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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ @100 : भारतीय सभ्यता आधारित श्रम दर्शन

रा.स्व.संघ ने अपनी सौ वर्ष की यात्रा में सांस्कृतिक जागृति, समाज सेवा और राष्ट्र-निर्माण को प्रेरित किया। इसी प्रेरण पाकर भारतीय मजदूर संघ ने सहकार, श्रम की गरिमा और राष्ट्रीय दृष्टिकोण से श्रमिक आंदोलन को नया आयाम दिया

Written byविरजेश उपाध्यायविरजेश उपाध्याय
Nov 11, 2025, 07:11 pm IST
inविश्लेषण, संघ @100

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने सौ वर्षों का गौरवशाली सफर पूरा किया है। इन सौ वर्षों में भारत ने भी एक परिवर्तनकारी विकास यात्रा तय की है, जिसमें रा.स्व.संघ की गहन और प्रेरक भूमिका निरंतर विद्यमान रही है। यह प्रभाव राजनीति से परे पूर्णतः राष्ट्रनिष्ठ भावना से ओत-प्रोत रहा है। संघ का उद्देश्य सदैव राष्ट्रीय पुनरुत्थान के उस व्यापक लक्ष्य पर केंद्रित रहा है, जिसका केंद्र बिंदु सांस्कृतिक जागृति, समाज सेवा और संस्थागत राष्ट्र-निर्माण है। इन आदर्शों की नींव पर निर्मित अनेक संस्थाओं में से एक है 1955 में गठित भारतीय मजदूर संघ (भा.म.सं), जो इस बात का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है कि श्रम कैसे राष्ट्र के भाग्योदय का एक ऊर्जस्वी बल बन सकता है।

विरजेश उपाध्याय
महानिदेशक,दत्तोपंत ठेंगड़ी फाउंडेशन (डीटीएफ)

भा.म.सं का गठन भारत के श्रमिक आंदोलन के विकास में एक ऐतिहासिक और निर्णायक मोड़ साबित हुआ। 19वीं शताब्दी के मध्य में, जब दुनियाभर की ट्रेड यूनियनों में वर्ग-संघर्ष और वैचारिक टकराव चरम पर था, भा.म.सं ने एक नया विचार प्रस्तुत किया, ‘श्रमिकों को संगठित करने का भारतीय दृष्टिकोण’, जो राष्ट्रीय उद्देश्य और सांस्कृतिक मूल्यों का समन्वित रूप था। रा.स्व.संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी ने भारत की श्रम शक्ति को राष्ट्र की रीढ़ बताया, जिसमें करोड़ों किसान, कारीगर, औद्योगिक श्रमिक और सेवा प्रदाता शामिल हैं। उन्होंने ऐसे श्रमिक आंदोलन की परिकल्पना की, जो पश्चिमी विचारधाराओं से भिन्न, भारत की सभ्यता और परंपराओं से प्रेरित है।

श्रम संगठन के क्षेत्र में अपने अनुभव की कमी को विनम्रतापूर्वक स्वीकार करते हुए श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी ने एक सरल, लेकिन गहरा संदेश दिया, ‘जाओ, सीखो और करो।’ यही वाक्य आगे चलकर उस आंदोलन का सूत्र बना जिसने भा.म.सं को भारत का सबसे बड़ा और दुनिया के सबसे विशिष्ट श्रमिक संघों में से एक बना दिया। भा.म.सं. के मूल विचार उसके सशक्त और एकात्मता से ओत-प्रोत नारों में स्पष्ट रूप से प्रकट होते हैं, ‘देश के हित में करेंगे काम, काम के लेंगे पूरे दाम’, ‘राष्ट्र प्रथम, श्रमिक सम्मान’ और ‘काम हमारा, देश के लिए’। ये नारे टकराव नहीं, बल्कि गरिमा, कर्तव्य और राष्ट्रीय एकता का संदेश देते हैं। इनमें उस आंदोलन का सार निहित है, जिसने राष्ट्र को सर्वोपरि रखते हुए प्रत्येक श्रमिक के अधिकार और सम्मान को केंद्र में रखा।

