बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का अंतिम चरण समाप्त होते ही, 11 नवंबर की शाम राजनीतिक हलचल में एक नया मोड़ आ गया। 243 सीटों वाली इस विधानसभा के लिए 17 प्रमुख एजेंसियों के पोल ऑफ पोल्स ने एनडीए को स्पष्ट बहुमत देते हुए सबको चौंका दिया। जहां एनडीए को 154 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया है, वहीं महागठबंधन को महज 83 सीटों पर सिमटते दिखाया गया। अन्य दलों के खाते में मात्र 5 सीटें जाने की संभावना है। भाजपा को सबसे ज्यादा लाभ होता नजर आ रहा है, जिसे 75 सीटें मिलने का दावा किया गया। दूसरी ओर, कांग्रेस को केवल 13 सीटें मिलने का अनुमान है। पहली बार मैदान में उतरी प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी भी अपेक्षाकृत बेअसर साबित हो रही है, जहां उसे 3-5 सीटें ही मिलने की बात कही जा रही है।
यह आंकड़े न केवल एनडीए की मजबूत पकड़ को दर्शाते हैं, बल्कि बिहार की राजनीति में एक नई बयार की आहट भी देते हुए दिखते हैं। पिछले 2020 के चुनाव में एनडीए को 125 सीटें, महागठबंधन को 110 और अन्य को 8 सीटें मिली थीं। इस बार एनडीए को लगभग 29 सीटों का फायदा होता दिख रहा है, जबकि महागठबंधन को 27 सीटों का भारी नुकसान। एग्जिट पोल के अलावा, पोस्ट पोल सर्वे भी यही ट्रेंड दिखा रहे हैं। विभिन्न स्वतंत्र सर्वे एजेंसियों के प्रारंभिक आंकड़ों में एनडीए की बढ़त और मजबूत नजर आ रही है, जो मतगणना के पहले ही माहौल को बदल चुकी है। बिहार के गलियारों में उत्साह की लहर दौड़ गई है, जबकि विपक्षी दलों में हड़बड़ी साफ झलक रही है।
सिस्टम पर उंगली उठाना विपक्ष की पुरानी रणनीति
असली परिणाम तो 14 नवंबर को आएंगे, लेकिन विपक्ष ने अभी से अपना ‘रोना-धोना’ शुरू कर दिया है। कांग्रेस के युवा नेता राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर ‘वोट चोरी, सरकार चोरी’ का पुराना आरोप फिर से चला दिया है। बिहार वोटिंग से ठीक एक दिन पहले उन्होंने ‘हाइड्रोजन’ नामक एक फुस्सी बम फोड़ा था, जो अब हार के बाद बहाने के रूप में काम आएगा। राहुल गांधी शायद अपनी हार भांप चुके थे, इसलिए पहले से ही नैरेटिव तैयार रखा था। वे कहेंगे, “मैंने तो पहले ही कहा था कि वोट चोरी हो रही है।” यह रणनीति विपक्ष की पुरानी आदत है—हार मानने के बजाय सिस्टम पर उंगली उठाना। कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने महागठबंधन की जीत का विश्वास जताया, लेकिन एग्जिट पोल के आंकड़ों पर सीधे टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा, “हम नतीजे आने पर बोलेंगे।”
एग्जिट पोल बना विपक्ष के रोने का कारण
कांग्रेस के लिए एग्जिट पोल भी अब एक रोने का नया कारण बन चुका है। जब ये आंकड़े उनके पक्ष में होते हैं, तो वे इन्हें सही ठहराते हैं, लेकिन हार के संकेत मिलते ही इन्हें ‘फर्जी’ करार दे देते हैं। मीडिया को ‘गोदी मीडिया’ बताकर अपनी नाकामी छिपाने की कोशिश करते हैं। प्रियंका गांधी ने चुनावी सभाओं में पहले ही चिल्ला-चिल्लाकर कहा था कि “मोदी में हिम्मत हो तो निष्पक्ष चुनाव कराकर दिखाएं।” यानी, वे पहले से ही तय कर चुकी थीं कि चुनाव निष्पक्ष नहीं होगा। यह हार को छिपाने के लिए गढ़े गए नैरेटिव हैं, जो विपक्ष की राजनीतिक संस्कृति को उजागर करते हैं।
तेजस्वी ने एसआईआर को लेकर बखेड़ा शुरू किया
