भोपाल। आध्यात्मिक विचारक और श्रीमहंत सिद्धपीठ हनुमन्निवास, अयोध्या के आचार्य श्री मिथिलेशनंदनी शरण ने कहा कि आधुनिक होने का अर्थ भौतिक होना नहीं है। दुनिया आधुनिकता को भौतिकता का पर्याय मानती है, लेकिन भारत अलग सोचता है। आधुनिकता का अर्थ उपयोगी होना है, गुणवान होना है। भारत के ऋषि पंच महाभूतों की बात करते हैं। महापुरुष किसी परिस्थिति, खोने,पाने और उपलब्धियों से प्रभावित नहीं होते है। जो पुरातन है, वही अधुनातन है।
आधुनिकता भारत की दृष्टि है। हम सनातन की उपासना करने वाले लोग हैं। भौतिकता का निरुपण भी आध्यात्मिक लोगों ने ही किया है। आचार्य ने कहा कि भारत सुखाभिलाषी राष्ट्र नहीं है, यह आनंदाभिलाषी राष्ट्र है। भारत ने जो विचार दिया उसे ठेंगड़ी जी ने सदा संदर्भित किया। उनके विचारों में भारतीय आत्मा परिलक्षित होती है। इस अर्थ में दत्तोपंत ठेंगड़ी के विचार उन्हें ऋषि परंपरा में खड़ा करते हैं।
आचार्य मिथिलेशनंदनी ने दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान द्वारा दत्तोपंत ठेंगड़ी स्मृति राष्ट्रीय व्याख्यानमाला 2025 को संबोधित कर रहे थे। रविंद्र भवन में आयोजित व्याख्यान माला को वर्चुअल माध्यम से संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि आधुनिकता को लेकर भारत की जीवन दृष्टि भिन्न है। आधुनिकता का अर्थ अतीत के विरुद्ध होना नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत में हम छठ की पूजा कर भगवान सूर्य की आराधना करते हैं। आज की आधुनिक जगत में सूर्य के संबंध में कई तरह की खोज हो चुकी है उसके बावजूद भी हम वैदिक सिद्धांत में सूर्य को एक नियामक मानकर आराधना करते हैं।
भारत का स्वत्व उसके ज्ञान में हैः कपिल तिवारी
इस कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए पद्मश्री डॉ कपिल तिवारी ने कहा कि आधुनिकता यानी पश्चिमीकरण नहीं है। भारत को अपनी आधुनिकता अर्जित करना अभी शेष है। परम्पराओं को साथ में लेकर चलना जरूरी है वरना आधुनिकता समस्या बन सकती है। कपिल तिवारी ने कहा कि भारत अभी वास्तविक अर्थों में आधुनिक नहीं हुआ है। आज की भारतीय आधुनिकता उधार की है, पश्चिम से आयातित है। भारत का पश्चिमीकरण हुआ है, आधुनिकीकरण नहीं।
उन्होंने कहा कि ब्रिटेन की आत्मा व्यापार में बसती है। जबकि भारत की आत्मा ज्ञान में। सत्य और स्वत्व की खोज केवल भारत में संभव है, क्योंकि भारत हर क्षण अपने को नया करने की क्षमता रखता है। वही परंपराएं सनातन कहलाती हैं जो समय के साथ स्वयं को नवीकृत करती रहती हैं; वे न नई होती हैं, न पुरानी। वे शाश्वत होती हैं। उन्होंने कहा कि उपनिषदों में जीवन की महिमा पर जो प्रश्न उठाए गए हैं और जिनके उत्तर दिए गए हैं, वैसे उदाहरण दुनिया के किसी अन्य साहित्य या दर्शन में नहीं मिलते। डॉ कपिल ने कहा कि उत्तर देना यह देश सदियों पहले भूल गया था लगता है अब यह देश प्रश्न करना भी भूल गया है। भारत आधुनिकता का बोझ उठाने को इच्छुक नहीं है। वह अपनी ही राह पर चलेगा। अपने ही रस्ते पर बढ़ेगा, अपने ही पैरों से चलेगा और अपनी ही आंखों से देखेगा।
पूर्व न्यायाधीश एवं विशिष्ट वक्ता अशोक पांडे ने कहा कि ठेंगड़ी जी ने समाज और राष्ट्र को पहले माना। वे संगठन शिल्पी थे। उनका मानना था कि राष्ट्र के विकास के लिए उत्पादन बंद नहीं होना चाहिए। उनके द्वारा स्थापित किए गए संगठनों में संघर्ष नहीं है। ग्राहक पंचायत में उन्होंने आर्थिक सुचिता के लिए कहा था कि हमें वस्तुओं पर लागत मूल्य लिखना चाहिए ना की एमआरपी। ठेंगड़ी जी की स्वीकार्यता सभी विचारधाराओं और धर्म में थी। आज उनको पढ़ने और उनके आदर्श को जीवन में अपनाने की आवश्यकता है। कार्यक्रम का संचालन करते हुए संस्थान के निदेशक ने कहा कि ठेंगड़ी जी समाज जीवन के सभी विषयों में अपने विचार व्यक्त किये हैं, जो सदियों तक राष्ट्र को दिशा देते रहेंगे। अंत में संस्थान के सचिव डॉ उमेंश चंद्र शर्मा ने आभार व्यक्त किया। आयोजन में अनेक गणमान्य उपस्थित थे।

