इसी दर्शन से प्रेरित होकर भा.म.सं. ने अपने तीन मार्गदर्शक सिद्धांत निर्धारित किए-राष्ट्र का औद्योगीकीकरण, श्रम का राष्ट्रीयकरण और उद्योगों को श्रम-केंद्रित बनाना। इन विचारों ने मिलकर ऐसा अद्वितीय ढांचा निर्मित किया, जिसमें उत्पादकता, देशभक्ति और मानवीय मूल्यों का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। पारंपरिक यूनियनों, जिनका संघर्ष अक्सर श्रमिकों के वेतन वृद्धि या हड़तालों तक सीमित रहता था, के विपरीत भा.म.सं. ने औद्योगिक संबंधों की एक नई परिभाषा गढ़ी। इसका दृष्टिकोण सहयोग पर आधारित था, जिसमें टकराव की कोई गुंजाइश नहीं थी। यहां प्रतिद्वंद्विता के स्थान पर साझा जिम्मेदारी और पारस्परिक सम्मान को प्राथमिकता दी गई।

भा.म.सं. ने ‘औद्योगिक परिवार’ का आदर्श प्रस्तुत किया, जहां नियोक्ताओं और कर्मचारियों के बीच संघर्ष या विरोध के बजाय विकास में साझेदारी और प्रगति की भावना को प्रोत्साहित किया गया। मतभेद की स्थिति उत्पन्न होने पर संवाद, संयम और परिपक्वता से समाधान खोजने को प्राथमिकता दी जाती थी, जबकि हड़ताल को केवल अंतिम उपाय माना गया। इसी संतुलित दृष्टिकोण ने भा.म.सं. को श्रमिकों, नियोक्ताओं और नीति-निर्माताओं- सभी के बीच सम्मान और विश्वास का आधार प्रदान किया। स्वतंत्र भारत की यात्रा में भा.म.सं. ने लोकतांत्रिक मूल्यों और श्रम की गरिमा को सुदृढ़ बनाए रखने में निरंतर सक्रिय भूमिका निभाई है।

आपातकाल के दौरान, जब नागरिक अधिकारों पर व्यापक अंकुश लगाया गया था, तब भी भा.म.सं. ने श्रमिकों के अधिकारों और अपनी वैचारिक स्वतंत्रता की रक्षा के प्रति दृढ़ रहा। इसने असंगठित श्रमिकों की चिंताओं को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लाने में अग्रणी भूमिका निभाई, जिसके परिणामस्वरूप 2008 में ‘असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम’ जैसे ऐतिहासिक कानून का मार्ग प्रशस्त हुआ। पेंशन सुधारों की दिशा में भी भा.म.सं. ने यह सुनिश्चित किया कि सेवानिवृत्ति भत्ता किसी कृपा का प्रतीक नहीं, बल्कि श्रमिक का अधिकार माना जाए।

1990 के दशक में आर्थिक उदारीकरण के दौर में भा.म.सं. ने जहां औद्योगिक आधुनिकीकरण और दक्षता का समर्थन किया, वहीं अंधाधुंध निजीकरण और अनुबंधित श्रम की अनियंत्रित प्रवृत्ति का सशक्त विरोध भी किया। हाल के वर्षों में, इसने श्रम सुधारों के क्षेत्र में सार्थक योगदान देते हुए श्रमिक हितों से समझौता किए बिना उन्हें अधिक व्यावहारिक और सरल बनाने की वकालत की है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन जैसे वैश्विक मंचों पर भी भा.म.सं. ने भारतीय दृष्टिकोण को मजबूती से प्रस्तुत किया है। यह दृष्टिकोण श्रम को केवल आर्थिक साधन नहीं, बल्कि गरिमा, सहयोग और नैतिक जिम्मेदारी का वाहक मानता है, जो राष्ट्र की प्रगतिशील अर्थव्यवस्था का आधार है।

