दत्तोपंत ठेंगड़ी जयंती पर विशेष : अनूठे संगठक, प्रखर दार्शनिक
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दत्तोपंत ठेंगड़ी जयंती पर विशेष : अनूठे संगठक, प्रखर दार्शनिक

महान विचारक श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी ने ऐसे अनेक संगठन गढ़े, जो आज वैश्विक स्तर पर जाने जाते हैं। उन्होंने 70 के दशक में कहा था कि 15-20 वर्ष में सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था बिखर जाएगी और वह सच सिद्ध हुआ

Written byसतीश कुमारसतीश कुमार
Nov 10, 2025, 06:18 am IST
in भारत, विश्लेषण
सभा को सम्बोधित करते हुए श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी। (फाइल चित्र)

सभा को सम्बोधित करते हुए श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी। (फाइल चित्र)

पश्चिम की एक अवधारणा है, “एक ही व्यक्ति में नेतृत्व-कर्ता, संगठन-कर्ता और दार्शनिकता, ये तीनों गुण मिलने असंभव हैं। यदि किसी में हों तो वह इतिहास की दुर्लभ घटना ही होती है।” और वास्तव में इतिहास की यह दुर्लभ घटना भारत में हुई है, दत्तोपंत ठेंगड़ी एक ऐसी ही विभूति थे।

सतीश कुमार
राष्ट्रीय सह संगठक
स्वदेशी जागरण मंच

1920 में महाराष्ट्र के आर्वी कस्बे के वकील बापू राव ठेंगड़ी के घर जन्मे दत्तोपंत जी को जब हम समग्रता से देखते हैं तो उनमें इन तीनों गुणों को पूर्णता में पाते हैं। वे जन्मजात नेतृत्व-कर्ता थे। 1942 में बी.ए., एल.एल.बी. (कानून) की पढ़ाई पूरी करके वे संघ के प्रचारक बने। उन्हें केरल भेजा गया, क्योंकि वे अंग्रेजी बहुत अच्छी बोलते थे। लगभग ढाई वर्ष बाद, उन्हें बंगाल भेजा गया। बाद में संघ पर लगे प्रतिबंध के दिनों में वे नागपुर लौटे। स्वतंत्रता के पश्चात कांग्रेस तो शासन में थी, किंतु विचारधारा के नाते भारत विरोधी वामपंथी विचारधारा ही सब तरफ प्रभावी थी। ‘लालकिले पर लाल निशान, मांग रहा मजदूर किसान।,’ यही नारे मजदूर क्षेत्र क्या देशभर में लगते रहते थे।

इन परिस्थितियों से द्वितीय सरसंघचालक श्रीगुरुजी चिंतित थे। इसके समाधान के रूप में उन्होंने दत्तोपंत ठेंगड़ी का चुनाव किया। वे मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री डी.पी. मिश्रा के माध्यम से कांग्रेस की मजदूर यूनियन ‘इंटक’ में सक्रिय हुए। फिर वामपंथियों की डाक एवं तार विभाग की यूनियन में सक्रिय रहे। यानी संघ के प्रचारक ने मजदूर और यूनियन का काम कैसे किया जाता है, उनकी ताकत और कमजोरियां कहां हैं, इसका अध्ययन वहीं से किया। और अंततः 1955 में भोपाल की एक बैठक में भारतीय मजदूर संघ (बी.एम.एस.) का कार्य प्रारंभ किया। आज बी.एम.एस. भारत का सबसे बड़ा मजदूर संगठन है और जो वामपंथी इसे ‘पूंजीपतियों का संगठन’ कहते थे, वे बिखर गए हैं।

दत्तोपंत जी 1964 से 1976 तक दो बार राज्यसभा के सदस्य रहे। वहां भारतीय मजदूर संघ, राष्ट्रीयता, हिंदुत्व और भारत की मुख्य आवाज बने। उन्होंने रूस, चीन, अमेरिका व पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का गहन अध्ययन किया। विश्व भर में भ्रमण किया। 1979 में हुई चीन की यात्रा और चाइनीज रेडियो पर उनका विषय प्रसारण बहुत प्रसिद्ध हुआ था। उसी गहन अध्ययन और अनुभव के बल पर उन्होंने 1972-1973 में ही निष्कर्ष निकाला कि रूस की अर्थव्यवस्था अगले 15-20 वर्ष में गिर जाएगी। और सबने देखा 1989-90 में यू.एस.एस.आर. बिखर गया।

भारत का किसान वर्ग सबसे बड़ा वर्ग है। इसलिए उन्हें संगठित करने, उनकी समस्याओं का समाधान करने हेतु उन्होंने 1979 में कोटा से ‘भारतीय किसान संघ’ का कार्य प्रारंभ किया। आज ‘भारतीय किसान संघ’ भारत का सबसे बड़ा किसानों का संगठन बन गया है। 1983-84 से ही दत्तोपंत जी को लगने लगा था कि भविष्य में बहुराष्ट्रीय कंपनियां, पश्चिम की पूंजीवादी नीतियां विश्व भर में प्रभावी बनकर दिखने लगेंगी। इसके प्रतिकार के रूप में और भारत को भारतीय चिंतन की अर्थव्यवस्था के आधार पर उभारने के लिए वे विभिन्न मंचों से स्वदेशी का आह्वान करते रहते थे। इसी प्रक्रिया में उन्होंने 22 नवंबर, 1991 को नागपुर में अर्थशास्त्रियों की एक बैठक में प्रो. एम.जी. बोकरे (नागपुर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और हिंदू इकोनॉमिक्स ग्रंथ के लेखक) के नेतृत्व में ‘स्वदेशी जागरण मंच’ का गठन किया। आज भारत में स्वदेशी का विचार सर्वदूर स्वीकार हो रहा है। सामान्य व्यक्ति से लेकर देश के प्रधानमंत्री तक स्वदेशी के पक्ष में बोल रहे हैं। किंतु 1991 में स्वदेशी, बिल्कुल भी स्वीकृत विचार नहीं था, बल्कि ‘वैश्वीकरण’ का विमर्श ही प्रभावी था।

अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगी देशों की आर्थिक नीतियों का ही सर्वदूर बोलबाला था। उसी के तहत डंकल प्रस्ताव, गैट वार्ताएं और विश्व व्यापार संघ (डब्ल्यू.टी.ओ.) बने। दत्तोपंत जी ने इससे सावधान रहते हुए ‘भारत को डब्ल्यू.टी.ओ. में जाने की जल्दी नहीं करनी चाहिए’ और भारत को भारतीय विकास के प्रतिमान के आधार पर खड़ा करना चाहिए, इसका आह्वान स्वदेशी जागरण मंच से बार-बार किया। सारा देश और विश्व ‘वैश्वीकरण’ और पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की तरफ जा रहा था, ऐसे में दत्तोपंत जी अकेले डटे रहे और स्वदेशी के आग्रह पर टिके रहे।

आज 2025 में हम देखते हैं कि 30-35 वर्ष पूर्व दत्तोपंत जी ने जो कहा वह सत्य साबित हो रहा है और उस समय की सरकारें जो कह रही थीं, उसे अब वही सरकारें नकार रही हैं। आज अमेरिका से लेकर भारत तक की सरकारों के मुखिया दत्तोपंत जी के विचार को स्वीकार कर रहे हैं यानी स्वदेशी-स्वदेशी ही बोल रहे हैं। दत्तोपंत ठेंगड़ी दार्शनिक थे। वह एक ही घटना के उदाहरण में उमर खय्याम की रूबाइयों और वाल्टर के वाक्यों को एक साथ बोलते थे।

अपनी पुस्तक ‘कार्यकर्ता’ में वे गीता के 18वें अध्याय के 26 वें श्लोक ‘मुक्त:संगो नहमवादी धृत उत्साह समन्वित:’ का वर्णन करते लिखते हैं कि कार्यकर्ता को अपना-पराया, सुख-दुख, ऊंच-नीच, सफलता-असफलता का भाव छोड़कर निरंतर कार्य में लगे रहना है, तभी वह सात्विक कार्यकर्ता होता है।
1990 के दशक में जो अमेरिका वैश्वीकरण, उदारीकरण का सबसे बड़ा प्रवक्ता बना हुआ था और विश्व व्यापार संगठन का निर्माण कर रहा था, आज उसी अमेरिका के राष्ट्रपति सारे विश्व पर मनमाने ‘टैरिफ’ लगा रहे हैं। विश्व भर की अर्थव्यवस्था अमेरिका के हिसाब से चलें, ऐसी वे घोषणाएं, व्याख्यान कर रहे हैं।

किंतु स्वदेशी का विचार वह ब्रह्मास्त्र है, जो इस अमेरिकी पश्चिमी मकड़जाल को बहुत अच्छी तरह से काट सकता है। अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ, अपनी अर्थव्यवस्था को अपने संसाधनों, अपनी जनसंख्या की ताकत, अपनी तकनीक के आधार पर खड़ा किया जा सकता है, यह दत्तोपंत जी हमें आश्वस्त करते हैं।
भारत अब अपनी क्षमता के आधार पर तेजी से उभरना प्रारंभ कर चुका है। आज भारत 4.2 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के साथ न केवल विश्व की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है बल्कि आधारभूत संरचना, टेक्नोलॉजी, पूंजी निर्माण आदि में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। आज भारत के रेलवे स्टेशन, रेल, रेलमार्ग, वायुमार्ग, हवाई अड्डे, बंदरगाह, समुद्री जहाज, यूपीआई ट्रांजेक्शन सिस्टम आदि विश्व भर में प्रसिद्ध हो रहे हैं।

एक पश्चिमी दार्शनिक विक्टर ह्यूगो ने कहा है, ‘नथिंग कैन स्टॉप द आइडिया हूज टाइम हेज कम।’ इस तुलना में हम कह सकते हैं, ‘आज भारत में स्वदेशी का समय आ गया है और विश्व में भारत का समय आ गया है।’ इसलिए दत्तोपंत ठेंगड़ी जी की 105वीं जयंती (10 नवंबर, 1920 और 14 अक्टूबर, 2004) पर हम यह संकल्प ले सकते हैं कि राष्ट्र प्रथम और स्वदेशी चिंतन के आधार पर अगर हमने केवल अर्थव्यवस्था ही नहीं, अपनी सांस्कृतिक प्रक्रियाओं को, अपने पारिवारिक जीवन-मूल्यों को, अपने सामाजिक, शैक्षिक रीति-रिवाजों और पाठ्यक्रमों को आगे बढ़ाया, तो निश्चित ही 2047 में जब भारत अपने स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूर्ण कर रहा होगा, तो वह एक ‘समृद्ध और महान राष्ट्र’ बन गया होगा। जय स्वदेशी, जय भारत।

Topics: भारतीय किसान संघ (BKS)सोवियत संघ का पतनस्वदेशी जागरण मंच)डब्ल्यू.टी.ओ. (WTO)राष्ट्र प्रथमसमृद्ध और महान राष्ट्रदत्तोपंत ठेंगड़ीस्वदेशीपाञ्चजन्य विशेषअनूठे संगठकप्रखर दार्शनिकनेतृत्व-कर्ताभारतीय मजदूर संघ (BMS)
सतीश कुमार
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