और मेहनत से खेत की देखभाल करने लगा। जब गेहूं की पहली फसल आयी तो फिर से खेत में गेहूं की बुआई की। एक वर्ष के बाद उसका परिश्रम रंग लाया और उसकी पैदावार काफी अच्छी हुई। राजा लगभग 2 वर्ष बाद वापस आया। उसके मन में यह जानने की इच्छा थी कि बेटों ने गेहूं का किस प्रकार उपयोग किया।
सर्वप्रथम पहले पुत्र ने अपनी तिजोरी खोली। तिजोरी में रखा गेहूं बुरी तरह सड़ चुका था। बाद में दूसरा पुत्र राजा को उस स्थान पर ले गया जहां उसने गेहूं डलवाया था। वहां तो केवल जंगल था जिसमें बड़ी-बड़ी घास खड़ी थी। गेहूं का कहीं नामोनिशान भी नहीं था। अब तीसरा पुत्र राजा को अपने खेत पर ले गया। वहां गेहूं की फसल लहलहा रही थी। यह देखकर राजा का मन बहुत प्रसन्न हुआ। तीसरे पुत्र का परिश्रम देख कर राजा की आत्मा तृप्त हो गई। राजा ने उसी समय तीसरे बेटे को अपने राज्य का उत्तराधिकारी बनाने का निर्णय लिया।
यह कहानी बहुत सारगर्भित है। उस राजा की तरह भगवान ने हमें भी कुछ गेहूं के दाने संभाल कर रखने को दिये हैं। वे दाने हैं-हमारे जीवन के क्षण। यदि हम अपने समय व बुद्धि का उपयोग विवेकपूर्ण तरीके से सत्कर्मों में लगायें तो हमें सफलता प्राप्त होगी।

















