सितंबर 2023 में संसद ने महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने के लिए ऐतिहासिक नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 पारित किया था, जिसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण देने का प्रावधान है। यह कानून महिलाओं की राजनीतिक समानता और लोकतांत्रिक भागीदारी को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना गया। हालांकि, कानून पारित हुए एक वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी इसे लागू नहीं किया गया है। इसी देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अब केंद्र सरकार और कानून मंत्रालय से जवाब मांगा है।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को नोटिस जारी करते हुए पूछा कि यह कानून कब से लागू होगा। अदालत ने कहा कि महिलाओं को समान राजनीतिक प्रतिनिधित्व देना देश की लोकतांत्रिक भावना का आवश्यक हिस्सा है। जस्टिस बी. वी. नागरत्ना ने टिप्पणी की कि “महिलाएं देश की सबसे बड़ी अल्पसंख्यक हैं, इसलिए उन्हें उचित प्रतिनिधित्व मिलना जरूरी है।” यह याचिका मध्य प्रदेश की कांग्रेस नेता जया ठाकुर ने दायर की है। उनका कहना है कि अधिनियम को जनगणना (Census) और परिसीमन (Delimitation) जैसी पूर्व शर्तों के बिना लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि इन प्रक्रियाओं का इंतजार करना महिलाओं को समान अवसर देने के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन है।
सरकार का रुख है कि यह कानून तभी लागू होगा जब नई जनगणना और परिसीमन प्रक्रिया पूरी होगी, क्योंकि 2021 की जनगणना कोविड-19 के कारण टल गई थी। इस कारण से, अधिनियम को लागू होने में कई साल लग सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि प्रक्रिया में अनावश्यक देरी हुई तो यह महिलाओं के साथ “न्याय में देरी” जैसी स्थिति होगी। वर्तमान में लोकसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 14% (78 सांसद) है, जबकि कई राज्य विधानसभाओं में यह 10% से भी कम है। ऐसे में यह आरक्षण कानून महिलाओं को राजनीतिक रूप से सशक्त करेगा और नीतिनिर्माण में उनकी भागीदारी बढ़ाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह सरकार की नीति में हस्तक्षेप नहीं करना चाहती, लेकिन यह जानना जरूरी है कि यह ऐतिहासिक कानून आखिर कब से लागू होगा।
