भा.म.सं. की विशिष्ट पहचान का मूल तत्व है उसका भारतीय सभ्यता पर आधारित श्रम दर्शन। प्राचीन भारतीय चिंतन में काम को केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि समाज कल्याण के लिए संपन्न एक यज्ञ और पवित्र कर्तव्य माना गया है। ऋ ग्वैदिक युग के कारीगरों, किसानों और शिल्पकारों को उनके कौशल के साथ-साथ सामाजिक सद्भाव बनाए रखने में निभाई गई भूमिका के लिए भी सम्मानित किया जाता था। प्राचीन काल में संघ या श्रेणी व्यवस्था आर्थिक गतिविधियों को नैतिकता और जवाबदेही से जोड़ती थीं। इसी परंपरा का पोषण करते हुए भा.म.सं. ने पश्चिम के वर्ग-संघर्ष से उत्पन्न विचारों से पूर्णतः भिन्न, एक स्वदेशी श्रम दर्शन प्रस्तुत किया। इसने श्रमिकों को यह बोध कराया कि भारत में श्रम का उद्देश्य केवल आत्मनिर्भरता नहीं, बल्कि राष्ट्र और व्यापक समुदाय के प्रति सेवा भाव भी है।

भा.म.सं. ने परंपरा और समयानुकूल परिवर्तन के बीच सामंजस्य स्थापित करते हुए अपनी प्रासंगिकता को सदैव बनाए रखा है। अपने मूल्यों पर अडिग रहते हुए और आधुनिकता की मांगों को आत्मसात करते हुए यह लगातार विकास की दिशा में अग्रसर रहा है। भा.म.सं. का दृष्टिकोण और दर्शन मूलतः प्रगतिशील है, जो कार्य-जगत में हो रहे परिवर्तन और नई चुनौतियों का सामना करते हुए आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोमेशन और वैश्वीकरण के इस युग में श्रम जगत अभूतपूर्व परिवर्तनों से गुजर रहा है।

पारंपरिक रोजगारों का स्वरूप बदल रहा है, जबकि नए रोजगार और अवसर उभर रहे हैं। गिग और प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्थाएं सुरक्षा और स्थायी रोजगार की नई परिभाषाएं गढ़ रही हैं। जलवायु परिवर्तन भी आजीविका के स्वरूप को बदल रहा है, विशेषकर कृषि और तटीय क्षेत्रों में। इन तीव्र परिवर्तनों के बीच भी भा.म.सं. के सिद्धांत आज उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने अपने आरंभिक समय में थे। यह न केवल भारत में स्थायी और संतुलित औद्योगिकीकरण का समर्थन करता है, बल्कि युवाओं में कौशल विकास, आत्मगौरव और राष्ट्रीय चेतना को प्रोत्साहित करते हुए श्रम के राष्ट्रीयकरण और उद्योगों में श्रमिकों की मानवीय एवं समावेशी भागीदारी को सुदृढ़ बनाने में केंद्रीय भूमिका निभा रहा है।

वास्तव में, रा.स्व.संघ की शताब्दी केवल धैर्यपूर्वक लक्ष्यों की प्राप्ति की गाथा नहीं, बल्कि दूरदर्शिता के साथ भविष्य निर्माण का उत्सव भी है। भा.म.सं. जैसी संस्थाओं को प्रेरित कर रा.स्व.संघ ने यह सिद्ध किया है कि भारत का श्रमिक आंदोलन केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि वैश्विक चेतना से संपृक्त एक रचनात्मक आंदोलन है, जो टकराव नहीं, सृजनशीलता का पोषक है। यह आंदोलन भौतिक प्रगति के साथ-साथ नैतिकता का भी पालन करता है। इसने राष्ट्र के समक्ष यह उदाहरण प्रस्तुत किया कि प्रत्येक श्रमिक केवल वेतनभोगी नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माता है; और प्रत्येक उद्यम केवल लाभ का केंद्र नहीं, बल्कि साझा कर्तव्य से जुड़ा एक परिवार है।

रा.स्व.संघ के दर्शन और भा.म.सं. के कार्यों ने भारत को न केवल एक सशक्त सामाजिक संगठन का आदर्श प्रस्तुत किया, बल्कि यह कालजयी संदेश भी दिया है कि राष्ट्रीय शक्ति की नींव श्रम की गरिमा में निहित होती है। अपनी शताब्दी से आगे बढ़ते हुए, रा.स्व.संघ निश्चित रूप से भारत की विकास यात्रा को आत्मनिर्भरता, सामाजिक समरसता और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के कालातीत आदर्शों की दिशा में अगुआई करता रहेगा।

Topics: भारतीय दृष्टिकोणराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघश्री गुरुजीआत्मनिर्भरतावसुधैव कुटुम्बकम्पाञ्चजन्य विशेषअंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन
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