महागठबंधन का प्रमुख घटक राष्ट्रीय जनता दल (राजद) भी एग्जिट पोल के परिणामों को मानने को तैयार नहीं है। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने ‘एसआईआर’ (सिस्टमेटिक इलेक्टोरल रोल’) को लेकर पहले ही बखेड़ा खड़ा कर दिया था। अब वे एसआईआर के पीछे छिप जाएंगे और चुनाव में ‘धांधली’ का आरोप लगाएंगे। तेजस्वी का दावा होगा कि “बाहर के राज्यों से चुनाव के लिए अफसरों को बुलाया गया। बीजेपी शासित राज्यों के अफसरों को ही प्राथमिकता दी गई, जबकि विपक्षी शासित राज्यों से किसी को नहीं बुलाया।” राजद ने एग्जिट पोल को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि “ये पहले भी गलत साबित हुए हैं, इस बार भी होंगे। हमें पूरा विश्वास है कि 14 नवंबर को महागठबंधन और तेजस्वी भारी मतों से जीतेंगे।”
राजद प्रवक्ता लगा रहे आरोप
राजद प्रवक्ता शक्ति सिंह यादव ने एग्जिट पोल को झुठला देते हुए कहा कि “बिहार में बंपर वोटिंग से बीजेपी हिल गई है। एग्जिट पोल करने वाली एजेंसियां पैसे लेकर जानकारी देती हैं। ये बढ़त दिखाकर बीजेपी मतगणना के दौरान धांधली के लिए मनोवैज्ञानिक दबाव डालना चाहती है।” लेकिन सवाल यह है कि राजद ने एग्जिट पोल करने वाली एजेंसियों पर आरोप तो लगा दिए, पर पिछले विधानसभा चुनावों में जब एग्जिट पोल तेजस्वी की सरकार बनने का संकेत दे रहे थे, तब क्या राजद ने इन्हें ‘पैसे खिलाकर’ सही करवाया था? क्या तेजस्वी इसका जवाब देंगे? यह दोहरा चरित्र विपक्ष की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है।
मोदी सरकार के खिलाफ अभी से नैरेटिव गढ़े
यह स्पष्ट है कि कांग्रेस और राहुल गांधी हार छिपाने के लिए मोदी सरकार पर ठीकरा फोड़ने का नैरेटिव सेट करके बैठे हैं। पोस्ट पोल सर्वे में भी एनडीए की बढ़त बरकरार है, जो विपक्ष के इन बहानों को और कमजोर कर रही है।
इस बार बिहार चुनाव रहा खास
आंकड़ों की मानें तो इस बार बिहार चुनाव कई मायनों में खास रहा। पहले बिहार की राजनीति ‘एम वाई’ फैक्टर—मुसलमान और यादव के गठजोड़—पर टिकी रहती थी, जिससे सरकारें बनती-गिरती रहीं। लेकिन इस बार नया ‘एम’ यानी महिला और नया ‘वाई’ यानी युवा फैक्टर चुनाव परिणामों में निर्णायक भूमिका निभाने जा रहा है। महिलाओं और युवाओं ने विकास, रोजगार और सुशासन के मुद्दों पर वोट डाले, जो एनडीए के पक्ष में गए। पोस्ट पोल सर्वे में भी यह ट्रेंड साफ दिख रहा है, जहां ग्रामीण महिलाओं और शहरी युवाओं की भागीदारी रिकॉर्ड स्तर पर रही।
अगर एग्जिट पोल सही साबित होते हैं, तो बिहार में यह बड़ा बदलाव माना जाएगा। इससे साबित हो जाएगा कि बिहारवासी ने परिवारवाद और वंशवाद की राजनीति को ठुकरा दिया है। लालू-राबड़ी काल के जंगलराज और भ्रष्टाचार की यादें अब ताजा नहीं रहेंगी। बिहार संदेश देगा कि भ्रष्टाचारियों और जंगलराज करने वालों को कभी माफ नहीं किया जाएगा। नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए ने विकास के पथ पर बिहार को ले जाने का वादा किया था, जो अब फलित होता दिख रहा है। सड़कें, बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार ने लोगों का भरोसा जीता है।
14 नवंबर का इंतजार
बिहार चुनाव न केवल राज्य की राजनीति, बल्कि राष्ट्रीय परिदृश्य को भी प्रभावित करेगा। विपक्ष के नैरेटिव टूटने से भाजपा को मजबूती मिलेगी, जबकि महागठबंधन की एकजुटता पर सवाल उठेंगे। 14 नवंबर का इंतजार अब सबके लिए रोमांचक है, लेकिन एग्जिट पोल और पोस्ट पोल सर्वे एक बात साफ कह रहे हैं—बिहार में नई बयार बह रही है, जो विकास और सुशासन की ओर इशारा कर रही है। बिहारवासी ने लोकतंत्र की ताकत दिखाई है, जहां वोटर ही असली विजेता होता है।

















